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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 395

अरण्यकाण्ड ३८७

(संज्ञा पाकर) रोती हुई कहने लगी—हा ! मैने अज्ञान में पड़कर हरिण को पकड़कर लाने की बात कही और उसके फल-स्वरूप अपने जीवन-सर्वस्व को खो बैठी।

फिर, सीता ने लक्ष्मण से कहा—कलंक-रहित शुभगुणों से पूर्ण हमारे प्रभु, राक्षस की माया से विपदा-ग्रस्त हो गये हैं—यह विषय जानने के पश्चात् भी उनके भाई, तुम अभी तक मेरे निकट ही खड़े हो ? क्या यह उचित है ?

तब उस सत्यनिष्ठ (लक्ष्मण) ने समझाया—क्या आपका यह कथन उचित है कि इस लघु संसार में राम से भी अधिक पराक्रमी व्यक्ति है ? स्त्रीजनोचित बुद्धि के कारण ही आपने ऐसा कहा है।

हे स्त्रीत्व-गुण से पूर्ण देवि ! सप्त समुद्र, चतुर्दश भुवन, सप्त कुलपर्वत, इन सब प्रदेशों के निवासियो के क्षुद्र बल से क्या युद्ध मे राघव का विशिष्ट पराक्रम कभी घट सकता है ? (अर्थात्, कम नही हो सकता है।)

भूमि, जल, पवन, आकाश और अग्नि नाम के जो पदार्थ हैं, वे सब उन (राम) के क्रोध करने पर घबरा उठते हैं। मेघ-सदृश काले वर्णवाले उन कमल-नयन को आपने क्या समझा है, जो आप इस प्रकार व्याकुल हो रही हैं ?

क्या रामचंद्र निशाचरों से परास्त एव विपदा-ग्रस्त होकर दुहाई देंगे ? यदि कभी उन्हें वैसी दुहाई देनी भी पड़े, तो सारा ब्रह्मांड अस्तव्यस्त हो जायगा और ब्रह्मा प्रभृति सब जीव विनष्ट हो जायेंगे।

(उनके बल के विषय में) और क्या कहा जाय ? हमारे प्रभु रामचन्द्र, जिन्होंने भयकर त्रिपुरों को जला देनेवाले और भूमि और स्वर्ग के निवासियों के द्वारा प्रशंसित शिवजी के धनुष को तोड़ दिया था, उनके बल की अपेक्षा अधिक बल क्या किसी में हो सकता है।

(हमारे) रक्षक (राम) यदि ऐसी दशा को प्राप्त हुए होते, जैसा आपने सोचा है, तो तीनों लोक विध्वस्त हो गये होते। देव और मुनि मिट गये होते। उत्तम धर्म भी विनष्ट हो गया होता।

अधिक कहने की क्या आवश्यकता है ? महिमामय प्रभु ने वहाँ पर शर का प्रयोग किया है। उससे आहत होकर वह राक्षस वह दुहाई दे रहा है। उसके लिए आप द्रवीभूत होकर चिन्तित मत हों। निश्चिन्त होकर रहे।—यों लक्ष्मण ने कहा।

लक्ष्मण के इस प्रकार कहने पर, सीता का क्रोध और उबल उठा। उसे मरण की-सी वेदना होने लगी। उसका मन अत्यधिक घबरा उठा। वह निष्करुण होकर, लक्ष्मण के प्रति कठोर शब्द कहने लगी कि तुम्हारा यों खड़ा रहना नीति-मार्ग के अनुकूल नही है।

एक दिन का भी परिचय होने पर सच्चे बधु (अपने मित्र की सहायता के लिए) अपने प्राण तक देने को सन्नद्ध हो जाते हैं। किन्तु, तुम अपने ज्येष्ठ भ्राता को विपदा-ग्रस्त जानकर भी निर्भय हो स्थिर खडे हो। मेरे लिए (इनसे बुरी) और क्या गति हो सकती है ? अब मै अग्नि में गिरकर अपने प्राण का त्याग करूँगी।