कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 406, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३६८ | कंब रामायण |
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तब बड़ा गर्जन करता हुआ रावण ने, चौदह बाणों को जटायु के विशाल वक्ष पर इस प्रकार छोड़ा कि वे (बाण) उसके वक्ष को भेदकर पार हो गये। फिर, उसपर अनेक बाण और छोडे। देवता, यह सोचकर कि जटायु अब गिर गया, भय-कंपित होकर उष्ण निःश्वास भरने लगे।
वह गृद्धराज अपने घावों से रक्त की अविरल धारा बहाता हुआ उस मेघ के जैसा लगता था, जो धरती पर खर आदि राक्षसों के रक्त-प्रवाह को समुद्र समझकर (उसे) पीने के पश्चात् उस (रक्त-रूपी) जल को बरसाकर श्वेत वर्ण हो रहा हो।
इस प्रकार का जटायु क्रुद्ध हुआ। निःश्वास भरा। रावण की बीस भुजाओं के मध्य झपटा। अपनी चोंच से मारा। नखों से खरोंचा। अपने पंखो से आघात किया और उस (रावण) के मुक्ताहार-भूषित वक्ष पर के कवच के बंधनो को ढीला कर दिया।
यों अपने कवच को ढीला करनेवाले जटायु पर रावण ने एक सौ बाण चलाये। तब देवता भी भय-विकंपित हुए। इतने में जटायु ने उछलकर रावण के धनुष को चोंच से पकड़कर छीन लिया। यह देखकर देवता हर्षध्वनि कर उठे।
उज्ज्वल रजताचल (हिमाचल) को उसपर निवास करनेवाले शिवजी-सहित अपने बलवान् कंधों पर उठानेवाले उस (रावण) के धनुष को जटायु ने अपनी चोंच से पकड़कर खींच लिया और ऊपर उड़ा, तो वह इन्द्र-धनुष के साथ गगन में उड़नेवाले मेघ के समान लगा। उस (जटायु) के बल का वर्णन कौन कर सकता है ?
जिस रावण ने (युद्ध मे) कभी अपनी पीठ न दिखानेवाले सहस्रनेत्र (इन्द्र) को भी अपने शस्त्र से पीडित किया था और भगा दिया था, उस (रावण) के धनुष को उस जटायु ने अपनी चोंच से छीन लिया और अपने पैरो से तोड़ दिया। जो (जटायु) रक्तवर्ण देव (शिव) के धनुष को अपने हाथो से तोड़ देनेवाले (राम) का सहायक था और उनके पिता का प्रिय मित्र था।
विश्वकंटक रावण, अपने बल के योग्य उस धनुष को टूटते हुए देखकर क्रुद्ध हुआ और अपने पराक्रम में कुंठित न होकर, विषकंठ (शिव) के त्रिपुर-दाह करनेवाले अनुपम शर के समान (भयंकर) शूल को उठाकर जटायु पर प्रयुक्त किया।
तब गृद्धराज ने, इस विचार से कि वह (रावण) कही मुझे शक्तिहीन न समझ ले, यह कहते हुए कि, देख मेरी शक्ति को, उस (रावण के) त्रिशूल को अपनी छाती पर रोक लिया। तब स्वर्ग के निवासी (देवता) यह सोचकर कि इस प्रकार का कार्य करने-वाला पराक्रमी दूसरा कोई नही है, अदृश्य खडे रहकर ही अपनी भुजाएँ ठोंकने लगे।
वह त्रिशूल (जटायु के वक्ष से टकराकर) इस प्रकार लौट आया, जिस प्रकार, धन पर लक्ष्य रखनेवाली वारनारियो की संगति की कामना करनेवाले निर्धन पुरुष (उन वारनारियो के पास से) लौट आते हैं, मधुर दृष्टि रखनेवाली गृहिणी-विहीन¹ गृहों में
¹ अतिथि उसी घर में आतिथ्य पाना चाहते हैं, जहाँ गृहिणी मीठी वाणी से उनका स्वागत-सत्कार करती है; अन्यथा अतिथि लौट जाते हैं।—अनु०