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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 407, कुल 549 में से

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पृष्ठ 407

अरण्यकाण्ड ३६६

जानेवाले अतिथिजन (आतिथ्य-सत्कार न पाकर) लौट आते हैं और आत्मदर्शी योगियो के पास जानेवाली मनोहर कामिनियाँ (विफल होकर) लौट आती हैं।

शूल के व्यर्थ हो जाने पर रावण शीघ्र ही कोई दूसरा शस्त्र उठाकर प्रयुक्त करे, इसके पूर्व ही जटायु ने, रावण के, गगन को आवृत करनेवाले तथा ऊँचे अश्व-जुते रथ पर स्थित सारथि का शिर काट दिया और पतिव्रता-रत्न (सीता) पर आसक्त होनेवाले उस रावण के मुख पर, उसे दुःखी करते हुए, (उस शिर को) फेंक दिया।

इस प्रकार (शिर को) फेंकनेवाले के कार्य को देखकर रावण ने उस (जटायु) की हृदय की धीरता को समझ लिया और अत्यन्त क्रुद्ध होकर अपनी अभ्यस्त (अर्थात्, जिसका प्रयोग करने का वह अच्छा अभ्यासी था ऐसी) स्वर्णगदा को उठाकर ऐसा आघात किया कि अग्नि की ज्वालाएँ निकल पड़ीं। (उस आघात से) गृद्धराज धरती पर एक बड़ा पर्वत-जैसा आ गिरा।

ज्योंही जटायु धरती पर गिरा, त्योंही रावण उत्तम अश्वों से युक्त अपने रथ को इतने वेग से चलाता हुआ कि (किसी की) दृष्टि भी उसका पीछा न कर सके, गगन में उड़ गया। तब मृदु स्वभाववाली सीता देवी इस प्रकार तड़प उठीं, जैसे किसी के घाव में अग्निकण प्रविष्ट हो गया हो।

कोमल पल्लव-समान उस (सीता) देवी को शोक-विह्वल होती हुई देखकर जटायु कह उठा—हे हसिनि ! शोक में मत डूबो। निर्भय रहो—और निःश्वास भरता हुआ वह उठा। फिर (रावण से) यह कहकर कि अरे ! अब तू बचकर कहाँ जायगा, उसके रथ पर झपटा, जिसे देखकर देवता हर्ष-ध्वनि कर उठे।

इस प्रकार झपटकर उस (रावण) की विविध रत्न-जटित गदा को छीनकर दूर फेंक दिया। अपनी चोंच-रूपी खड्ग् को चला-चलाकर (रावण के) रथ में जुते अतिवेग-वान् सोलहों अश्वों को छिन्न-भिन्न करके विध्वस्त कर दिया। वह दृश्य देखकर यम भी (भय से) हाथ कँपाता हुआ खड़ा रहा।

जटायु ने रावण के दृढ रथ को व्यस्त करने के पश्चात् उसके दृढ कंधो से बँधे उन तूणीरों को, जो गगनोन्नत थे और धनुष के टूट जाने से युद्ध के लिए अनुपयोगी होकर लोभी के धन-कोष-जैसे लगते थे, अपने तीक्ष्ण नखों से छीनकर फेंक दिया।

फिर, जटायु ने उसके वक्ष और कंधों पर विचित्र ढंग से आक्रमण करके अपने पखों से उसे मारा और चोंच से काटा। तब रावण शक्तिहीन होकर मूर्च्छित हो गया और सिर झुकाये पड़ा रहा। उसे देखकर जटायु ने कहा—बस ! इतनी ही तेरी शक्ति है ?

उस समय, साकार शक्ति-जैसे बरछे को धारण करनेवाला वह (रावण) क्रुद्ध हुआ और प्रयोग के योग्य अन्य कोई शस्त्र न देखकर, जटायु के प्राणो का तत्क्षण अन्त कर देने के विचार से (लक्ष्य से) न चूकनेवाले अपने करवाल को उठाकर ठीक से चलाया।

वह दिव्य करवाल किसी के लिए अवारणीय था और किसीका भी सिर काट सकता था। जटायु की आयु भी क्षीण हो गई थी। अतः, कभी शक्तिहीन न होनेवाला जटायु, देवेंद्र के कुलिश-से आहत होकर पक्ष-हीन होकर गिरनेवाले पर्वत के समान गिर पड़ा।

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