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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 390, कुल 549 में से

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पृष्ठ 390

३८२ | कंब रामायण

विश्वामित्र के यज्ञ के समय राम से पीड़ित होकर और (दंडकारण्य में) पहले एक बार हरिण-वेष में जाकर भी जो मरा नहीं, वह मारीच अब तीसरी बार प्रयत्न करता हुआ राघव के आश्रम में जा पहुँचा।

उसने ऐसे एक स्वर्ण-हरिण का रूप धारण किया, जिसकी अनुपम उज्ज्वल देह की कांति से गगन और धरती भी प्रकाशित हो उठी। उत्तम हरिणी-समान सीता के मन में आकर्षण उत्पन्न करने के विचार से वह (पर्णकुटी के पास) गया।

किसी पर आसक्ति नहीं रखनेवाले मन तथा कपट से युक्त वेश्याओ की ओर जिस प्रकार सब कामुक व्यक्ति आकृष्ट होते हैं, उसी प्रकार उस स्वर्ण-हरिण की ओर सब प्रकार के हरिण आकृष्ट होकर उसको घेरकर चले।

उसी समय सीतादेवी, अपने अति सुन्दर कंकण-भूषित कोमल कर-कमलों से पुष्प-चयन करती हुई, इस प्रकार वहाँ चली आईं कि देखनेवालों के मन में यह संदेह उत्पन्न होने लगा कि इसके कटि है या नहीं।

जिसपर विपदा आनेवाली होती है, वे स्वप्न में ऐसे रूपों को देखते हैं, जिनका विचार तक वे अपने मन में कभी नहीं लाये होंगे। इसी प्रकार, सीता देवी ने, जिनको, इसके पूर्व कभी किसी को न प्राप्त हुई बड़ी विपदा आनेवाली थी, उस माया-मृग को देखा।

रावण की आयु अब समाप्त होनेवाली थी, और उसकी मृत्यु से धर्म की सुरक्षा होनेवाली थी। अतः, सीता उस (माया-मृग) को देखकर, यह नहीं जानती हुई कि यह धोखा है, उसके न चाहने योग्य सौंदर्य पर मुग्ध हो गई ?

वह हिरण ज्यों ही अर्धचंद्र समान ललाटवाली सीता के सम्मुख आकर खड़ा हुआ, त्यों ही वह (सीता) उसके प्रति अत्यधिक आकर्षण से भरकर, इस विचार से कि राम से उस हरिण को पकड़ लाने को कहे, मत्वर विजयी धनुर्धारी (राम) के निकट जा पहुँची।

सीता ने हाथ जोड़कर राम से कहा—हमारे आश्रम में अति उत्तम स्वर्णमय, दूर तक अपना प्रकाश फेंकनेवाला, माणिक्य तथा रत्नमय सुदृढ खुरों और कर्णों से शोभाय-मान एक हरिण आया है। वह अत्यन्त दर्शन-मधुर है।

ऐसा हरिण संसार में कहीं नहीं हो सकता, – ऐसा किंचित् भी विचार किये बिना ही, हमारे प्रभु और कमलभव के पिता (विष्णु के अवतारभूत) राम, हरिण-तुल्य देवी की बात सुनकर उमंग से भर गये।

यह मुझे चाहिए—यों अपनी देवी के कहने पर, राम ने यह नहीं कहा कि यह (हरिण) चाहने योग्य नहीं है। किन्तु, यह कहा कि आभरणधारी, स्वर्णलता-तुल्य हे देवि! हम उस हरिण को देखेंगे। तब अनुज लक्ष्मण ने उनका मनोभाव जानकर उस समय एक वचन कहा—

(उस हरिण के) स्वर्णमय देह है, माणिकमय पैर, पूँछ और कान हैं और वह कुदकता है—यों कहने से यह स्पष्ट है कि वह कोई मायामय मृग है। हे प्रभु! इसके विपरीत उसे यथार्थ मृग मानना ठीक नहीं है।

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