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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

अरण्यकाण्ड ३८७

(संज्ञा पाकर) रोती हुई कहने लगी—हा ! मैने अज्ञान में पड़कर हरिण को पकड़कर लाने की बात कही और उसके फल-स्वरूप अपने जीवन-सर्वस्व को खो बैठी।

फिर, सीता ने लक्ष्मण से कहा—कलंक-रहित शुभगुणों से पूर्ण हमारे प्रभु, राक्षस की माया से विपदा-ग्रस्त हो गये हैं—यह विषय जानने के पश्चात् भी उनके भाई, तुम अभी तक मेरे निकट ही खड़े हो ? क्या यह उचित है ?

तब उस सत्यनिष्ठ (लक्ष्मण) ने समझाया—क्या आपका यह कथन उचित है कि इस लघु संसार में राम से भी अधिक पराक्रमी व्यक्ति है ? स्त्रीजनोचित बुद्धि के कारण ही आपने ऐसा कहा है।

हे स्त्रीत्व-गुण से पूर्ण देवि ! सप्त समुद्र, चतुर्दश भुवन, सप्त कुलपर्वत, इन सब प्रदेशों के निवासियो के क्षुद्र बल से क्या युद्ध मे राघव का विशिष्ट पराक्रम कभी घट सकता है ? (अर्थात्, कम नही हो सकता है।)

भूमि, जल, पवन, आकाश और अग्नि नाम के जो पदार्थ हैं, वे सब उन (राम) के क्रोध करने पर घबरा उठते हैं। मेघ-सदृश काले वर्णवाले उन कमल-नयन को आपने क्या समझा है, जो आप इस प्रकार व्याकुल हो रही हैं ?

क्या रामचंद्र निशाचरों से परास्त एव विपदा-ग्रस्त होकर दुहाई देंगे ? यदि कभी उन्हें वैसी दुहाई देनी भी पड़े, तो सारा ब्रह्मांड अस्तव्यस्त हो जायगा और ब्रह्मा प्रभृति सब जीव विनष्ट हो जायेंगे।

(उनके बल के विषय में) और क्या कहा जाय ? हमारे प्रभु रामचन्द्र, जिन्होंने भयकर त्रिपुरों को जला देनेवाले और भूमि और स्वर्ग के निवासियों के द्वारा प्रशंसित शिवजी के धनुष को तोड़ दिया था, उनके बल की अपेक्षा अधिक बल क्या किसी में हो सकता है।

(हमारे) रक्षक (राम) यदि ऐसी दशा को प्राप्त हुए होते, जैसा आपने सोचा है, तो तीनों लोक विध्वस्त हो गये होते। देव और मुनि मिट गये होते। उत्तम धर्म भी विनष्ट हो गया होता।

अधिक कहने की क्या आवश्यकता है ? महिमामय प्रभु ने वहाँ पर शर का प्रयोग किया है। उससे आहत होकर वह राक्षस वह दुहाई दे रहा है। उसके लिए आप द्रवीभूत होकर चिन्तित मत हों। निश्चिन्त होकर रहे।—यों लक्ष्मण ने कहा।

लक्ष्मण के इस प्रकार कहने पर, सीता का क्रोध और उबल उठा। उसे मरण की-सी वेदना होने लगी। उसका मन अत्यधिक घबरा उठा। वह निष्करुण होकर, लक्ष्मण के प्रति कठोर शब्द कहने लगी कि तुम्हारा यों खड़ा रहना नीति-मार्ग के अनुकूल नही है।

एक दिन का भी परिचय होने पर सच्चे बधु (अपने मित्र की सहायता के लिए) अपने प्राण तक देने को सन्नद्ध हो जाते हैं। किन्तु, तुम अपने ज्येष्ठ भ्राता को विपदा-ग्रस्त जानकर भी निर्भय हो स्थिर खडे हो। मेरे लिए (इनसे बुरी) और क्या गति हो सकती है ? अब मै अग्नि में गिरकर अपने प्राण का त्याग करूँगी।

३८८कंब रामायण

कमल के उद्यान में विहार करनेवाला हंस जिस प्रकार धुआँधार दावाग्नि में कूदने जाता हो, उसी प्रकार का कार्य करने के लिए प्रस्तुत (सीता) देवी की बातों को सुनकर उनकी रक्षा के लिए धनुष धारण करनेवाले (लक्ष्मण) ने उनके छोटे चरण-कमलों के सम्मुख धरती पर गिरकर साष्टांग नमस्कार किया। फिर बोला—

आप प्राण-त्याग करना क्यों चाहती हैं? आपकी बातों से मैं भयभीत हो रहा हूँ। (आपकी आज्ञा का) मैं उल्लंघन नहीं कर सकता हूँ। आप दुःख-मुक्त होकर यहीं रहें। यह दास जा रहा है। कठोर विधि-विधान को कौन रोक सकता है?

यह दास जा रहा है, कुछ अहित होने को है। आप कह रही हैं कि मैं प्रभु की आज्ञा का उल्लंघन कर यहाँ से जाऊँ। (मेरे जाने पर) आप अकेली रह जायेंगी। इसलिए सावधान रहिए।—यों कहकर उसस मन के साथ विदा होकर लक्ष्मण वहाँ से चलने लगे।

उस समय लक्ष्मण यह विचार करते हुए चले कि यदि मैं यहीं रहूँ, तो ये अग्नि में गिरेंगी। यदि मैं पर्वत-सदृश प्रभु के निकट जाऊँ, तो इनकी रक्षा न होने से कुछ अहित होगा। मुझे अपने प्राणों पर भी आसक्ति है। अब मैं क्या करूँ?—इस प्रकार सोचकर लक्ष्मण बहुत व्याकुल हुए।

यदि हो सके, तो धर्म से अहित को रोका जा सकता है। अझ मैं, जो पूर्वकर्म के परिणाम के फलस्वरूप इस प्रकार का जन्म पाकर यहाँ आकर इस विपदा में ग्रस्त हुआ हूँ, इन सीता की मृत्यु का कारण बनूँ—इससे तो यही उत्तम है कि मैं इस स्थान से हट जाऊँ।

फिर, सीता से कहा—मैं जा रहा हूँ। यदि (अहित) घटित हुआ, तो खगराज (जटायु) अपनी शक्ति-भर आपकी रक्षा करेगा। (यह कहकर) देवताओं के पुण्य-प्रभाव से महिमामय वह पुरुष-श्रेष्ठ (लक्ष्मण) उसी मार्ग से चल पड़ा, जिससे राम गये थे।

लक्ष्मण के वहाँ से जाते ही खड्ग-दांतोंवाला रावण, जो अवसर की ताक में छिपा बैठा था, अपनी वंचना को सफल बनाने के उद्देश्य से बाँस का त्रिदंड लिये अंतरशत्रुओं (अर्थात्, काम, क्रोध और मोह) के बंधनों से मुक्त हुए तपस्वी का वेष धारण करके आया।

उपवास रखनेवाले के समान उसकी देह दुर्बल थी। बहुत दूर तक पैदल चलकर आनेवाले के समान उसमें थकावट दिखाई पड़ती थी। नृत्य के संगीत के जैसे ही अति शुद्ध तथा वीणागान के समान मधुर शैली में (साम) वेद का गान करता हुआ वह (रावण) आया।

वह इस प्रकार मन्द-मन्द चलता था, जैसे पुष्पों की शय्या पर चल रहा हो। वह अपना पद इस प्रकार रखता था, मानों अग्नि-कणों पर चल रहा हो। उसके हाथ और पैर अनियंत्रित रूप से काँप रहे थे और उसमें अतिवार्धक्य दिखाई पड़ रहा था।

वह कमल के बीजों की एक जप-माला हाथ में लिये हुए था। उसके पास कूर्माकार एक आसन भी था। उसका शरीर झुका हुआ था। उसके वक्ष पर यज्ञोपवीत

अरयण्यकांड ३८६

शोभायमान था। इस वेष में वह, पवित्र अन्तःकरणवाली उस अरुंधती (के समान पति-व्रत्यवाली सीता) के आवास-भूत कुटीर के समीप आ पहुँचा।

देवताओं को भी मुग्ध करनेवाला (सन्यासी का) वेष धारण करके वह (रावण) उस कलकरहित पर्णशाला के द्वार पर पहुँचा और गलित कंठ से बोला—इस कुटीर में कौन है ?

कलापी-तुल्य वह देवी, यह सोचकर कि कपट-रहित मनवाले कोई तपस्वी आये हैं, इक्षुरस-समान मधुर स्वर में यह कहती हुई कि 'पधारिए ! पधारिए !' इस प्रकार उसके सम्मुख आ खड़ी हुई, जैसे कोई प्रवाल-लता हो।

उस (रावण) ने, लावण्य के भी लावण्य, यश के आगार और शील की मर्यादा उस देवी को अपनी आँखों से देखा और मदस्रावी मत्तगज के समान स्वेद से भरकर, लालसा-रूपी वीचियों से पूर्ण कामना-समुद्र में डूब गया।

अशिथिल कोकिल स्वर से युक्त, देव-स्त्रियों से भी उत्तम रूपवाली वह (सीता) देवी ज्योही उसके सम्मुख प्रकट हुई, उस (रावण) के विरह-तप्त मनकी क्या दशा हुई—इसके बारे में क्या वर्णन करे ? उसकी शक्तिशाली भुजाएं फूल उठी और फिर कृश हो गई।

उसकी नयन-पंक्ति, वन-मयूर जैसी (सीता) के सौंदर्य के दर्शन से, पुष्पों के समृद्ध मधु का छककर पान करके गानेवाले भ्रमरों के समान आनंद से मत्त हो उठी—ऐसा कहने में क्या बड़ाई होगी ? उसके मन के जैसे ही उसकी आँखें भी आनंदित हो गईं।

वह (रावण) यह सोचता हुआ कि अरुण-कमल के समान को तजकर मेरे ये बीस नयन यहाँ आई हुई इस सुन्दरी के रत्न-कांति से युक्त लावण्य को देखने के लिए क्या पर्याप्त हैं ? हाय ! मेरे एक हजार अपलक आँखें नहीं हैं।—व्याकुल हो खड़ा रहा।

उसने सोचा—कलाइयों पर कंकण-पंक्तियों से शोभित होनेवाली इस नारी-रत्न के साथ क्रीडा करते हुए आनंद के अपार समुद्र में निमग्न होने के लिए क्या कठोर तपस्या के प्रभाव से प्राप्त, साढ़े तीन करोड़ वर्ष की मेरी आयु भी पर्याप्त होगी।

(फिर, उसने सोचा) अब मैं इस सुन्दरी को तीनों लोकों की सम्राज्ञी बना दूँगा। सब सुर और, असुर अपनी पत्नियों के साथ इसकी सेवा में निरत रहकर जीवन व्यतीत करेंगे। और, मैं भी इसकी सेवा करता हुआ रहूँगा।

(उसने यह भी विचार किया) दुःख के समय में ही जब इसका मुख इतना लावण्यपूर्ण है, तब किंचित् दंत-प्रकाश से युक्त मदहास फैलने पर इसका मुख कितना मनोहर लगेगा ? मैं अपनी उस बहन (शूर्पणखा) को, जिसने इस पुष्प-भरित कुंतलोंवाली का अन्वेषण कर मुझे इसकी पहचान दी है, अपना राज्य दे दूँगा।

वह (रावण) उस स्थान पर आकर इसी प्रकार के विविध विचार करता हुआ मन में अनुचित इच्छा भरकर खड़ा रहा। उसे देखकर अस्खलित शीलवाली सीता ने अपने अश्रु पोछ लिये और कहा कि इस आसन पर आप आसीन हो जायें। (और एक आसन डाल दिया।)

३६०कंब रामायण

सीता ने उसका स्वागत करके एक वेत्रासन डालकर उसपर आसीन होने को कहा। तब अपने बड़े त्रिदंड को पार्श्व में रखकर वह कपटी सन्यासी उस सुन्दर पर्णशाला में बैठ गया। उस समय—

पर्वत और वृक्ष थरथरा उठे। कठोर पापकर्म करनेवाले उस राक्षस को देखकर पक्षी भी मौन हो रहे। मृग भयभीत हुए। सर्प अपने फन को समेटकर कहीं छिप गये।

आसन पर बैठने के पश्चात् उसने (सीता से) प्रश्न किया—यह कौन-सा स्थान है? यहाँ निवास करनेवाले तपस्वी कौन हैं? इसके उत्तर में विशाल नयनोंवाली वह देवी, यह सोचती हुई कि यह कोई निष्कपट सन्यासी है, जो इस स्थान के लिए अजनबी है, कहने लगी—

हे महात्मा ! दशरथ के प्रसिद्ध कुल में उत्पन्न उन प्रभु का नाम आपने सुना होगा, जो उत्तम कुल-जात अपनी माता की आज्ञा को शिरोधार्य करके अपने भाई के साथ बिना किसी दुःख के इस स्थान में आकर रहते हैं।

फिर, रावण ने प्रश्न किया मैने (यह समाचार) सुना है, किन्तु उन्हें (अर्थात्, राम को) मैंने देखा नहीं है। गंगा के समृद्ध जल से सिंचित (कोशल) देश को एकबार गया हूँ। नील कुवलय और बरछे के जैसे नयनोंवाली तुम किनकी सुपुत्री हो, जो अपने अमूल्य समय को इस अरण्य में व्यतीत कर रही हो?

तब कलंकहीन शीलवती उस (सीता) देवी ने उत्तर दिया—अनघ मार्ग पर चलनेवाले हे यतिवर ! मैं उन जनक की पुत्री हूँ, जिनका मन आप (जैसे मुनियों) के अतिरिक्त अन्य देवता का ध्यान भी नहीं करता। मेरा नाम जानकी है। मैं काकुत्स्थ की पत्नी हूँ।

फिर, उत्तम आभरण-भूषित सीता ने पूछा—आप अत्यंत वृद्ध हैं। कर्मभोग से मुक्ति पाने की इच्छा रखनेवाले आप कहाँ से इस समय, इस कठोर वन-मार्ग को पार करके आये हैं?

तब रावण कहने लगा (ऐसा एक व्यक्ति है), जो इन्द्र का भी इन्द्र है (अर्थात्, इन्द्र से भी बढ़कर प्रभावशाली); (चित्र में) अंकित करने के लिए असाध्य सौंदर्य से युक्त है। चतुर्मुख (ब्रह्मा) के वंश में उत्पन्न है, स्वर्ग-सहित सब लोकों पर शासन करनेवाला है और जिसकी जिह्वा वेदों के मंत्रों का आवास है।

जो ऐसी शक्तिवाला है कि उसने पूर्वकाल में शिवजी के निवासभूत महान् कैलासगिरि को जड़-सहित उखाड़ लिया था। जिसको भुजाएँ ऐसी हैं कि (उन भुजाओं ने) दिशाओं को वहन करनेवाले गजों पर आघात करके उनके दाँतों को चूर-चूर कर दिया था।

जिसके द्वार के रक्षक स्वयं देवता हैं। जिसकी महिमा का गान करने की शक्ति शब्दों में नहीं है। जिसके अधीन कल्पतरु आदि देवलोक की सब विभूतियाँ हैं। जिसका सुन्दर विश्राम-स्थान गम्भीर समुद्र से आवृत स्वर्णमय लंका नगरी है।

जिसके वैभव से आकृष्ट होकर सुन्दर मन्दहास से युक्त तिलोत्तमा आदि अप्सराएँ

अरण्यकाण्ड ३६१

स्वर्गलोक को छोड़कर (उसकी लंका में) आ गई हैं और (उसकी सेवा में रहकर) उसके पानदान उठाना, (उसके) पैर सहलाना, उसकी पादरक्षा लाना इत्यादिकार्य करती रहती हैं।

चन्द्रमा और सूर्य, उसके मन को देखकर (उसके अनुसार) संचरण करते हैं। दिव्यकांति से युक्त इन्द्र आदि देवता, इस लोक में स्थित उसके मेघस्पर्शी प्रासाद की रख-वाली करते हैं।

इस धरती पर स्थित उसकी उस लंकापुरी में, जो स्वर्णमय अमरावती, मनोहर नागलोक की राजधानी और इस विशाल भूलोक के सब नगरों से बढ़कर सुन्दर है, रहने-वाली सब वस्तुएँ दोषरहित हैं।

कमलभव (ब्रह्मा) के द्वारा दिये गये वर के प्रभाव से वह अनन्त आयुवाला है। वह अपने विशाल कर में, अर्धाङ्ग में अपनी स्त्री को धारण करनेवाले (शिवजी) के द्वारा प्रदत्त करवाल रखता है। उसने सब ग्रहों को कारागार में बन्दी बना रखा है। वह सब गुणों में महान् है।

वह क्रूरता से रहित सदाचरणवाला है। विस्तृत शास्त्र-ज्ञान से युक्त है। तटस्थ स्वभाववाला है (अर्थात्, पक्षपात से हीन बुद्धिवाला है)। उसका यौवन ऐसा है कि उसे देखकर मन्मथ भी (आश्चर्य में) स्तब्ध रह जायें। सब लोकों के निवासी जिन त्रिदेवों को अपने देवता मानते हैं, उन (त्रिमूर्तियों) की समस्त शक्ति से वह संपन्न है।

सब लोकों में रहनेवाली असंख्य सुन्दरियाँ उसकी कृपा को प्राप्त करने की लालसा रखती हैं। उसका ध्यान करती हुई वे सुन्दरियाँ कृश होती रहती हैं। तो भी वह उन सब की उपेक्षा करके अपने हृदय को सुख करनेवाली एक रमणी को खोज रहा है।

इस प्रकार के पुरुष द्वारा शासित उस वैभव-पूर्ण नगरी में कुछ दिन निवास करने की इच्छा से मैं वहाँ गया। दीर्घकाल तक वहीं रह गया। अब उस (पुरुष) से दूर होने की इच्छा न होते हुए भी किसी-न-किसी प्रकार वहाँ से चलकर इस स्थान में आया हूँ।—यों उस मायावी ने कहा।

तब सीता ने उस कपट-संन्यासी से पूछा—अपने शरीर को भी भार माननेवाले हे मुनि श्रेष्ठ ! वेदों तथा उन वेदों के ज्ञाताओं की कृपा की कामना न करके, लालच के साथ प्राणियों को खानेवाले उन क्रूरकर्मा राक्षसों के नगर में जाकर आप क्यों रहे?

अरण्य में स्थित महातपस्वियों के समीप जाकर आप नहीं रहे; जल-संपत्ति से परिपूर्ण देशों में निवास करनेवाले पवित्र स्वभाववालों के ग्रामों में जाकर भी आप नहीं रहे। किन्तु, धर्म का स्मरण तक नहीं करनेवाले राक्षसों के मध्य जाकर रहे। यह आपने क्या किया?—इस प्रकार सीता ने कहा।

उस मर्यादाहीन (अर्थात्, धर्म की मर्यादा से परे रहनेवाले) ने यौवनवती देवी के कथन को सुना और उनकी निष्कपटता को देखा, जो यह कहते हुए भी कि वे राक्षस कठोर नेत्रवाले और भयङ्कर खड्गवाले हैं—भयविह्वल हो रही थीं। फिर, यों उत्तर दिया—हे चन्द्रमुखि ! राक्षस देवताओं के समान क्रूर नहीं हैं। हम जैसे व्यक्तियों के लिए वे अच्छे ही हैं।

३६२कंब रामायण

उसके यह कहने पर सुन्दर आभरण-भूषित सीता यह न जानने से कि माया में चतुर राक्षस कामरूपी है, उसपर कुछ संदेह न करती हुई बोली— पापियों से स्नेह करनेवाले लोग पवित्र नहीं होते। विचार करने पर यही कहना पड़ेगा कि वे भी (अर्थात्, पापियों से स्नेह रखनेवाले भी) उस पाप के भागी होते हैं।

तब रावण ने यह आशंका करके सीता कदाचित् उसपर संदेह कर रही है, उस संदेह को दूर करने के विचार से दूसरे ढंग से कहा कि तीनों लोकों के विवेकी पुरुषों के लिए उन बलशाली राक्षसों के स्वभाव के अनुकूल रहने के अतिरिक्त अन्य क्या आचरण संभव हो सकता है?

(दूसरों की) मनोदशा को पहचाननेवाले उस मायावी के यह कहने पर सद्‌गुणों में बड़ी हुई देवी ने कहा—धर्म के रक्षक उदार गुणवाले वे (रामचन्द्र) जबतक इस अरण्य में तपस्साधना करते रहेंगे, तबतक पाप-कर्म से जीनेवाले राक्षस अपने बंधु-सहित मर मिटेंगे। उसके पश्चात् संसार के कष्ट भी मिट जायेंगे।

हरिण-समान उस सीता के यह कहते ही वह (रावण) बोल उठा—हे मीन-जैसे चमकते नयनोंवाली! यदि मनुष्य, राक्षसों का समूल नाश करनेवाले हों तो (इसका अर्थ यह हुआ कि) एक छोटा खरगोश हाथियों के झुंड को मार देगा और एक हिरण का बच्चा वक्र नखोंवाले सिंह को मार देगा।

तब सीता ने कहा—घनीभूत विद्युत्-पुंज-जैसे केशोंवाले विराध तथा क्रोध के ताप से भरे मनवाले विजयी खर आदि राक्षसों के (राम हाथों) मरने का समाचार कदाचित् आपने नहीं सुना है। यह कहकर राम को उस समय जो क्लेश उठाना पड़ा था, उसका स्मरण करके वह देवी आँखों से अश्रु की वर्षा करने लगी।

फिर, आगे उन देवी ने कहा—आप कल ही देखेंगे कि प्रतापी सिंह-सदृश मेरे प्रभु से लंका के निवासी अपने कुल-सहित कैसे मिटते हैं और देवों की उन्नति कैसे होती है। क्या अधारणीय धर्म को पाप जीत सकता है? आप, दोषहीन मुनिवर क्या यह नहीं जानते?

वह रावण, जिसका मांसल शरीर (सीताजी की) मधुमिश्रित अमृत-जैसी अति मृदुल वाणी के उसके कानों में पड़ने से फूल उठा था, अब इस वचन को सुनकर कि मानव अधिक बलवान् है, अभिमान के उमड़ने से क्रोध से भर गया।

उस क्रोधी ने कहा—एक मनुष्य ने (अर्थात्, राम ने) धनुर्बल में क्षुद्र उन राक्षसों को मारा। यदि तुम इस बात की बड़ाई करती हो, तो कल ही तुम इसका परिणाम देखोगी कि (रावण की) बीस भुजाओं की हवा-मात्र लगने से वह मनुष्य (अर्थात्, रामचन्द्र) सेमर की रूई के जैसे उड़ जायगा।

निरर्थक वचन कहनेवाली हे मुग्धे! यदि मेरु पर्वत को उखाड़ना हो, ब्रह्मांड के खप्पर को तोड़ देना हो, समुद्र के जल को आलोड़ित करना हो, अथवा पृथ्वी को उठा लेना हो, इस प्रकार के अनेक कार्य करने हों, तो भी रावण के लिए ये सब सुलभ हैं। उसके लिए कौन-सा कार्य कठिन हो सकता है? तुमने क्या समझकर ये बातें कही हैं?

इस समय सीता के मन में संदेह उत्पन्न हुआ कि यह कर्म के द्वन्द्व से मुक्त मुनि

अरण्यकाण्ड ३६३

नहीं है। फिर, यह सोचती हुई खड़ी रही कि यह कौन हो सकता है ? इतने मे वह कपट सन्यासी ऐसा बन गया जैसा कोई विषधर कालमप क्रोधानल से उत्तप्त होकर अपना फन फैलाकर खड़ा हो गया हो।

(राम के वियोग से) पहले से ही अत्यन्त विषण्ण वह देवी, इस समय जिम प्रकार के दुःख मे निमग्न हुई, यदि उसके बारे में विचार करें, तो विदित होगा कि इससे बढ़कर अन्य कोई कही दुःख हो ही नहीं सकता। उन देवी के पास ऐसा कोई शब्द नही रहा, जिसे वे धीरज के साथ उम राक्षस को कह सकें। उनसे कोई काम भी करते नही बनता था। वे इस प्रकार विकम्पित हुईं, जिस प्रकार यम के आने पर प्राण काँपने लगते हैं।

तब रावण ने कहा—देवता लोग भी मेरी सेवा करते हे। ऐसे मेरे पराक्रम को तुमने नही जाना और (तुमने) मिट्टी के कीड़े-जैसे जीनेवाले मनुष्य को बलवान् कहा। तुम स्त्री हो, अतः बच गई, नहीं तो मैं तुमको पीसकर खा डालता। पर यदि वैसा करने का विचार भी करूँ, तो मेरे प्राण मिट जायेगे—(अर्थात्; तुम्हे मार डालूँगा, तो तुम्हारे वियोग में मैं भी मर जाऊँगा, अतः तुम्हें नहीं मारूँगा)।

हे हंसिनि ! भयविकम्पित मत होओ। जो मेरे मिर इसके पहले किसी के सामने नहीं झुके, उनपर वारी-वारी से, मुकुट के समान तुम्हे वहन करके मै आनंदित होऊँगा। असंख्य आभरणो से भूषित देव-सुन्दरियाँ तुम्हारी चरण-सेवा करेंगी। यों तुम चतुर्दश भुवन की सम्राज्ञी बनकर रहोगी।

ये वचन सुनते ही सीता ने झट अपने कर-पल्लवो से कानो को वन्द कर लिया। फिर कहा—अरे राक्षस ! मनोहर तथा भयंकर धनुष को धारण करनेवाले उनके कर, तथा विजय से शोभायमान काकुत्स्थ के प्रति अनन्य प्रेम तथा पातिव्रत्य रखनेवाली मेरे प्रति तू ने ससार के उत्तम धर्म की उन्नति के लिए प्रज्वलित वह्नि मे पवित्र ऋषियो के द्वारा देने योग्य हवि को खाने की इच्छा करनेवाले कुत्ते-जैसे (होकर), क्या कहा ?

घास की नोक पर रहनेवाली ओस की बूँद के जैसे क्षण-भगुर जो प्राण हैं, उनके खो जाने के भय से क्या मै उत्तम कुल के योग्य आचरण को त्याग दूँगी ? यह संभव नही। यदि तू अपने प्राणो की रक्षा करना चाहता है, तो बिजली के जैसे चमकते हुए वज्र के जैसे छोप करनेवाले तीक्ष्ण (राम के) बाण के लगने के पूर्व ही यहाँ से भाग जा।

सीता का यह वचन सुनकर उम क्रूर राक्षस ने कहा—दिशाओं को वहन करने- वाले हाथियों के अतिदृढ दाँतो को तोडनेवाले मेरे वक्ष पर यदि तुम्हारे पति का बाण आकर लगेगा, तो वह पर्वत रग गिरी हुई पुष्पमाला-जैसा जान पड़ेगा।

लक्ष्मी के लिए भी लक्ष्मी होनेवाली हे सुदरि ! तुम्हारे प्रति उत्पन्न प्रेम की व्याधि के कारण मेग शरीर दुर्बल हो रहा है। मुझे प्राण-दान करो और स्वर्गवासिनी घने केशोवाली अप्सराओं के लिए भी दुर्लभ पद को प्राप्त करो—यों कहकर भूधर से भी दृढ भुजावाले रावण ने उसे नमस्कार किया।

ज्योंहि वह (रावण) सीता के चरणों को प्रणाम करने के लिए झुका-त्योंही

३६४कंब रामायण

क्षमा की मूर्त्ति और अनुपम सुन्दरी वह देवी, इस प्रकार व्याकुल होकर जैसे मर्मस्थान में रक्ताचित खड्ग धँस गया हो, हे प्रभु ! हे अनुज ! कहकर पुकार उठी ।

उस समय, उस क्रूर (रावण) ने, पहले दिये गये अपने इस शाप¹ का स्मरण करके कि उसे परनारी का स्पर्श (उसकी इच्छा के बिना) नहीं करना चाहिए, अपनी स्तम्भ-जैसी बलवान् एवं ऊँची भुजाओं से उस आश्रम के स्थान को ही नीचे से एक योजन पर्यन्त खोदकर उठा लिया ।

(इस प्रकार सीता को उनके आश्रम के साथ) उठाकर उसने अपने रथ पर रख लिया । सुन्दर ककण-भूषित सीता ने रावण का यह कार्य देखा । किन्तु, अपने प्राणों (के समान प्रभु) को नहीं देखा । वह इस प्रकार मूर्च्छित हो गिर पड़ी जैसे मेघों से छूटकर कोई बिजली धरती पर आ गिरी हो । तब उस (रावण) ने आकाश-मार्ग से जाने का विचार किया । (१—७५)

अध्याय ६

जटायु-मरण पटल

रावण ने अपने सारथी से कहा कि रथ आगे बढ़ाओ । उस कथन को सुनकर सीता अग्नि में पड़ी हुई पुष्प-लता के समान तड़पने लगी । वह नीचे गिरकर लोटती । विह्वल होकर काँपती । मूर्च्छित होती । पीडा से छटपटा उठती । 'हे धर्म देवता ! इस विपदा से शीघ्र मुझे बचाओ'—यों प्रार्थना करती ।

(सीता कहती—) हे पर्वतो ! हे वृक्षो ! हे मयूरो ! हे कोयलो ! हे हरिणो ! हे हरिणियो ! हे हाथियो ! हे करिणीयो ! हे मेरे कातर प्राणो ! तुम मेरे प्रभु के निकट शीघ्र जाओ और उन अचंचल बलवान् वीर से मेरा हाल कहो ।

हे मेघो ! हे उद्यानो ! हे वनदेवताओ ! उत्तम वीर, वे मेरे प्रभु कहाँ हैं ? क्या तुम जानते हो ? यदि तुम मुझे अभयदान दो, तो मैं जीवित रह सकती हूँ—इससे तुम्हारी क्या हानि हो सकती है ?

हे वरद ! हे अनुज ! क्या आप (दोनो), कालमेघ के समान शरवर्षा करते हुए और राक्षस आदि क्रूर जनो का विनाश करते हुए यहाँ नहीं आयेंगे ? हे निष्कलंक भरत ! हे अनुज (शत्रुघ्न) ! क्या तुम अपयश के भागी बनोगे ?


¹ यह कथा प्रसिद्ध है कि एक बार रंभा अपने प्रियतम कुबेर के पुत्र नलकुबर से मिलने के लिए जा रही थी । मार्ग में रावण ने बलात् उसको पकड़ लिया । तब रंभा और नलकूवर ने रावण को यह शाप मिला कि यदि आगे कभी वह किसी स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उसका स्पर्श करेगा, तो उसके सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे और पतिव्रता स्त्री के पातिव्रत्य की अग्नि में वह जल जायगा । इसी भय के रहने से रावण ने सीता का स्पर्श नहीं किया ।—अनु०

अरण्यकाण्ड ३६५

हे गोदावरि ! तू शीतल है। तू द्रवीभूत है। तू माता-समान है। तेरा अन्तः-करण स्वच्छ है। तू दौड़कर जा और कुछ न कहने पर भी (दर्शन मात्र से मन की बात) समझने की शक्ति रखनेवाले मेरे प्रभु के निकट पहुँच जा और मुझ अभागिन का समाचार उन्हें दें।

सम्मुख दिखनेवाले हे निर्झरो ! पर्वत-कंदराओ मे निवास करनेवाले सिंहो ! तुम (मेरे प्रभु को) यह समाचार देकर उनसे धरती के साथ मुझे उठा ले जानेवाले इस रावण की बीस भुजाओ और उसके दस सिरों को विध्वस्त कराके आनंदित होओ।

इस प्रकार के विविध वचन कहकर मुक्त होने की इच्छा से रोनेवाली सीता को देखकर, अपने जीवन के दिनो को व्यर्थ करनेवाले उस रावण ने कहा—हे स्वर्णहारो से भूषित संयुत स्तनोवाली ! स्वर्णमय कर्णाभरणो से शोभायमान हे सुन्दरि ! वे मनुष्य क्या युद्ध में मुझे मारकर तुम्हे मुक्त कर सकेंगे ? और, अपने बलिष्ठ हाथो से ताली बजाकर ठठाकर हँस पड़ा।

उसके यों कहने पर सीता ने कहा—तूने माया से एक कपट-हरिण बनाया। तेरे प्राणो के लिए यम-सदृश प्रभु को तूने आश्रम से बाहर भेजने का उपाय किया। फिर, आश्रम में घुसकर मुझे हरकर ले जा रहा है यदि उनसे (अर्थात्, राम से) युद्ध करने की शक्ति तुझमे है; तो अपना रथ आगे न बढ़ा।

फिर सीता ने कहा—यदि तुम वीर होते तो, क्या यह सुनने के पश्चात् भी कि तुम्हारे कुल के राक्षसो को क्षणकाल में मारनेवाले और तुम्हारी बहन की नाक-कान काटने-वाले मनुष्य अरण्य मे ही हैं। (उन मनुष्यो के साथ युद्ध कर उन्हे मारे बिना), इस प्रकार माया करके मेरा अपहरण करते ? यह भय से उत्पन्न तुम्हारे मन की कायरता ही तो है ?

सीता के यह कहने पर रावण ने उससे कहा—हे नारीरत्न ! सुनो ! बलहीन शरीरवाले क्षुद्र मनुष्यो के साथ यदि मैं युद्ध करूँ, तो ललाट-नेत्र के पर्वत (हिमालय) को उठानेवाली मेरी भुजाओ का अपमान होगा। उस अपवाद की अपेक्षा ऐसी माया ही फलप्रद है न ?

मनोहर नयनोवाली प्रतिमासमान सुन्दर देवी ने वह वचन सुनकर कहा—अपने कुल के जो शत्रु हैं, उनके सम्मुख जाना अपमान है। उनके साथ करवाल लेकर युद्ध करना अपमान है। किन्तु, पतिव्रताओ को धोखा देना अपमान नहीं है। अहो ! निष्करुण राक्षसो के लिए अपमान क्या है ? अपयश क्या है ?

इस समय, 'अरे ! तू कहाँ जा रहा है ? ठहर, ठहर'—यों गर्जन करता हुआ, आँखो से क्रोध की अग्नि उगलता हुआ, विद्युत् के जैसे चमकती हुई चोंच के साथ जटायु ऐसा आया, मानो मेरु नामक स्वर्णमय पर्वत ही गगन-मार्ग से उड़कर आ गया हो।

उसके दोनो पंखो के हिलने से ऐसा प्रभंजन उठा कि उससे बडे-बडे पर्वत अपने स्थान से उखड़कर उड़ते और एक दूसरे से टकराकर चूर-चूर होकर धूल बनकर उड़ गये। समुद्र का जल गगन में भर गया और जल और थल एकाकार हो गये। ऐसा लगता था, जैसे प्रलयकालीन पवन विश्व-भर में फैल रहा हो।

३६६

कम्ब रामायण

वृक्ष अपनी सब शाखाओं के साथ धरती पर लंबे हो गिर गये। गगन के मेघ, अन्तरिक्ष में बहुत ऊपर कही उड़ गये। सर्प, यह सोचकर कि उग्र रूप गरुड ही नभोमार्ग से आ रहा है, अपने फन समेटकर छिप गये।

जटायु के दोनों पंखों की हवा के वेग के कारण, हाथी, शरभ आदि मृग, वृक्ष, कूज, शिलाएँ तथा सब अरण्य उड़कर अन्तरिक्ष में भर गये। जिससे अंतरिक्ष और अरण्य दोनो स्थानान्तरित-से हो गये।

जटायु अपने विशाल तथा बलवान् पंखों को फैलाये, यह कहता हुआ आया कि पुरुषोत्तम (राम) की देवी को भूखंड-सहित ऊँचे रथ पर रखे, तू कहाँ ले जा रहा है? मैं गगन को और सब दिशाओं को (अपने पंखों से) आवृत कर दूँगा (जिससे तेरे जाने का मार्ग नहीं रहे)।

गुणहीन उस (रावण) के यन्त्रमय रथ की गति को रोकने के विचार से, सिंदूर जैसे लाल पैर और सिर एवं सध्याकाश-जैसे कंठ के साथ, कैलास पर्वत के जैसे आकार-वाला गृद्धराज (जटायु) आ पहुँचा।

उस समय वहाँ आकर उस (जटायु) ने उस स्त्री-रत्न को देखकर कहा—डरो नहीं। फिर यह जानकर कि (रावण ने सीता का) स्पर्श नहीं किया है, अपने उमड़ते क्रोध को किंचित् शान्त करके रावण से कहने लगा—

तू मिट गया। तू ने अपने बन्धुवर्ग-सहित, अपने जीवन को जला दिया। अरे तू यह क्या करने लगा है? यह जान ले कि तू मर गया। इस देवी को छोड़कर चला जा। यदि ऐसा करेगा, तभी जीवित रह सकेगा।

हे मूढ़! तूने अपराध किया है। विश्व की माता-समान देवी को तूने अपने मन में क्या समझा है? हे विवेकहीन! अब तेरा सहारा कौन है? (अर्थात्, विश्व की माता के प्रति अपराध करने पर तेरी रक्षा करनेवाला कोई नहीं रहा।)

हे राजन्! क्या तू नहीं जानता कि राम ने तेरे कुलवालों के साथ घोर युद्ध करके उनके प्राणों को यमराज का सुन्दर भोजन बनाया था और यम ने हाथो में भर-भर-कर नवीन भोजन पाकर आनन्द उठाया था?

तुम को मारने के लिए दौड़कर आनेवाले क्रोधी तथा घोर मत्तगज पर तू मिट्टी का ढेला फेंकना चाहता है। घोर विष को खाकर, भले ही तू यह न जाने कि वह (विष) प्राणहारी है, फिर भी क्या अपने प्राणों को स्थिर रख सकेगा?

तीनो लोको के निवासी, देवेंद्र, त्रिमूर्त्ति, यम आदि सब राम के आगे ऐसे रहते हैं जैसे व्याघ्र के सम्मुख हरिण हो। अति उत्तम धनुर्धारी राम को जीतने की शक्ति किसमें हैं?

इस संसार में अपने कुल के साथ विनाश पाने का इससे बढ़कर अन्य कुछ उपाय नहीं है। इतना ही नहीं। दूसरे जन्म में भी (यह कार्य) घोर नरक देनेवाला है। तूने इस कार्य को अपने किस जन्म के लिए सुखप्रद समझा है?

ये मानव (राम और लक्ष्मण) त्रिदेवों में प्रधान तथा (सारी सृष्टि के) आदि

अरण्यकाण्ड ३६७

कारणभूत परमतत्त्व (अर्थात्, विष्णु) ही हैं। अतः, इनकी समता किस देवता के साथ की जा सकती है ? तुझमें विवेक नही है । अतः, पागल होकर तूने यह अपराध किया है ।

उस अविनाशी तत्त्व (अर्थात्, रामचन्द्र) के धनुष से शर के निकलते ही त्रिपुरों को जलानेवाले वृषभारूढ शिवजी की कृपा से प्राप्त तेरे वरदान और तेरी सारी विद्याएँ विनष्ट हो जायेंगी।

स्वर्ग के राज्य में आनन्द पानेवाले चक्रवर्त्ती (दशरथ) के पुत्र (राम) अपना धनुष झुकाये हुए तेरे सम्मुख आ जायं, तो उन्हे रोकना असम्भव होगा। मैं इस सुन्दर ललाट-वाली देवी को उनके आवास में पहुँचा दूँगा । तू शीघ्र यहाँ से भाग जा । जटायु के इस प्रकार कहते ही—

रावण अपनी उज्ज्वल आँखों से चिनगारियाँ उगलने लगा । ओठ चबाते हुए उसने जटायु को देखकर कहा—अब ज्यादा बक-बक मत कर । अब शीघ्र तू उन मानवों को दिखा ।

सम्मुख आनेवाले ऐ गिद्ध ! मेरे शर से तेरी छाती में बड़ा छेद न हो जाय, इसलिए तू अभी यहाँ से हट जा । गरम किये हुए लोहे में पड़ा हुआ जल उससे कदाचित् निकल भी आ जाये, किन्तु मेरे हाथों में पड़ी इक्षु-समान बोलीवाली यह सुन्दरी मुक्त नही हो सकती, तू यह जान ले ।

इस समय जटायु ने हंसिनी-तुल्य सीता को दुगुने डर से काँपती हुई देखकर कहा—हे माता ! इस राक्षस की देह अभी टुकड़े-टुकड़े हो जायगी । अतः, यह सोचकर कि प्रभु (राम), धनुष लेकर नहीं आये हैं, तुम चिंतित मत होओ ।

तुम व्याकुल होकर मुक्ता के समान अश्रुओं को अपने मुख पर से स्तन-तटी पर गिराती हुई दुःख मत करो । इसके दस शिरो को ताड़ के फलो के गुच्छे के समान मैं तोड़ दूँगा और इसके द्वारा वशीभूत दसों दिशाओ को (उन शिरो को) मै बलि के रूप में अर्पण करूँगा ।

फिर जटायु, रावण के शिरों की पंक्ति को गरजते मुँह से काटकर गिराने के लिए अपने पंखो से वज्र की ध्वनि उत्पन्न करते हुए शीघ्र उड़कर आया और रावण की मनोहर, विशाल, वीणा के चित्र से युक्त ध्वजा को तोड़कर देवों के आशीर्वाद का पात्र बना ।

रावण, जो पहले कभी इस प्रकार के अपमान का भाजन नही बना था, उस समय अपनी आँखों को पिघली लाख जैसे लाल करके ठठाकर हँस पड़ा और सप्तलोकों को भयभीत करते हुए पर्वत के जैसे अपने धनुष को एव अपनी भौंहो को झुका लिया ।

अर्धचन्द्र के जैसे वक्र खड्ग-दन्तोंवाले उस (रावण) के शरों की घोर वर्षा जटायु पर होने लगी । जटायु ने कुछ शरो को अपने दृढ नखो से तोड़ दिया, कुछ शरों को यम को भी भयभीत करनेवाली चोंच से छिन्न-भिन्न कर दिया ।

विशाल और भयकर आँखोंवाले असंख्य सर्पों को एक साथ मिटानेवाले गरुड के समान जटायु, (रावण के) दशों शिरों पर अपनी चोंच नामक चक्रायुध को बढ़ाकर, उसके पुन. अपने धनुष को झुकाने के पूर्व ही उसके निकट पहुँच गया और उसके कुण्डलों को छीनकर उड़ गया ।

३६८कंब रामायण

तब बड़ा गर्जन करता हुआ रावण ने, चौदह बाणों को जटायु के विशाल वक्ष पर इस प्रकार छोड़ा कि वे (बाण) उसके वक्ष को भेदकर पार हो गये। फिर, उसपर अनेक बाण और छोडे। देवता, यह सोचकर कि जटायु अब गिर गया, भय-कंपित होकर उष्ण निःश्वास भरने लगे।

वह गृद्धराज अपने घावों से रक्त की अविरल धारा बहाता हुआ उस मेघ के जैसा लगता था, जो धरती पर खर आदि राक्षसों के रक्त-प्रवाह को समुद्र समझकर (उसे) पीने के पश्चात् उस (रक्त-रूपी) जल को बरसाकर श्वेत वर्ण हो रहा हो।

इस प्रकार का जटायु क्रुद्ध हुआ। निःश्वास भरा। रावण की बीस भुजाओं के मध्य झपटा। अपनी चोंच से मारा। नखों से खरोंचा। अपने पंखो से आघात किया और उस (रावण) के मुक्ताहार-भूषित वक्ष पर के कवच के बंधनो को ढीला कर दिया।

यों अपने कवच को ढीला करनेवाले जटायु पर रावण ने एक सौ बाण चलाये। तब देवता भी भय-विकंपित हुए। इतने में जटायु ने उछलकर रावण के धनुष को चोंच से पकड़कर छीन लिया। यह देखकर देवता हर्षध्वनि कर उठे।

उज्ज्वल रजताचल (हिमाचल) को उसपर निवास करनेवाले शिवजी-सहित अपने बलवान् कंधों पर उठानेवाले उस (रावण) के धनुष को जटायु ने अपनी चोंच से पकड़कर खींच लिया और ऊपर उड़ा, तो वह इन्द्र-धनुष के साथ गगन में उड़नेवाले मेघ के समान लगा। उस (जटायु) के बल का वर्णन कौन कर सकता है ?

जिस रावण ने (युद्ध मे) कभी अपनी पीठ न दिखानेवाले सहस्रनेत्र (इन्द्र) को भी अपने शस्त्र से पीडित किया था और भगा दिया था, उस (रावण) के धनुष को उस जटायु ने अपनी चोंच से छीन लिया और अपने पैरो से तोड़ दिया। जो (जटायु) रक्तवर्ण देव (शिव) के धनुष को अपने हाथो से तोड़ देनेवाले (राम) का सहायक था और उनके पिता का प्रिय मित्र था।

विश्वकंटक रावण, अपने बल के योग्य उस धनुष को टूटते हुए देखकर क्रुद्ध हुआ और अपने पराक्रम में कुंठित न होकर, विषकंठ (शिव) के त्रिपुर-दाह करनेवाले अनुपम शर के समान (भयंकर) शूल को उठाकर जटायु पर प्रयुक्त किया।

तब गृद्धराज ने, इस विचार से कि वह (रावण) कही मुझे शक्तिहीन न समझ ले, यह कहते हुए कि, देख मेरी शक्ति को, उस (रावण के) त्रिशूल को अपनी छाती पर रोक लिया। तब स्वर्ग के निवासी (देवता) यह सोचकर कि इस प्रकार का कार्य करने-वाला पराक्रमी दूसरा कोई नही है, अदृश्य खडे रहकर ही अपनी भुजाएँ ठोंकने लगे।

वह त्रिशूल (जटायु के वक्ष से टकराकर) इस प्रकार लौट आया, जिस प्रकार, धन पर लक्ष्य रखनेवाली वारनारियो की संगति की कामना करनेवाले निर्धन पुरुष (उन वारनारियो के पास से) लौट आते हैं, मधुर दृष्टि रखनेवाली गृहिणी-विहीन¹ गृहों में


¹ अतिथि उसी घर में आतिथ्य पाना चाहते हैं, जहाँ गृहिणी मीठी वाणी से उनका स्वागत-सत्कार करती है; अन्यथा अतिथि लौट जाते हैं।—अनु०

अरण्यकाण्ड ३६६

जानेवाले अतिथिजन (आतिथ्य-सत्कार न पाकर) लौट आते हैं और आत्मदर्शी योगियो के पास जानेवाली मनोहर कामिनियाँ (विफल होकर) लौट आती हैं।

शूल के व्यर्थ हो जाने पर रावण शीघ्र ही कोई दूसरा शस्त्र उठाकर प्रयुक्त करे, इसके पूर्व ही जटायु ने, रावण के, गगन को आवृत करनेवाले तथा ऊँचे अश्व-जुते रथ पर स्थित सारथि का शिर काट दिया और पतिव्रता-रत्न (सीता) पर आसक्त होनेवाले उस रावण के मुख पर, उसे दुःखी करते हुए, (उस शिर को) फेंक दिया।

इस प्रकार (शिर को) फेंकनेवाले के कार्य को देखकर रावण ने उस (जटायु) की हृदय की धीरता को समझ लिया और अत्यन्त क्रुद्ध होकर अपनी अभ्यस्त (अर्थात्, जिसका प्रयोग करने का वह अच्छा अभ्यासी था ऐसी) स्वर्णगदा को उठाकर ऐसा आघात किया कि अग्नि की ज्वालाएँ निकल पड़ीं। (उस आघात से) गृद्धराज धरती पर एक बड़ा पर्वत-जैसा आ गिरा।

ज्योंही जटायु धरती पर गिरा, त्योंही रावण उत्तम अश्वों से युक्त अपने रथ को इतने वेग से चलाता हुआ कि (किसी की) दृष्टि भी उसका पीछा न कर सके, गगन में उड़ गया। तब मृदु स्वभाववाली सीता देवी इस प्रकार तड़प उठीं, जैसे किसी के घाव में अग्निकण प्रविष्ट हो गया हो।

कोमल पल्लव-समान उस (सीता) देवी को शोक-विह्वल होती हुई देखकर जटायु कह उठा—हे हसिनि ! शोक में मत डूबो। निर्भय रहो—और निःश्वास भरता हुआ वह उठा। फिर (रावण से) यह कहकर कि अरे ! अब तू बचकर कहाँ जायगा, उसके रथ पर झपटा, जिसे देखकर देवता हर्ष-ध्वनि कर उठे।

इस प्रकार झपटकर उस (रावण) की विविध रत्न-जटित गदा को छीनकर दूर फेंक दिया। अपनी चोंच-रूपी खड्ग् को चला-चलाकर (रावण के) रथ में जुते अतिवेग-वान् सोलहों अश्वों को छिन्न-भिन्न करके विध्वस्त कर दिया। वह दृश्य देखकर यम भी (भय से) हाथ कँपाता हुआ खड़ा रहा।

जटायु ने रावण के दृढ रथ को व्यस्त करने के पश्चात् उसके दृढ कंधो से बँधे उन तूणीरों को, जो गगनोन्नत थे और धनुष के टूट जाने से युद्ध के लिए अनुपयोगी होकर लोभी के धन-कोष-जैसे लगते थे, अपने तीक्ष्ण नखों से छीनकर फेंक दिया।

फिर, जटायु ने उसके वक्ष और कंधों पर विचित्र ढंग से आक्रमण करके अपने पखों से उसे मारा और चोंच से काटा। तब रावण शक्तिहीन होकर मूर्च्छित हो गया और सिर झुकाये पड़ा रहा। उसे देखकर जटायु ने कहा—बस ! इतनी ही तेरी शक्ति है ?

उस समय, साकार शक्ति-जैसे बरछे को धारण करनेवाला वह (रावण) क्रुद्ध हुआ और प्रयोग के योग्य अन्य कोई शस्त्र न देखकर, जटायु के प्राणो का तत्क्षण अन्त कर देने के विचार से (लक्ष्य से) न चूकनेवाले अपने करवाल को उठाकर ठीक से चलाया।

वह दिव्य करवाल किसी के लिए अवारणीय था और किसीका भी सिर काट सकता था। जटायु की आयु भी क्षीण हो गई थी। अतः, कभी शक्तिहीन न होनेवाला जटायु, देवेंद्र के कुलिश-से आहत होकर पक्ष-हीन होकर गिरनेवाले पर्वत के समान गिर पड़ा।

४०० | कंब रामायण

जटायु धरती पर गिरा। उसके पख बिखरकर गिरे। देवता भय से भाग चले। मुनिगण आश्रयहीन से होकर विलाप करने लगे। बैकुंठ के निवासी ( जटायु पर ) स्वर्ण-वर्षा करने लगे। सीता ( भय से ) थरथरा उठी।

जटायु के आघात से जो ( रावण ) मूर्च्छित होकर लज्जित हुआ था, उसने अब अपनी हर्ष-ध्वनि से गगन-प्रदेश को भर दिया। जाल में फँसी हरिणी-जैसी सीता चिन्तामग्न होती, निःश्वास भरती, मूर्च्छित होती, कोई आश्रय न पाकर अवलंब से हीन लता के समान गिर पड़ती।

सीता यह सोचकर अपने साथी से वियुक्त क्रौंची के समान रो पड़ी कि मेरी सहायता करने के लिए आया हुआ गृद्ध-राज भी मर मिटा। हाय! अब मेरी गति क्या होगी ?

मूढ होकर मैंने अनुज के वचनों का तिरस्कार कर उसे शीघ्र ( आश्रम से ) भेज दिया था। अब मेरे लिए युद्ध करनेवाले जटायु के मर जाने से मैं स्तब्ध हो गई हूँ। न जाने अब विधि हमपर और क्या आपत्ति डालनेवाला है।

विपदा मे पड़ी हुई मुझको देखकर जिस ( जटायु ) ने 'अभय' कहा था, ऐसा यह सद्गुण ( जटायु ) पराजित हो और नरक के योग्य ( रावण ) विजयी हो यह कैसी बात है ? क्या पाप जीतेगा और वेद ( अर्थात्, वेद-प्रतिपादित धर्म ) हारेगा ? क्या धर्म कही नही रहा ? इस प्रकार वह विलाप करने लगी।

मुझ, निर्लज्ज नारी के वचन के कारण ( आश्रम से ) गये हुए हे नरश्रेष्ठो ! अनश्वर धर्ममार्ग पर चलनेवालों के लिए अवलंब बना हुआ तथा आपके पिता का मित्र, जटायु यहाँ पड़ा है। इसे देखने के लिए आइए—यों कहकर व्याकुल हो रोने लगी।

पातिव्रत्य की रक्षा करना मेरा धर्म है। किन्तु अकुंठित शक्तिवाले तथा युद्ध में निपुण मेरे प्रभु ( राम ) का धनुष अब अपयश का भाजन हो गया। मुझ-जैसी पापिन के जन्म मे मेरे कुल को अपयश उत्पन्न हुआ। इस प्रकार सोचती हुई सीता शोकमग्न हुई।

हे प्रकाशमय स्वर्ग-लोक में भी अपना शासन-चक्र चलानेवाले ( दशरथ ) ! क्या अब आप सद्धर्म के मार्ग पर चलनेवाले, मित्रता के योग्य, पवित्र कर्त्तव्य को पूरा करनेवाले अपने भाई ( जटायु ) को, उस ( स्वर्ग ) लोक मे गले लगानेवाले हैं ? यह कहकर वह सिसक-सिसककर रो पड़ी।

रावण ने, इस प्रकार बिलपती हुई सीता की निस्सहाय दशा देखी और पखों के कट जाने से धरती पर पड़े हुए गृद्धराज को भी देखा। फिर, यह सोचकर कि अब यहाँ से हट जाना ही उचित है, रथ पर रखे हुए भूखंड को सीता-सहित उठाकर अपने पुष्ट कंधों पर रख लिया और गगन-मार्ग से चल पड़ा।

गगन मे उस क्रूर के गमन-वेग से वह पतिव्रता ( सीता ), जिनका मन और आँखे चकरा रही थी प्रज्ञाहीन होकर, अपने को भी भूलकर भूमि पर गिर पड़ी।

रावण चला गया। जटायु मूर्च्छा से किंचित् ज्ञान पाकर, विशाल गगन मे मायावी ( रावण ) का शीघ्रता से प्रस्थान देखता हुआ सोचने लगा—

अरण्यकाण्ड ४०१

पुत्र (अर्थात्, राम-लक्ष्मण) नहीं आये। जिस विधि ने अपनी पुत्रवधू की कठोर वेदना को शान्त करने का यश मुझको नहीं दिया, उसने धर्म की बाड़ को ही तोड़ दिया। अब न जाने, आगे क्या होनेवाला है।

विजयशील (राम-लक्ष्मण) यदि यहाँ रहते, तो क्या बिजली-जैसी सूक्ष्म कटि-वाली एवं स्वर्णकंकण-भूषित सीता की यह दशा होती। मैं नहीं जानता हूँ कि उन (राम और लक्ष्मण) को क्या हुआ है। क्या विमाता (कैकेयी) की वंचना इस प्रकार समाप्त हो रही है ? (भाव यह है कि कैकेयी ने जो कार्य सोचा था, वह इस प्रकार पूरा हो रहा है)।

आदिशेष के पर्यंक पर शयन करनेवाले अंजन-वर्ण भगवान् नारायण ही राम होकर अवतीर्ण हुए हैं। अतः, क्रोधी तथा क्रूर राक्षस से वे (युद्ध में) परास्त नहीं हो सकते। अतएव, इस राक्षस ने माया करके इस प्रकार धोखा दिया है।

मेरा तात (राम), राक्षस-कुल को जड़ से मिटा देगा और अपने इस अपयश को दूर करेगा। रावण कमलभव सृष्टिकर्त्ता (ब्रह्मा) के शाप से आक्रान्त है, अतः आर्य (राम) की देवी का स्पर्श करने से डरेगा।

विशाल पंखोंवाला जटायु इस प्रकार अनेक बातों का विचार कर फिर सोचने लगा—अब सीता कठोर कारागार में बंदी के रूप में रहेगी। भले ही मेरे युद्ध करने योग्य पंख कट गये, किन्तु मीठी बोलीवाली सीता के पातिव्रत्य-रूपी पंख नहीं कटेंगे।

जटायु के पंख, रक्त के प्रवाह में भींगकर शिथिल हो गये। उसके मन मे बड़ी ग्लानि उत्पन्न हुई; क्योंकि लता-तुल्य कोमलांगी (सीता) को वह छुड़ा नहीं सका। साथ ही, (उसके मन में) कुमारों (अर्थात्, राम और लक्ष्मण) के प्रति प्रेम उमड़ उठा। जिससे वह प्रज्ञा-रहित होकर अत्यन्त व्याकुल हुआ।

रावण सीता देवी को शीघ्र लंका में ले गया और उन (सीता) की देह का स्पर्श करने से भयभीत होकर वहाँ के अशोक-वन में, शिंशपावृक्ष के नीचे, विष के स्वभाव-वाली राक्षसियों के मध्य बंदी बनाकर रखा।

उस राक्षस का (अर्थात्, रावण का) वृत्तान्त हमने कहा। अब हम उस अनुज (लक्ष्मण) का वृत्तान्त कहेंगे, जो सीता की आज्ञा से, कि स्वर्ण-हिरण के पीछे गये हुए प्रभु की दशा को जाकर देखो, गया था।

उसका मन इस व्यथा से अत्यधिक धड़क रहा था कि अनुपम सीता आश्रम में एकाकी रहती हैं। उस समय लक्ष्मण की दशा भरत की उस दशा-सी थी, जब वह (भरत) अयोध्या की रक्षा करना छोड़कर, रामचन्द्र को अयोध्या लौटा लाने के लिए अरण्य में गया था।

स्वच्छ तरंगो से भरे समुद्र में चलनेवाली नौका के समान, लक्ष्मण अतिशीघ्र गया। महान् रक्त-कमल से युक्त विशाल कालमेघ-जैसे प्रभु को उसने देखा और उसके मन के जैसे ही उसकी आँखें भी आनंदित हो उठीं।

कालवर्ण प्रभु ने भी, जिनका हृदय इस विचार से व्याकुल हो रहा था कि

४०२कंब रामायण

भयोत्पादक मारीच-ध्वनि के श्रवण से कलापी-तुल्य सीता देवी स्त्री-सुलभ अज्ञान के कारण कातर हो रही होगी, अपने अनुज को सम्मुख आते हुए देखा।

तब रामचन्द्र ने सोचा—शिथिल मन और तन के साथ यह लक्ष्मण, उसके (अर्थात्, राम-लक्ष्मण के) वचन की उपेक्षा करके (माया-मृग के पीछे आकर) थक जाने-वाले मेरे निकट, मेरी आज्ञा का उल्लंघन करके अकेले आ गया है। कदाचित् मायावी राक्षस की दुःखजनक पुकार को सुनकर और उसे धोखा न समझकर सीता ने इसे कठोर आज्ञा दी है, इसीसे मेरी दशा को जानने लिए यह आया है।

विधि-विधान को टालने का क्या उपाय हो सकता है ?—यो सोचत हुए वे खड़े थे कि अनुज (लक्ष्मण), सुन्दर धनुष को हाथ में रखे हुए उनके निकट आ पहुँचा और उनके सुन्दर चरणों पर नत हुआ। तब ज्येष्ठ ने उसे झट उठाकर विद्युत्-जैसे यज्ञोपवीत से शोभायमान अपने वक्ष से लगा लिया। फिर, द्रवितमन हो उससे पूछा—हे भाई ! तुम क्या सोचकर यहाँ आये ? तब लक्ष्मण ने उत्तर दिया—

अलौकिक और अनुचित एक ध्वनि सुनाई पड़ी, जिससे भीत होकर उन्होंने (सीता ने) मुझे आज्ञा दी (कि मै आपके निकट आऊँ)। तब मैंने उन्हें समझाया कि यह क्रूर राक्षस की पुकार है। किन्तु, उस (मेरे) वचन की उपेक्षा करके अत्यन्त व्याकुल होकर उन्होंने फिर कहा—यह क्या है, जानकर आओ। यहाँ मत खड़े रहो। दुबारा मेरे समझाने पर भी कुछ न मानकर, आपकी भुजा के पराक्रम को भी विस्मृत करके, वे अधिक कातर हो उठीं।

फिर, यह कहकर यदि तुम न जाकर यही खड़े रहोगे, तो मै अग्नि में जा गिरूँगी—अरण्य मे दौड़ने लगीं। तब मैं भयभीत हुआ। सोचा कि ये (सीता) मुझे वचक समझ रही हैं। यदि मै यही खड़ा रहूँगा, तो ये आत्महत्या किये बिना नही रहेगी। इन्हे नही मरना चाहिए; यह धर्म-विरुद्ध होगा। इसलिए, मेरा यहाँ आना हुआ—इस प्रकार लक्ष्मण के कहने पर अमल प्रभु ने विचार किया—

वह (सीता) आत्महत्या किये बिना नही रहेगी। उसकी मृत्यु को रोकना इसके लिए (लक्ष्मण के लिए) असंभव था और भयभीत हुई सीता इसके वचन भी नही मान सकी। अहो ! रक्षा-हीन आश्रम में कोई विपदा हो सकती है। उसको रोकना असंभव है। यह सब, हमें अलग करके, उस (सीता) को हरण कर ले जाने का उपाय करनेवाले मायावी राक्षसो का कार्य है।

फिर (राम ने) लक्ष्मण से कहा—यहाँ आने में तुम्हारा दोष कुछ नहीं। उस मुग्धा ने भ्रात और व्यथा से कातर होकर जो किया, उसीका यह परिणाम है। तुमने पहले ही समझकर कहा था वह मृग—मायामृग है। किन्तु, उसकी उपेक्षा कर मैंने जो कार्य करने का निश्चय किया, हाय ! उसीसे यह बुरा (परिणाम) हुआ।—यो कहकर चिंता में निमग्न हो रहे।

फिर, राम ने कहा—समय व्यतीत हो रहा है। अब यहाँ खड़े रहने से कुछ प्रयोजन नहीं। क्रौंची-जैसी उस (सीता) को जबतक मै नहीं देखूँगा, तबतक मेरी व्यथा

अरण्यकाण्ड ४०३

नही मिटेगी, नही मिटेगी। और, त्वरित गति से दीर्घ मार्ग को पार करके, धनुष से निकले शर के समान चले और स्वर्ण-सदृश सीता के आवासभूत मनोहर पर्णशाला मे जा पहुँचे।

इस प्रकार, राम आश्रम मे दौड़े आये। किन्तु, वहाँ फुलवारी के सघन पुष्पों से आभूषित कुतलोंवाली (सीता) को न देखकर इस प्रकार स्तब्ध खडे रहे, जिस प्रकार प्राण शरीर को छोड़कर बाहर जाकर फिर वापस लौट आये हों और अपने शरीर को न देखकर स्तब्ध खड़े हो।

सुन्दर कर्णाभरण से भूषित सीता को न देखकर रामचन्द्र का मन विरक्त-सा हुआ। वे इस प्रकार हो गये, जिस प्रकार कोई धनी व्यक्ति, जिसकी भूमि मे गाड़ी हुई सब संपत्ति को धूर्त्त व्यक्तियो ने हर लिया हो और जो जीवन के आश्रयभूत किंचित् धन से भी वञ्चित हो गया हो और भ्रांत होकर खड़ा हो।

उस समय धरती चकराने लगी। बड़े-बडे पर्वत चकराने लगे। दिव्य ज्ञान से युक्त सत्पुरुषों के हृदय चकराने लगे। वीची-भरे सप्त समुद्र चकराने लगे। आकाश चकराने लगा। ब्रह्मा के नयन चकराने लगे। सूर्य और चन्द्र चकराने लगे।

समस्त लोक यह आशंका करते हुए थरथराने लगे कि यह महिमावान् (राम) धर्म पर क्रुद्ध होनेवाला है? या कृपण (नामक गुण) पर क्रुद्ध होनेवाला है? देवताओं के पराक्रम पर क्रुद्ध होनेवाला है? मुनियो पर क्रुद्ध होनेवाला है? क्रूर राक्षसो के अत्याचार पर क्रुद्ध होनेवाला है? वेदो पर क्रुद्ध होनेवाला है? न जाने, राम के क्रोध का परिणाम क्या होगा?

उस श्याम-रूप (राम) की मनोदशा के परिवर्त्तित हो जाने से, अपरिमेय (चर-अचर रूप) वस्तुजाल, ऊपर के रहनेवाले नीचे और नीचे के रहनेवाले ऊपर होकर सब उसी प्रकार अस्त-व्यस्त हो गये, जिस प्रकार प्रलय-काल में, सृष्टि के कारणभूत परमात्म-तत्त्व में विलीन होने के लिए वे (सृष्टि के पदार्थ) अस्त-व्यस्त होकर मिट जाते हैं।

तब अनुज (लक्ष्मण) ने रामचन्द्र को नमस्कार करके कहा—रथ के पहियो के चिह्नों को हम यहाँ देख रहे हैं। कोई राक्षस देवी का स्पर्श करने से डरकर यहाँ के भूखंड-सहित ही उन्हें उठाकर ले गया है। अब निःशक्त-से खड़े रहकर व्यर्थ ही कुछ सोचते रहने से कुछ लाभ नहीं होगा। (उस राक्षस के) दूर जाने के पूर्व ही हम उसका पीछा करेंगे।

अमल रूप (राम) ने भी इससे सहमत होकर कहा—हाँ, यही उचित है। फिर, वे दोनों वीर अपने उज्ज्वल तूणीर आदि को लेकर उस मार्ग से होकर चल पड़े, जहाँ से रावण का बड़ा रथ सुन्दर तथा बड़े पर्वतो को चूर-चूर करता हुआ गया था।

उस मार्ग में, उस राक्षस के रथ का चिह्न कुछ दूर तक जाकर फिर अदृश्य हो गया था और ऐसा लगा, जैसे वह रथ नभ में उठ गया हो। तब रामचन्द्र ने ऐसी व्यथा के साथ, जैसे जले हुए घाव में बरछा चुभ गया हो, कहा—ऐ भाई! अब हम क्या उपाय करें?

लक्ष्मण ने उत्तर दिया—मल्लयुद्ध के लिए सन्नद्ध, पुष्ट कंधोंवाले हे महिमामय! यह बात स्पष्ट विदित हो रही है कि वह रथ दक्षिण दिशा की ओर गया है। आपके धनुष

४०४कंब रामायण

से निकलनेवाले शर के लिए गगन-मंडल भी कुछ बड़ा नहीं है। आपका इस प्रकार दुःख से अधीर होना उचित नहीं है।

तब राम ने कहा—हाँ, तुम्हारा कथन ठीक ही है। फिर, वे दोनों दक्षिण दिशा की ओर गये। दो योजन दूर जाने पर वहाँ उन्होंने ढहे हुए ऊँचे पर्वत के समान धरती पर गिरी हुई और वीणा के चित्र से युक्त पटवाली एक ध्वजा देखी।

उस ध्वजा को देखकर उन्होंने विचार किया—कदाचित् सीता के निमित्त से देवों ने उन राक्षसों से युद्ध किया होगा। फिर, रामचन्द्र ने यह सोचकर कि (जटायु की) चोंच-रूपी शस्त्र से ही यह उज्ज्वल ध्वजा टूटकर गिरी है। अपने कमल-जैसे नयनों में अश्रु भरकर कहा—

भाई ! मेरा विचार है कि हमारे पितृतुल्य (जटायु) शीघ्रता से यहाँ आये होंगे और उनकी चोंच से ही यह (ध्वजा) टूटी होगी। (जटायु) ने बड़े वेग से इसपर आक्रमण किया होगा। हमें विदित नहीं हुआ है कि उन्हें (अर्थात्, जटायु को) इस बीच में क्या हुआ। वे अकेले हैं और जरा से जीर्णदेह भी हैं।

तब लक्ष्मण ने कहा—बहुत ठीक है। यह निश्चित है कि अवार्य पराक्रम से युक्त वे (जटायु) आज दिन-भर उस राक्षस को रोके खड़े रहेंगे। हम भी शीघ्र उनके पास पहुँच जायें। कदाचित् वे (जटायु) स्वयं ही (सीता) देवी को मुक्त कर लायेंगे। अब अन्य कुछ सोचते हुए विलंब करने से कुछ प्रयोजन नहीं है।

राम भी वैसे ही आगे बढ़ने को सहमत हुए। फिर, वे दोनों धरती पर चक्कर काटकर बहनेवाली हवा (अर्थात्, बवंडर) के जैसे, और चरखी के जैसे अतिवेग से बढ़ चले। इधर-उधर दृष्टि डालते हुए जानेवाले उन वीरों ने एक स्थान पर, गगन से टूटकर गिरे हुए इन्द्र-धनुष के समान और समुद्र से उठी हुई वीची के समान पड़े हुए एक टूटे हुए विशाल धनुष को देखा।

तब रामचन्द्र ने लक्ष्मण से कहा—हे लक्ष्मण ! यह धनुष देवताओं के द्वारा क्षीर-सागर को मथने में मथानी बनाये गये मन्दर-पर्वत की समता करता है। चन्द्र की-सी देहकान्ति-वाले जटायु ने अपनी चोंच से काटकर इसे तोड़ दिया है, उस (जटायु) की शक्ति भी कैसी है ?

फिर, कुछ दूर जाने पर उन्होंने एक स्थान में एक त्रिशूल को और अनेक बाणों से पूर्ण दो तूणीरों को पर्वत-जैसे पड़े हुए देखा और उनके निकट गये।

फिर, आगे बढ़कर उन्होंने राक्षसराज के वक्ष पर से (जटायु के द्वारा) खींचकर नीचे गिराये गये उस कवच को देखा, जो ऐसा लगता था, मानो नभ में संचरण करनेवाले सब ज्योतिष्पिंड एकत्र होकर उस रूप में वहाँ आये हों और जो अरण्य-पथ को (अपनी विशालता और कान्ति से) आवृत करके पड़ा हुआ हो।

फिर, वे आगे बढ़कर उस स्थान पर पहुँचे, जहाँ पवन-के-से वेगवाले घोड़े, अरण्य-प्रदेश को ढककर बिखरे पड़े थे और सारथि भी मरा हुआ पड़ा था। वहाँ रक्त से युक्त मांस-खंड भी बिखरे थे। फिर, वे उस स्थान पर आ पहुँचे, जहाँ जटायु ऐसे गिरा हुआ था, जैसे गगन ही धरती पर आ गिरा हो।

अँरण्यकाण्ड ४०५

प्रलय-काल मे जिस प्रकार उज्ज्वल कान्ति बिखेरनेवाले अनेक सूर्यमंडल मनोहर नभोमंडल को छोड़कर धरती पर आ पड़े हों, उसी प्रकार अनेक रत्नमय कुंडल एवं उत्तम रत्न-जटित अनेक आभरण वहाँ बिखरे पड़े थे। उन्हें देखकर वे विस्मित हुए।

राम ने लक्ष्मण से कहा—हे भाई ! यहाँ अनेक अंगद गिरे हैं। उज्ज्वल कुंडल भी अनेक गिरे हैं। रत्नमय किरीट अनेक गिरे हैं। अतः, निस्सहाय वृद्ध जटायु के साथ युद्ध करनेवाले सिंह-सदृश वीर अनेक रहे होंगे।

लक्ष्मी के पति ने जब इस प्रकार कहा, तो सुमित्रा के सिंह (सदृश पुत्र) ने कहा—वृक्ष-समान दीर्घ भुजाएँ अनेक हैं, शिर अनेक हैं, हमारे तात (जटायु) से युद्ध करनेवाला और इतनी दूर तक ले आनेवाला एक ही था। वह रावण ही रहा होगा।

पुष्पहारो से भूषित अनुज की बात से सहमत होकर रामचन्द्र अपने दृढ मन तथा नयनों से क्रोधाग्नि उगलते हुए इधर-उधर देखते हुए बढ़ चले और वहाँ एक स्थान पर अपने शरीर से प्रवाहित रक्त-धारा मे, समुद्र मे रखे पर्वत (मंदर) जैसे पड़े हुए तात (जटायु) को देखा।

उत्तम तथा अमल (रामचन्द्र), पुष्ट अरुण कमल-जैसे अपने नयनो से अश्रु बहांत हुए, अपने प्राणों के सदृश उपमाहीन, उदार, गुणवान् जटायु पर आकर इस प्रकार गिरे, मानों अग्निवर्ण शिवजी के रजताचल पर कोई अंजन-पर्वत आ गिरा हो।

रामचन्द्र एक मुहूर्त्तकाल तक श्वास-हीन पड़े रहे। लक्ष्मण ने यह आशंका करके कि राम मूर्च्छित हो गये हैं, उनके समीप जाकर उनको अपने अरुण करों से उठाकर आलिंगित कर लिया और निर्झर से जल लेकर उनके मुख पर छिड़का। तब राम ने अपने कमल-समान नयन खोलकर धीरे-धीरे प्रज्ञा पाई और यो कहने लगे—

कौन पुत्र ऐसे हुए हैं, जिन्होने अपने पिता की हत्या की हो। मेरे पिता मेरे विरह से पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो गये। हे मेरे पितृतुल्य (जटायु) ! मेरी सहायता करने आकर तुम भी प्राणहीन हो गये ! हाय ! मै पापी, इन (दोनों) की मृत्यु (का कारण) बन गया।

हे मेरी माता-समान (जटायु) ! यह न सोचकर कि मैं अकेला हूँ, और यह भी विचार न करके कि आगे का परिणाम क्या होगा, मोह-ग्रस्त होकर (मायामृग के पीछे) गया। मेरी पत्नी की विपदा से रक्षा करने के लिए आकर तुमने अपना कर्त्तव्य निवाहा। किन्तु मै, जो अपने कर्त्तव्यो को पूर्ण नही कर सका हूँ, किस प्रयोजन से व्याकुल होऊँ? (अर्थात्, अब मेरा रोना व्यर्थ है।)

मुझे मर जाना चाहिए। किन्तु, वेदज्ञ मुनियों की इच्छाओ को पूर्ण करने का व्रत मैने लिया है। अतः, अभी तक प्राण रख रहा हूँ। वृक्ष के जैसे बढ़ा हूँ, किन्तु किंचित् भी प्रयोजन से रहित नीच कार्य करनेवाला हूँ। वंचना के विषयभूत इस क्षुद्र जन्म को मैं नही चाहता।

मेरी पत्नी के बन्दी हो जाने पर, उसे मुक्त करने के लिए लड़कर महिमामय तुम, जो आहत होकर पडे हो। तुमको मारनेवाला वह शत्रु अभी जीवित है। दृढ धनुष को और शरों को ढोता हुआ मैं लंबे पेड़ के जैसे खड़ा हूँ, खड़ा हूँ। अहो !

४०६कंब रामायण

अब मेरे समान यशस्वी ( इस संसार मे ) और कौन है ? हे दृढ पंखोवाले ! असंख्य दाँतोवाले ! पुरातन पाप से युक्त मेरी पत्नी के देखते हुए, शस्त्रधारी शत्रु ने तुमको मार दिया और चला गया । मै धनुष हाथ मे रखकर व्यर्थ ही जीवित हूँ । अहो, मेरी वीरता भी कैसी है !

अपना उपमान न रखनेवाले रामचन्द्र इस प्रकार के अनेक वचन कहकर अश्रु बहाते रहे और मूर्च्छित हो गये। अनुज ( लक्ष्मण ) की भी वैसी ही दशा हो गई । तब गृध्र-राज कुछ-कुछ प्रज्ञा पाकर बड़ी कठिनाई से साँस लेने लगा और आँखें खोलकर उन दोनों को देखा ।

( सीता की क्या दशा हुई ) यह वृत्तांत कुछ न जाननेवाले. व्याकुल प्राणो के साथ उष्ण श्वास भरनेवाले जटायु ने उन विजयी वीरों को देखा । उससे उसका मन ऐसा आनंदित हुआ, जैसे उसके कटे हुए पक्ष, प्रिय प्राण और सत लोक भी उसे प्राप्त हो गये हो। उसने ऐसा सोचा कि मैंने शत्रु को ही जीतकर उससे प्रतिशोध लिया है।

फिर जटायु ने कहा— हे पुण्यात्माओ ! मैं अब अपने इस निष्प्रयोजन तथा अपयश के भाजन शरीर को त्याग रहा हूँ । सौभाग्य से ही इस समय तुम दोनो को देख सका हूँ । मेरे निकट आओ । फिर, रावण के किरीटधारी शिरो पर चोट मार-मारकर छिन्न हुई अपनी चोंच से उनके शिरों को बारी-बारी से कई बार सूँघा ।

मेरे मन ने पहले ही कहा था कि उस ( रावण ) का यहाँ आगमन माया से हुआ है । ( अर्थात्, वह माया से तुमको धोखा देकर ही वहाँ आया ) । फिर भी, अक्षुण्ण पराक्रम से युक्त तुम दोनों, मधुर बोलीवाली उस अरुंधती को (अर्थात्, अरुंधती-तुल्य पतिव्रता सीता को) अकेली ही छोड़कर कैसे चले गये ?

उसके यह कहते ही कनिष्ठ ( लक्ष्मण ) ने मायामृग के आने से लेकर सारी घटनाओ को कह सुनाया ।

रामचन्द्र की आज्ञा से वीर लक्ष्मण ने जब सब कह सुनाया, तब गृध्रराज ने सब सुनकर और यह विचार करके कि राम-लक्ष्मण को उनके दुःख में कुछ सांत्वना देना आवश्यक है, इस प्रकार के वचन कहे—

इस निंदनीय जीवन के सुख-दुःख विधि के वशीभूत हैं। कोई उनमें कुछ परिवर्त्तन नही कर सकता । इस तत्त्व को हमें मानना पड़ेगा। यदि इसे नही मानेंगे, तो क्या अपनी बुद्धि के बल से विधि के विधान को मिटा सकेंगे ?

जब विधिवश विपदा उत्पन्न होती है, तब मन की धीरता का त्याग कर व्याकुल होना अज्ञता है । जिस नियति ने सारी सृष्टि के कर्त्ता के सिर को काटा था; उसके लिए असाध्य कार्य कुछ नहीं है ।

जब सुख या दुःख उत्पन्न हो, तब यह कहना कि इसको हम रोक सकते हैं, असत्य वचन होगा ( अर्थात्, कर्मफल से प्राप्त सुख को कोई रोक नहीं सकता ) । त्रिपुरों को जलाने के लिए जिस ( शिव ) ने शर का प्रयोग किया था, उसने कपाल में भिक्षा माँगकर खाते हुए तपस्या की थी । क्या यह उनके लिए योग्य था ?