कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 391, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरण्यकाण्ड ३८३
तब राम ने कहा— हे मेरे अनुज ! यथार्थ विवेक से सब कुछ जाननेवाले व्यक्ति भी इस अस्थिर संसार की दशा को पूरा-पूरा नहीं जान सकते ; इस संसार में अनेक सहस्र कोटि प्राणी हैं। अतः, संसार में कोई वस्तु असंभव है—ऐसी बात नहीं है।
तुम्हारा मन क्या कहता है ? हम अपने कानों से सृष्टि की विचित्र वस्तुओं के बारे में सुनते हैं। क्या तुम नहीं जानते कि पूर्वकाल में सात स्वर्णमय हंस¹ पैदा हुए थे ?
सृष्टि के प्राणियों की कोई रूप-व्यवस्था या कोई सीमा नहीं है। यों राम ने अपने भाई से कहा। इतने में मुग्धा (सीता) देवी चिन्ता करने लगीं कि वह स्वर्ण-मृग वन के भागों में जाकर कहीं अदृश्य न हो जाय।
इस प्रकार चिन्ता करनेवाली देवी का मनोभाव जानकर, अंजन-पर्वत सदृश प्रभु, यह कहते हुए कि हे आभरणों से भूषित देवि ! कहाँ है वह हरिण ? मुझे दिखाओ। चल पड़े। मुखरित वीर वलयधारी अनुज (लक्ष्मण) अपने भ्राता का यह कार्य देखकर चिन्तामग्न हो, उनके पीछे-पीछे चले। उसी समय अवश्यंभावी विधि के विधान के समान आया हुआ वह माया-मृग सम्मुख दिखाई पड़ा।
सम्मुख दिखाई पड़नेवाले उस हरिण को देखकर रामचन्द्र अपनी सूक्ष्म बुद्धि से कुछ विचार न करके कह उठे—अहो ! यह तो बहुत सुन्दर है। उन (सर्वज्ञ राम) के इस प्रकार कहने का कारण क्या था ? विष्णु ने सर्पशय्या को छोड़कर धरती पर (राम के रूप में) अवतार लिया था, तो वह देवताओं के पुण्यफल के परिणामस्वरूप ही तो था ? वह (भाग्य) क्या व्यर्थ होगा ? (अर्थात्, देवताओं के भाग्य-परिपाक के कारण ही रामचंद्र मायामृग को पकड़ने के लिए तैयार हुए थे।)
फिर, श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा—हे भाई ! इसे देखो। इसका उपमान क्या हो सकता है ? इसका उपमान यह स्वयं है। इसके अतिरिक्त दूसरा कोई उपमान नहीं है। इसके दाँत उज्ज्वल मुक्ता-तुल्य हैं। हरी घास पर बढ़ाई गई इसकी जीभ बिजली के सदृश है। इसकी देह रक्त स्वर्ण के तुल्य है जिसपर चाँदी की-सी चित्तियाँ शोभित हो रही हैं।
हे दृढ धनुर्धारी ! इस हरिण की सुन्दरता को देखने पर स्त्री हो या पुरुष,—कौन इसपर मुग्ध नहीं होगा ? रेंगनेवाले और उड़नेवाले सब प्राणी इसे देखकर पिघल उठते हैं और इस प्रकार आकर घेर लेते हैं, जिस प्रकार दीपक पर पतंग आकर गिरते हैं।
१. एक कथा प्रसिद्ध है कि पूर्वकाल में भरद्वाज मुनि के सात पुत्र मानससरोवर पर योग-साधना करते थे। किसी कारण से वे योगभ्रष्ट हो गये और दूसरे जन्म में कौशिक ऋषि के पुत्र होकर उत्पन्न हुए। उस जन्म में एक दिन अत्यन्त क्षुधा से पीड़ित होकर उन्होंने अपने गुरु गर्ग महर्षि की गाय को मारकर खा डाला। किन्तु, खाने के पूर्व पितरों का श्राद्ध कर उन्हें तृप्त किया। इस पाप के कारण उन्हें अनेक योनियों में जन्म लेना पड़ा। किन्तु, पितरों को तृप्त करने के पुण्यफल से उन्हें सब जन्मों में अपने पूर्वजन्मों का स्मरण बना रहता था। एक बार वे सात स्वर्णहंस होकर जनमे थे। कदाचित् इसी कथा की ओर इस पद्य में संकेत है।—अनु०