कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 389, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरण्यकाण्ड ३८१
और कहा—पर्वत के समान पुष्ट कंधोंवाले। मन्मथ के उग्र बाणों से मरने की अपेक्षा राम के बाण से मरना ही कीर्त्तिदायक है न ? अतः, मंद मारुत से मेरे हृदय में काम उत्पन्न करनेवाली (सीता) को ला दो।
रावण के यह वचन कहते ही मारीच बोला—(मेरी माँ को मारनेवाले) राम से अपना बदला लेने के लिए मैं एक बार, दो-एक राक्षसों को साथ लेकर तपोवन में गया था। तब राम के बाणों से मेरे साथी मरकर गिर पड़े। भयभीत होकर मैं भाग आया। ऐसा मैं इस समय क्या कार्य कर सकता हूँ ? बताओ।
मारीच की बातें सुनकर रावण ने कहा तुम्हारी माता को मारनेवाले इस राम के प्राण हरने के लिए मैं तैयार हूँ। तुम्हारा यह प्रश्न कि मैं जाकर क्या करूँ, उचित ही है। हमारा कर्त्तव्य माया से धोखा देकर उस सीता का अपहरण करना ही है।
मारीच ने कहा—हे राजन् ! अब मैं और क्या कह सकता हूँ ? उस (राम) की देवी को पराक्रम से हरण करना उचित है। धोखे से हरण करना नीच कार्य है। तुम (राम से) युद्ध करके, विजय पाकर सीता को अपना लो और अपने प्रताप को बढाओ। ऐसा करना नीतिशास्त्र के अनुकूल होगा।
अपने हित-चिंतक (मारीच) का कथन सुनकर रावण हँस पड़ा और बोला - उन मनुष्यों को जीतने के लिए क्या सेना की भी आवश्यकता है ? क्या मेरे विशाल हाथ का करवाल पर्याप्त नहीं है ? फिर भी, सोचने की बात यह है कि यदि वे दोनों मनुष्य मर जायेंगे, तो वह नारी (सीता) एकाकिनी होकर अपने प्राण त्याग देगी न ? अतः, धोखे से उस नारी का हरण करना ही ठीक है।
यह सुनकर मारीच ने सोचा—मैं ऐसा उपाय बताता हूँ कि राम की देवी का स्पर्श करने के पूर्व ही इस (रावण) के शिर (राम के) बाणों से बिखर जायें, पर यह मेरी बात नहीं मानता। अब मेरे जीवित रहने का कोई मार्ग नहीं है। विधि के परिणाम को कौन जान सकता है ? अब इसकी आज्ञा का पालन करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है।
फिर उस (मारीच) ने कहा—अब मुझे कैसी माया रचनी है, बताओ। रावण ने कहा—तुम एक सोने के हिरण का रूप धारण कर लो और उस सीता के मन को ललचाओ। मारीच वैसा करने की सम्मति प्रकट करके चल पड़ा। उज्ज्वल शूलधारी राक्षसराज (रावण) भी दूसरे मार्ग से चला गया।
मारीच, पूर्वकाल में राम के बाण का प्रभाव जान चुका था। अतः, वह स्वयं हरिण का रूप लेकर वहाँ जाना नहीं चाहता था। किंतु, रावण की वैसी आज्ञा होने के कारण वह गया। अब उसके मन की दशा और उसके व्यापारों का वर्णन करेंगे।
मारीच का मन, अपने बन्धुओं का स्मरण करके दुःखी होता। वह वीर राम-लक्ष्मण से भयभीत होकर चक्कर खाता। गहरे तालाब का पानी विषमय हो जाय, तो उसमे रहनेवाली मछली जिस प्रकार विकल होती है, उसी प्रकार मारीच का मन भी व्याकुल हुआ। उसकी दशा का अनुमान करना भी कठिन है।