कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 410, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४०२ | कंब रामायण |
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भयोत्पादक मारीच-ध्वनि के श्रवण से कलापी-तुल्य सीता देवी स्त्री-सुलभ अज्ञान के कारण कातर हो रही होगी, अपने अनुज को सम्मुख आते हुए देखा।
तब रामचन्द्र ने सोचा—शिथिल मन और तन के साथ यह लक्ष्मण, उसके (अर्थात्, राम-लक्ष्मण के) वचन की उपेक्षा करके (माया-मृग के पीछे आकर) थक जाने-वाले मेरे निकट, मेरी आज्ञा का उल्लंघन करके अकेले आ गया है। कदाचित् मायावी राक्षस की दुःखजनक पुकार को सुनकर और उसे धोखा न समझकर सीता ने इसे कठोर आज्ञा दी है, इसीसे मेरी दशा को जानने लिए यह आया है।
विधि-विधान को टालने का क्या उपाय हो सकता है ?—यो सोचत हुए वे खड़े थे कि अनुज (लक्ष्मण), सुन्दर धनुष को हाथ में रखे हुए उनके निकट आ पहुँचा और उनके सुन्दर चरणों पर नत हुआ। तब ज्येष्ठ ने उसे झट उठाकर विद्युत्-जैसे यज्ञोपवीत से शोभायमान अपने वक्ष से लगा लिया। फिर, द्रवितमन हो उससे पूछा—हे भाई ! तुम क्या सोचकर यहाँ आये ? तब लक्ष्मण ने उत्तर दिया—
अलौकिक और अनुचित एक ध्वनि सुनाई पड़ी, जिससे भीत होकर उन्होंने (सीता ने) मुझे आज्ञा दी (कि मै आपके निकट आऊँ)। तब मैंने उन्हें समझाया कि यह क्रूर राक्षस की पुकार है। किन्तु, उस (मेरे) वचन की उपेक्षा करके अत्यन्त व्याकुल होकर उन्होंने फिर कहा—यह क्या है, जानकर आओ। यहाँ मत खड़े रहो। दुबारा मेरे समझाने पर भी कुछ न मानकर, आपकी भुजा के पराक्रम को भी विस्मृत करके, वे अधिक कातर हो उठीं।
फिर, यह कहकर यदि तुम न जाकर यही खड़े रहोगे, तो मै अग्नि में जा गिरूँगी—अरण्य मे दौड़ने लगीं। तब मैं भयभीत हुआ। सोचा कि ये (सीता) मुझे वचक समझ रही हैं। यदि मै यही खड़ा रहूँगा, तो ये आत्महत्या किये बिना नही रहेगी। इन्हे नही मरना चाहिए; यह धर्म-विरुद्ध होगा। इसलिए, मेरा यहाँ आना हुआ—इस प्रकार लक्ष्मण के कहने पर अमल प्रभु ने विचार किया—
वह (सीता) आत्महत्या किये बिना नही रहेगी। उसकी मृत्यु को रोकना इसके लिए (लक्ष्मण के लिए) असंभव था और भयभीत हुई सीता इसके वचन भी नही मान सकी। अहो ! रक्षा-हीन आश्रम में कोई विपदा हो सकती है। उसको रोकना असंभव है। यह सब, हमें अलग करके, उस (सीता) को हरण कर ले जाने का उपाय करनेवाले मायावी राक्षसो का कार्य है।
फिर (राम ने) लक्ष्मण से कहा—यहाँ आने में तुम्हारा दोष कुछ नहीं। उस मुग्धा ने भ्रात और व्यथा से कातर होकर जो किया, उसीका यह परिणाम है। तुमने पहले ही समझकर कहा था वह मृग—मायामृग है। किन्तु, उसकी उपेक्षा कर मैंने जो कार्य करने का निश्चय किया, हाय ! उसीसे यह बुरा (परिणाम) हुआ।—यो कहकर चिंता में निमग्न हो रहे।
फिर, राम ने कहा—समय व्यतीत हो रहा है। अब यहाँ खड़े रहने से कुछ प्रयोजन नहीं। क्रौंची-जैसी उस (सीता) को जबतक मै नहीं देखूँगा, तबतक मेरी व्यथा