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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 362, कुल 549 में से

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पृष्ठ 362

३५२ | कम्ब रामायण

स्वर्ण के जैसे चमकते हुए तीक्ष्ण फलवाले अनुपम बाणों से क्रूर कार्य करनेवाले उस राक्षस के मुकुटधारी (तीन) शिरों में से, एक को छोड़कर, दो को काट गिराया।

तब वह राक्षस रथ-हीन हो गया और उसका त्रिशिर नाम भी निरर्थक हो गया। तो भी उसकी क्रूरता नही मिटी। जैसे गगन से काला मेघ उतरा हो, त्योंही उसने अपने वक्र धनुष से बाण-पुंज (राम पर) उतारे।

त्रिशिर, ललाट पर भौंहों को चढ़ाकर, प्रलय-काल की वर्षा की तरह शरों की घनी वर्षा करनेवाले धनुष को लेकर युद्ध करने लगा। तब जिस प्रकार प्रभंजन मेघ को बिखेर देता है, उसी प्रकार राम ने अपने अवार्य बाणों से उस (राक्षस) का धनुष काट दिया।

यद्यपि उस (राक्षस) ने अपना धनुष खो दिया, तथापि घूरनेवाले उसके चमकते मुख का प्रकाश कम नहीं हुआ। उसकी मेघ-गर्जन की-सी ध्वनि भी मंद नहीं पड़ी। उसका भुजबल मंद नहीं पड़ा। उसके द्वारा राम पर बरसाये जानेवाले पत्थर भी कम नहीं हुए और चाक के जैसे उसका परिभ्रमण भी मंद नहीं पड़ा।

गगन में स्वयं एकाकी रहकर भी उसने ऐसा माया-युद्ध किया, जैसे दो सौ व्यक्ति मिलकर युद्ध कर रहे हों। तब उसके दोनों पैरों को राम ने दो तीक्ष्ण बाणों से काट दिया और दो बाणों से उसकी भुजाओं को भी काट दिया।

भुजाओं और पैरों से हीन होकर वह (राक्षस) तीक्ष्ण दाँतों को बाहर किये, पर्वत-कंदरा समान एवं मांस-दुर्गंध से युक्त अपने मुख को खोले हुए, रामचन्द्र पर गिरकर उन्हें निगलने को आया। उसे देखकर राम ने किंचित् भी दया किये बिना, अपने दीर्घ विजयशील धनुष से एक बाण प्रयुक्त कर उसके एक शिर को भी काट दिया।

त्रिशिर पर्वत-शिखर की भाँति ज्यों ही भूमि पर गिरा, त्योंही, सूर्य के जैसे चमकते हुए करवाल धारण किये, अपने विशाल हाथों में ढालों को लिये हुए, बाकी बचे हुए राक्षस, दूषण नामक सेनापति के मना करने पर भी वहाँ रुके नहीं, किंतु भाग खड़े हुए। उनके दीर्घ पैर, विशाल रक्त प्रवाही में आँतों के मध्य उलझ जाते थे।

यह दृश्य देखकर, आकाश में झुंड बाँधकर स्थित देवता ताली बजाकर कोलाहल कर उठे। कुछ राक्षस, आदिशेष के फन पर स्थित धरती को दबाते हुए भाग चले और वहाँ फैली हुई चर्बी में फिसलकर उसमें डूब गये। कुछ राक्षस अपने सुरक्षित प्राणों के साथ भागे और शव के ढेरों से टकराकर लुढ़क गये।

कुछ राक्षस भागते हुए, धरती पर पड़े बरछे और करवाल की धारों से उनके पैर कट जाने से ढीले हो पड़े। कुछ, मृत राक्षसों के रक्त-प्रवाह में पैर फिसल जाने से डूब गये। कुछ, भय के मारे रक्त-सागरों में कूदकर तैरने लगे, किंतु वे कहीं स्थिर खड़े नहीं रह सके।

कुछ ऐसे भाग रहे थे कि उनके कटि के वस्त्र और खड्ग विगलकर गिर जाते थे और उनके पैरों में उलझकर उन्हें काटने लगते थे, तो भी वे उनपर ध्यान न देते थे। वे भय की मूर्त्ति-से बने, मुख श्वासाकुल होकर जहाँ-तहाँ शरों के छत्र पर लगे हुए उत्तम वीर (राम) के बाणों की प्रेरणा से, बाणों वाले से वेगवाला दौड़कर भाग निकलते थे।