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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 393, कुल 549 में से

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पृष्ठ 393

अरण्यकाण्ड ३८५

हे सुन्दरमाला-भूषित। इस हरिण को मैं स्वयं पकड़कर शीघ्र लौट आऊँगा। वन में रहनेवाली कलापी-समान सीता की रक्षा करते हुए तुम यहाँ रहो—यों कहकर वरछे-जैसे तीक्ष्ण बाण और धनुष लेकर सत्वर चल पड़े।

तब लक्ष्मण ने यह कहकर कि पहले (विश्वामित्र के) यज्ञ के समय आये हुए तीन राक्षसों में से (अर्थात्, ताड़का, सुबाहु और मारीच—इनमें से) एक राक्षस हमसे बचकर निकल गया था। हे प्रभु! मेरा अनुमान है कि उस समय बचकर भागा हुआ मारीच ही इस रूप में अब यहाँ आया है। आप सत्य को देखेंगे। जाइए। आपकी जय हो। लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर उन्हें नमस्कार किया और लक्ष्मी-तुल्य सीता के निवास-भूत कुटीर के बाहर पहरा देने हुए खड़े रहे।

पर्वत-समान उन्नत कंधोंवाले रामचंद्र ने अपने विवेकवान् भाई के वचनों पर ध्यान नहीं दिया और पूर्णचंद्र का उपमान बननेवाले सुन्दर मुख से शोभित (सीता) देवी के मान का स्मरण करते हुए, सिंदूर और प्रवाल के जैसे रक्तवर्ण अपने मुँह पर संसंधान भरकर उस हरिण का पीछा करते हुए चल पड़े।

वह हरिण मंद-मट पैर रखता हुआ कभी चलता, कभी स्थिर खड़ा होता। फिर, घबराकर झपटता और कभी कान खड़े करके अपने खुरों को वज्र से सटाता हुआ उछल पड़ता एव अपनी गति से प्रभंजन और मन को भी मानों नवीन गति सिखाने लगता।

राम ने, त्रिभुवन को नापनेवाले अपने पैर को उठाकर आगे रखा। क्या उस चरण की पहुँच से परे रहनेवाला कोई लोक भी हो सकता है ? यो राम ने (उस हरिण का) पीछा किया। उन राम के उस समय के वेग के बारे में इनसे अधिक क्या कह सकते हैं कि उन्होंने अपनी अनुपम सर्वव्यापिता को प्रकट किया ?

वह (हरिण) पर्वत पर चढ़ता, मेघों के मध्य कूद पड़ता। उसका पीछा करने पर वह बहुत दूर भाग जाता। उसका पीछा करना छोड़कर विलंब करें, तो इतना निकट आ जाता कि हाथ बढ़ाकर उसे छू सकें। स्थिर खड़ा हुआ-सा दिखता; किन्तु झट उछलकर भाग जाता। इस प्रकार, वह (हरिण), धन पर ललचानेवाली वारनारियों के मन के समान सचरण करता। अहो !

तब उदार स्वभाववाले प्रभु ने विचार किया—इस (हरिण) का रूप कुछ है और इसके कार्य कुछ और हैं। पहले ही मेरे अनुज ने जो सोचा, वह ठीक ही लगता है। यदि मैं ठीक-ठीक विचार करता, तो इसके पीछे नहीं आता। राक्षसों की माया के कारण ही मुझे यह क्लेश उठाना पड़ रहा है।

इतने में वह मायावी राक्षस यह सोचकर कि यह (राम) अब मुझे पकड़ेगा नहीं, किंतु अपने बाण से मुझे परलोक में भेजने की बात सोच रहा है—अतिवेग से गगन में उड़ गया।

उसी क्षण प्रभु ने भी अपने चक्रायुध के समान अवार्य एक रक्तवर्ण बाण को यह आज्ञा देकर छोड़ा कि यह हरिण जहाँ भी जाये, वहाँ उसका पीछा करता हुआ जा और उसके प्राण हर ले।