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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 394

३८६ कंब रामायण

वह दीर्घ, तीक्ष्ण तथा पत्राकार बाण, उस मायावी के वक्ष में जा लगा। तुरन्त वह (मारीच) अपने खुले मुँह से (हा लक्ष्मण ! हा सीते ! कहकर) पुकार उठा और अष्ट दिशाओं और उनसे परे भी प्रतिध्वनि करता हुआ एक पर्वत के जैसे गिर पड़ा।

ज्योही वह क्रूर राक्षस अपने यथार्थ रूप में मरकर गिरा, त्योही राम अपने उस भाई के बारे में, जिसने उस (हरिण को पकड़ने के) प्रयत्न को अहितकारी बताया था, सोचने लगे—मेरा वह भाई चतुर है। मेरे प्राणों के समान प्रिय है। मेरा वह चतुर अनुज मेरा उद्धार करनेवाला है।

फिर, रामचंद्र ने उस मारीच की देह को निकट जाकर देखा, जो दिगंत को अपनी पुकार से प्रतिध्वनित करता हुआ गिरा था, और स्पष्ट रूप से यह जान लिया कि वह वही मारीच है, जो पहले कलंक-रहित विश्वामित्र के महायज्ञ के समय आया था।

फिर, यह सोचकर वे (राम) चिंतित हुए कि दारुण बाण ज्योही उसके वक्ष में लगा, वह अपनी माया से मेरे कंठ स्वर का अनुकरण करके पुकार उठा। वह ध्वनि सुनकर मेघ-समान नयनोंवाली (सीता) देवी चिंतित हुई होगी।

मेरा भाई इस (हरिण) को देखते ही समझ गया था कि यह मायावी मारीच है। वह मेरे पराक्रम को समझने की बुद्धि रखता है। अतः, इस (मारीच) की पुकार के यथार्थ तत्त्व को (सीता को) वह समझा देगा। यो विचार कर राम स्वस्थचित्त हुए।

फिर, यह विचार कर कि यह (मारीच) केवल मरने के उद्देश्य से ही यहाँ नहीं आया होगा, हो न हो, कोई षड्यन्त्र करने का उपाय करके ही आया है, इसकी पुकार से कोई हानि उत्पन्न होने की संभावना है, अतः, ऐसी कोई विपदा उत्पन्न होने के पूर्व ही पर्णशाला को लौट जाना उचित है। रामचंद्र लौट पड़े। (१-२५२)


अध्याय ८

सीता-हरण पटल

शंखों से पूर्ण अनुपम समुद्र के जैसे सुन्दर स्वरूपवाले (राम) के संबंध में हमने वर्णन किया। अब सुरभिपूर्ण पुष्पालंकृत केशोंवाली लता-सदृश (सीता) देवी के सम्बन्ध में कहेंगे।

मारीच ने अपने दाँत पीसकर, अपने कंदरा के समान मुँह को खोलकर जो करुण पुकार की थी, वह ज्योही सीता के कानों में पड़ी त्योही वह वृक्ष पर से धरती पर गिरी हुई कोयल के समान व्याकुल होकर छाती पीटती हुई मूर्च्छित हो गई।

घने कुंतलोंवाली वह (सीता) देवी अवलंब से छूटी हुई लता के समान, और वज्र-ध्वनि के श्रवण से भयभीत हुए सर्प के समान मूर्च्छित होकर धरती पर लोट गई। फिर,