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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 409

अरण्यकाण्ड ४०१

पुत्र (अर्थात्, राम-लक्ष्मण) नहीं आये। जिस विधि ने अपनी पुत्रवधू की कठोर वेदना को शान्त करने का यश मुझको नहीं दिया, उसने धर्म की बाड़ को ही तोड़ दिया। अब न जाने, आगे क्या होनेवाला है।

विजयशील (राम-लक्ष्मण) यदि यहाँ रहते, तो क्या बिजली-जैसी सूक्ष्म कटि-वाली एवं स्वर्णकंकण-भूषित सीता की यह दशा होती। मैं नहीं जानता हूँ कि उन (राम और लक्ष्मण) को क्या हुआ है। क्या विमाता (कैकेयी) की वंचना इस प्रकार समाप्त हो रही है ? (भाव यह है कि कैकेयी ने जो कार्य सोचा था, वह इस प्रकार पूरा हो रहा है)।

आदिशेष के पर्यंक पर शयन करनेवाले अंजन-वर्ण भगवान् नारायण ही राम होकर अवतीर्ण हुए हैं। अतः, क्रोधी तथा क्रूर राक्षस से वे (युद्ध में) परास्त नहीं हो सकते। अतएव, इस राक्षस ने माया करके इस प्रकार धोखा दिया है।

मेरा तात (राम), राक्षस-कुल को जड़ से मिटा देगा और अपने इस अपयश को दूर करेगा। रावण कमलभव सृष्टिकर्त्ता (ब्रह्मा) के शाप से आक्रान्त है, अतः आर्य (राम) की देवी का स्पर्श करने से डरेगा।

विशाल पंखोंवाला जटायु इस प्रकार अनेक बातों का विचार कर फिर सोचने लगा—अब सीता कठोर कारागार में बंदी के रूप में रहेगी। भले ही मेरे युद्ध करने योग्य पंख कट गये, किन्तु मीठी बोलीवाली सीता के पातिव्रत्य-रूपी पंख नहीं कटेंगे।

जटायु के पंख, रक्त के प्रवाह में भींगकर शिथिल हो गये। उसके मन मे बड़ी ग्लानि उत्पन्न हुई; क्योंकि लता-तुल्य कोमलांगी (सीता) को वह छुड़ा नहीं सका। साथ ही, (उसके मन में) कुमारों (अर्थात्, राम और लक्ष्मण) के प्रति प्रेम उमड़ उठा। जिससे वह प्रज्ञा-रहित होकर अत्यन्त व्याकुल हुआ।

रावण सीता देवी को शीघ्र लंका में ले गया और उन (सीता) की देह का स्पर्श करने से भयभीत होकर वहाँ के अशोक-वन में, शिंशपावृक्ष के नीचे, विष के स्वभाव-वाली राक्षसियों के मध्य बंदी बनाकर रखा।

उस राक्षस का (अर्थात्, रावण का) वृत्तान्त हमने कहा। अब हम उस अनुज (लक्ष्मण) का वृत्तान्त कहेंगे, जो सीता की आज्ञा से, कि स्वर्ण-हिरण के पीछे गये हुए प्रभु की दशा को जाकर देखो, गया था।

उसका मन इस व्यथा से अत्यधिक धड़क रहा था कि अनुपम सीता आश्रम में एकाकी रहती हैं। उस समय लक्ष्मण की दशा भरत की उस दशा-सी थी, जब वह (भरत) अयोध्या की रक्षा करना छोड़कर, रामचन्द्र को अयोध्या लौटा लाने के लिए अरण्य में गया था।

स्वच्छ तरंगो से भरे समुद्र में चलनेवाली नौका के समान, लक्ष्मण अतिशीघ्र गया। महान् रक्त-कमल से युक्त विशाल कालमेघ-जैसे प्रभु को उसने देखा और उसके मन के जैसे ही उसकी आँखें भी आनंदित हो उठीं।

कालवर्ण प्रभु ने भी, जिनका हृदय इस विचार से व्याकुल हो रहा था कि