कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 408, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें४०० | कंब रामायण
जटायु धरती पर गिरा। उसके पख बिखरकर गिरे। देवता भय से भाग चले। मुनिगण आश्रयहीन से होकर विलाप करने लगे। बैकुंठ के निवासी ( जटायु पर ) स्वर्ण-वर्षा करने लगे। सीता ( भय से ) थरथरा उठी।
जटायु के आघात से जो ( रावण ) मूर्च्छित होकर लज्जित हुआ था, उसने अब अपनी हर्ष-ध्वनि से गगन-प्रदेश को भर दिया। जाल में फँसी हरिणी-जैसी सीता चिन्तामग्न होती, निःश्वास भरती, मूर्च्छित होती, कोई आश्रय न पाकर अवलंब से हीन लता के समान गिर पड़ती।
सीता यह सोचकर अपने साथी से वियुक्त क्रौंची के समान रो पड़ी कि मेरी सहायता करने के लिए आया हुआ गृद्ध-राज भी मर मिटा। हाय! अब मेरी गति क्या होगी ?
मूढ होकर मैंने अनुज के वचनों का तिरस्कार कर उसे शीघ्र ( आश्रम से ) भेज दिया था। अब मेरे लिए युद्ध करनेवाले जटायु के मर जाने से मैं स्तब्ध हो गई हूँ। न जाने अब विधि हमपर और क्या आपत्ति डालनेवाला है।
विपदा मे पड़ी हुई मुझको देखकर जिस ( जटायु ) ने 'अभय' कहा था, ऐसा यह सद्गुण ( जटायु ) पराजित हो और नरक के योग्य ( रावण ) विजयी हो यह कैसी बात है ? क्या पाप जीतेगा और वेद ( अर्थात्, वेद-प्रतिपादित धर्म ) हारेगा ? क्या धर्म कही नही रहा ? इस प्रकार वह विलाप करने लगी।
मुझ, निर्लज्ज नारी के वचन के कारण ( आश्रम से ) गये हुए हे नरश्रेष्ठो ! अनश्वर धर्ममार्ग पर चलनेवालों के लिए अवलंब बना हुआ तथा आपके पिता का मित्र, जटायु यहाँ पड़ा है। इसे देखने के लिए आइए—यों कहकर व्याकुल हो रोने लगी।
पातिव्रत्य की रक्षा करना मेरा धर्म है। किन्तु अकुंठित शक्तिवाले तथा युद्ध में निपुण मेरे प्रभु ( राम ) का धनुष अब अपयश का भाजन हो गया। मुझ-जैसी पापिन के जन्म मे मेरे कुल को अपयश उत्पन्न हुआ। इस प्रकार सोचती हुई सीता शोकमग्न हुई।
हे प्रकाशमय स्वर्ग-लोक में भी अपना शासन-चक्र चलानेवाले ( दशरथ ) ! क्या अब आप सद्धर्म के मार्ग पर चलनेवाले, मित्रता के योग्य, पवित्र कर्त्तव्य को पूरा करनेवाले अपने भाई ( जटायु ) को, उस ( स्वर्ग ) लोक मे गले लगानेवाले हैं ? यह कहकर वह सिसक-सिसककर रो पड़ी।
रावण ने, इस प्रकार बिलपती हुई सीता की निस्सहाय दशा देखी और पखों के कट जाने से धरती पर पड़े हुए गृद्धराज को भी देखा। फिर, यह सोचकर कि अब यहाँ से हट जाना ही उचित है, रथ पर रखे हुए भूखंड को सीता-सहित उठाकर अपने पुष्ट कंधों पर रख लिया और गगन-मार्ग से चल पड़ा।
गगन मे उस क्रूर के गमन-वेग से वह पतिव्रता ( सीता ), जिनका मन और आँखे चकरा रही थी प्रज्ञाहीन होकर, अपने को भी भूलकर भूमि पर गिर पड़ी।
रावण चला गया। जटायु मूर्च्छा से किंचित् ज्ञान पाकर, विशाल गगन मे मायावी ( रावण ) का शीघ्रता से प्रस्थान देखता हुआ सोचने लगा—