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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 392, कुल 549 में से

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पृष्ठ 392

३८४ | कंब रामायण

आर्य (राम) के इस प्रकार कहने पर लक्ष्मण ने उस हरिण को देखकर यह स्पष्ट रूप से जान लिया कि यह (हरिण) सच्चा नहीं है। फिर कहा—हे सुरभित तथा सुन्दर मालाधारी। यह हरिण स्वर्ण का भले ही हो, तो भी इससे हमें क्या प्रयोजन है? अतः, हमें अपने स्थान पर लौट जाना ही उचित है।

लक्ष्मण के ये वचन समाप्त करने के पूर्व ही उस अतिरूपवती (सीता) ने अनघ (रामचंद्र) को देखकर कहा—हे चक्रवर्त्ती-पुत्र ! मन को आकृष्ट करनेवाले इस हरिण को शीघ्र पकड़ लाओ। जब हम (वनवास की) अवधि पूरा करके नगर को लौटेंगे, तब यह खेलने के लिए अत्यंत उपयुक्त होगा।

'है या नहीं'—यों संदेह उत्पन्न करनेवाली कटि से युक्त (सीता) के यह कहने पर प्रभु उस हरिण को पकड़ने के लिए सन्नद्ध हुए, यह देखकर स्पष्ट विवेकवाले भाई (लक्ष्मण) ने उनसे निवेदन किया—हे भ्राता ! आप सोचकर जान सकते हैं कि हमें धोखा देने के लिए राक्षसों के द्वारा भेजा गया यह मायामय मृग है।

तब देवताओं के कष्टों को दूर करने के लिए अवतीर्ण प्रभु ने उत्तर दिया—यदि यह मायामृग ही है, तो भी मेरे बाण से यह मरेगा। मैं उस दशा में एक क्रोधी (क्रूर) राक्षस का वध करने का कर्त्तव्य पूरा करूँगा। यदि यह यथार्थ हरिण है तो इसे पकड़कर लाऊँगा। इन दोनों बातों में कोई भी अनुचित नहीं।

इसपर लक्ष्मण ने फिर कहा—हे वज्रसदृश दृढ़ तथा अतिसुन्दर कंधोंवाले। इस (हरिण) के पीछे किस प्रकार के राक्षस छिपे हैं—यह हमें विदित नहीं है। उनकी माया कैसी है—इससे भी हम परिचित नहीं हैं। यह हरिण क्या है—यह भी हमने समझा नहीं है। नीति-निष्ठ महाजनों ने जिस आखेट को घृणित और वर्ज्य कहा है, उसे करना कीर्त्तिकारक नहीं होता।

यह सुनकर चतुर्मुख के पिता (विष्णु के अवतार, राम) ने अपने उत्तम भाई से कहा—राक्षस वैर रखनेवाले हैं। उनकी संख्या अपार है। उनकी माया प्रभूत है—इन बातों को सोचकर ही क्या हम अपने व्रत को छोड़ दें? यह हास्यास्पद बात होगी। अतः, (हरिण) को पकड़ने का यह कार्य उचित ही है।

तब लक्ष्मण ने कहा—हे भ्राता। योग्य कार्यों को ठीक सोच-समझकर करना उचित है। इस (हरिण) को पकड़ लाने के लिए मैं जाऊँगा। इसे यहाँ भेजकर इसके पीछे छिपे रहनेवाले राक्षस असंख्य भी क्यों न हों, उन सबको मैं अपने धनुष पर अनेक तीक्ष्ण बाण चढ़ाकर मिटा दूँगा। यदि यह मायामय मृग न हो, तो इसे पकड़कर ले आऊँगा?

उस समय हरिणी-तुल्य उस (सीता) ने, गद्गदकंठ से शुकी की जैसी अमृत-वर्षिणी वाणी में कहा—हे नाथ ! क्या तुम स्वयं जाकर इस (हरिण) को नहीं पकड़ लाओगे? फिर रक्त रेखाओं से संयुक्त नीलोत्पल-जैसे अपने नयनों से मोती जैसे अश्रु-बिंदु बरसाती हुई और मान करती हुई पर्णशाला की ओर चल पड़ी।

इस प्रकार जानेवाली सीता का रोष देखकर रक्षक प्रभुने (लक्ष्मण से) कहा—

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