कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 405, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरण्यकाण्ड ३६७
कारणभूत परमतत्त्व (अर्थात्, विष्णु) ही हैं। अतः, इनकी समता किस देवता के साथ की जा सकती है ? तुझमें विवेक नही है । अतः, पागल होकर तूने यह अपराध किया है ।
उस अविनाशी तत्त्व (अर्थात्, रामचन्द्र) के धनुष से शर के निकलते ही त्रिपुरों को जलानेवाले वृषभारूढ शिवजी की कृपा से प्राप्त तेरे वरदान और तेरी सारी विद्याएँ विनष्ट हो जायेंगी।
स्वर्ग के राज्य में आनन्द पानेवाले चक्रवर्त्ती (दशरथ) के पुत्र (राम) अपना धनुष झुकाये हुए तेरे सम्मुख आ जायं, तो उन्हे रोकना असम्भव होगा। मैं इस सुन्दर ललाट-वाली देवी को उनके आवास में पहुँचा दूँगा । तू शीघ्र यहाँ से भाग जा । जटायु के इस प्रकार कहते ही—
रावण अपनी उज्ज्वल आँखों से चिनगारियाँ उगलने लगा । ओठ चबाते हुए उसने जटायु को देखकर कहा—अब ज्यादा बक-बक मत कर । अब शीघ्र तू उन मानवों को दिखा ।
सम्मुख आनेवाले ऐ गिद्ध ! मेरे शर से तेरी छाती में बड़ा छेद न हो जाय, इसलिए तू अभी यहाँ से हट जा । गरम किये हुए लोहे में पड़ा हुआ जल उससे कदाचित् निकल भी आ जाये, किन्तु मेरे हाथों में पड़ी इक्षु-समान बोलीवाली यह सुन्दरी मुक्त नही हो सकती, तू यह जान ले ।
इस समय जटायु ने हंसिनी-तुल्य सीता को दुगुने डर से काँपती हुई देखकर कहा—हे माता ! इस राक्षस की देह अभी टुकड़े-टुकड़े हो जायगी । अतः, यह सोचकर कि प्रभु (राम), धनुष लेकर नहीं आये हैं, तुम चिंतित मत होओ ।
तुम व्याकुल होकर मुक्ता के समान अश्रुओं को अपने मुख पर से स्तन-तटी पर गिराती हुई दुःख मत करो । इसके दस शिरो को ताड़ के फलो के गुच्छे के समान मैं तोड़ दूँगा और इसके द्वारा वशीभूत दसों दिशाओ को (उन शिरो को) मै बलि के रूप में अर्पण करूँगा ।
फिर जटायु, रावण के शिरों की पंक्ति को गरजते मुँह से काटकर गिराने के लिए अपने पंखो से वज्र की ध्वनि उत्पन्न करते हुए शीघ्र उड़कर आया और रावण की मनोहर, विशाल, वीणा के चित्र से युक्त ध्वजा को तोड़कर देवों के आशीर्वाद का पात्र बना ।
रावण, जो पहले कभी इस प्रकार के अपमान का भाजन नही बना था, उस समय अपनी आँखों को पिघली लाख जैसे लाल करके ठठाकर हँस पड़ा और सप्तलोकों को भयभीत करते हुए पर्वत के जैसे अपने धनुष को एव अपनी भौंहो को झुका लिया ।
अर्धचन्द्र के जैसे वक्र खड्ग-दन्तोंवाले उस (रावण) के शरों की घोर वर्षा जटायु पर होने लगी । जटायु ने कुछ शरो को अपने दृढ नखो से तोड़ दिया, कुछ शरों को यम को भी भयभीत करनेवाली चोंच से छिन्न-भिन्न कर दिया ।
विशाल और भयकर आँखोंवाले असंख्य सर्पों को एक साथ मिटानेवाले गरुड के समान जटायु, (रावण के) दशों शिरों पर अपनी चोंच नामक चक्रायुध को बढ़ाकर, उसके पुन. अपने धनुष को झुकाने के पूर्व ही उसके निकट पहुँच गया और उसके कुण्डलों को छीनकर उड़ गया ।