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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 361

अरण्यकाण्ड ३५१

चामर एवं श्वेतच्छत्र-रूपी फेनवाले, गज-रूपी ऊँची पीठवाले, डूबते-उतराते मीनो से युक्त भँवरवाले तथा शीतल घाटो मे विविध रत्न-समुदाय को लाकर छितरानेवाली जीन, हौदा आदि नौकाओवाले रक्त के प्रवाह मे जा मिलते थे और उसे नया रूप (अर्थात्, रक्तवर्ण) दे देते थे।

दृढ वक्र दतोवाले कुछ राक्षस (राम के) अति तीक्ष्ण बाणो से मृत होकर देवता बन गये और भ्रमरो को आकृष्ट करनेवाली पुष्पमालाओ से शोभित केशोंवाली अप्सराओ के साथ रहकर अपने ही कबंधी का नाच देखने लगे।

कुछ राक्षस देवो के संघ मे मिल गये और उत्तम कंकणों से भूषित अप्सराओं के साथ रहकर यह देख रहे थे कि उनकी ही मृत देह की छिन्न भुजाओ को किस प्रकार एक ओर से भूत पकडकर खाने लगते हैं और दूसरी ओर श्वान उन्ही टुकड़ों को पकड़कर खींच रहे हैं। यह देख-देखकर वे हँस पड़ते थे।

कुछ राक्षस, जिनके वक्ष, चुनकर प्रयुक्त किये गये रामचंद्र के बाणो के लगने से छिद गये थे और जो (राक्षस) कर्म-बन्धन से मुक्त होकर देवता बन गये थे, यह सोचकर मन में भय करने लगे कि अहो ! राक्षसो की सेना विशाल है और राम तो एकाकी हैं, अब क्या होगा ?

शुण्डधारी गज-सदृश वीर (राम) के वे बाण, जो कंटको (राक्षमो) के शरीरों को छिन्न-भिन्न कर रहे थे, नीच तथा काले मनवाले, झूठी गवाही देनेवाले व्यक्ति के वचनों के जैसे थे।

जिस प्रकार मनोहर पंखवाला भ्रमर अपनी शरण में पडे हुए कीड़ों को अपने रूप मे परिवर्तित कर देता है, उसी प्रकार उदार प्रभु ने मायावी राक्षसो को घेरकर अपने उत्तम शरों के पवित्र प्रभाव से देवो में परिवर्तित कर दिया।

वहाँ की रक्त की नदियाँ, मानो यह विचार कर कि एक बलवान् मनुष्य ने अनेक राक्षसो को मार दिया है, यह समाचार विजय-माला से भूषित रावण को देना चाहिए— क्रोधी राक्षसो के शवों को बहाती हुई (समुद्र मे गिरकर) लका में जा पहुँची।

चारो ओर छुटी हुई राक्षस-सेना को (राम के) बाणो ने सर्वत्र छिन्न-भिन्न करके उनके प्राणों को पी लिया, जिससे वह (सेना) धरती पर लोट गई, यह देखकर त्रिशिर ने क्रुद्ध होकर भी विलव किये विना, रक्त-प्रवाह में निमग्न अपने रथ को गगन-मार्ग से चलाता हुआ गर्जन किया।

स्थिर रथवाले उस राक्षस ने, सबके लिए दृढ सत्य का साक्षी बनकर रहनेवाले, उस धर्म-स्वरूप चक्रवर्त्ती के कुमार (राम) के शरीर को, गगन की वर्षा की तरह अपने तीक्ष्ण बाणो की वर्षा से ढक दिया।

राम ने, (राक्षस के द्वारा) बरसाये गये उन सब बाणो को अपने बाणों से छिन्न-भिन्न कर दिया। फिर, चौदह बाणो से (उस राक्षस के) उज्ज्वल स्वर्णमय रथ को ध्वस्त कर दिया और उसके सारथी को भी निहत कर दिया।

इतना ही नही, उसी क्षण, देवो के कोलाहल-ध्वनि करते समय, (राम ने)