कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 388, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें३८० कम्ब रामायण
उग्र तथा कलंक-रहित विश्वामित्र के द्वारा प्रदत्त अनेक ऐसे शस्त्र राम की आज्ञा में हैं, जो शिव आदि देवों के लोकों को तथा सब भुवनों को भी क्षण काल में विध्वस्त कर सकते हैं।
जिस परशुराम ने एक सहस्र बलिष्ठ हाथोंवाले (कार्त्तवीर्य अर्जुन) को अपने परसे से क्षण काल में काटकर ढेर कर दिया था, उस (परशुराम) की सारी शक्ति को, उसके दृढ़ धनुष के साथ ही, राम ने अपने वश में कर लिया था। क्या वैसा बल हमारे लिए प्राप्त करना संभव है ?
काम-पीडा के बढ़ जाने से तुम दुर्बल हो गये हो। अतः, तुमने ऐसे वचन कहे। यह कार्य विनाशकारी है। मैं तुम्हारा मामा हूँ और तुम्हारे कुल का वृद्ध पुरुष हूँ। मैं कहता हूँ, हे तात ! यह पाप-कार्य छोड़ दो।—इस प्रकार मारीच ने कहा।
राक्षसराज ने, अपने कथन के बारे में किंचित् विचार करने का परामर्श देने-वाले उस मारीच का धिक्कार करते हुए कहा—तुम, अपनी माता को मारनेवाले उस (राम) से डरकर जी रहे हो। क्या तुम्हें एक वीर पुरुष मानना उचित है ?
स्वर्गवाली देवी के निवासों को भस्म करके मैं सब लोकों पर इस प्रकार शासन-चक्र चलाता हूँ कि दिग्गज सब भयभीत होकर भागकर छिप गये हैं और देवता भी दुर्दशा-ग्रस्त हो गये हैं। क्या ऐसे मुझको दशरथ के वे पुत्र कष्ट दे सकेंगे ?—यह मेरी शक्ति भी अच्छी है !
मैं त्रिभुवन का एकच्छत्र राज्य वहन करता हूँ। यदि मुझे कोई शक्तिशाली शत्रु प्राप्त हो, तो उससे बढ़कर मेरे आनंद का विषय कोई दूसरा नहीं होगा। मेरी आज्ञा के अनुसार तुम्हें कार्य करना है। राजा के कार्य-संपादन करनेवाले मंत्री के कर्त्तव्य से क्या तुम स्खलित हो जाओगे ?
अगर तुम मेरी आज्ञा का अतिक्रमण करोगे, तो मैं तीक्ष्ण करवाल से तुम्हें काट दूँगा। किन्तु, अपने इच्छित कार्य को पूर्ण किये बिना नहीं रहूँगा। यदि तुम जीवित रहना चाहते हो, तो इन घृणास्पद वचनों को छोड़कर मेरे मन की बात करो। यों रावण ने कहा।
राक्षसराज के यह वचन कहने पर, मारीच ने मन में विचार किया—जिसके मन में गर्व उत्पन्न होता है, वह उसी समय मिट जाता है। यही कथन सत्य है। लोग मन में काम-वासना उत्पन्न होने पर, उसी कामना पर प्राण छोड़ने के लिए भी तैयार हो जाते हैं—और वह तपाये हुए पात्र में डाले गये जल के जैसे ही, उफनकर, भीतर शांत हो गया। वह फिर कहने लगा—
तुम्हारे हित की कामना से मैंने यथार्थ बात कही। होनेवाले अपने किसी अहित को सोचकर और उससे डरकर मैंने कुछ नहीं कहा। विनाश का काल आ जाता है, तो भला भी बुरा लगता है। हे क्षुद्र स्वभाववाले ! बताओ, मुझे क्या करना है ? यों मारीच ने कहा।
मारीच के यह कहते ही रावण ने अपना क्रोध शान्त कर उसका आलिंगन किया