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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 411

अरण्यकाण्ड ४०३

नही मिटेगी, नही मिटेगी। और, त्वरित गति से दीर्घ मार्ग को पार करके, धनुष से निकले शर के समान चले और स्वर्ण-सदृश सीता के आवासभूत मनोहर पर्णशाला मे जा पहुँचे।

इस प्रकार, राम आश्रम मे दौड़े आये। किन्तु, वहाँ फुलवारी के सघन पुष्पों से आभूषित कुतलोंवाली (सीता) को न देखकर इस प्रकार स्तब्ध खडे रहे, जिस प्रकार प्राण शरीर को छोड़कर बाहर जाकर फिर वापस लौट आये हों और अपने शरीर को न देखकर स्तब्ध खड़े हो।

सुन्दर कर्णाभरण से भूषित सीता को न देखकर रामचन्द्र का मन विरक्त-सा हुआ। वे इस प्रकार हो गये, जिस प्रकार कोई धनी व्यक्ति, जिसकी भूमि मे गाड़ी हुई सब संपत्ति को धूर्त्त व्यक्तियो ने हर लिया हो और जो जीवन के आश्रयभूत किंचित् धन से भी वञ्चित हो गया हो और भ्रांत होकर खड़ा हो।

उस समय धरती चकराने लगी। बड़े-बडे पर्वत चकराने लगे। दिव्य ज्ञान से युक्त सत्पुरुषों के हृदय चकराने लगे। वीची-भरे सप्त समुद्र चकराने लगे। आकाश चकराने लगा। ब्रह्मा के नयन चकराने लगे। सूर्य और चन्द्र चकराने लगे।

समस्त लोक यह आशंका करते हुए थरथराने लगे कि यह महिमावान् (राम) धर्म पर क्रुद्ध होनेवाला है? या कृपण (नामक गुण) पर क्रुद्ध होनेवाला है? देवताओं के पराक्रम पर क्रुद्ध होनेवाला है? मुनियो पर क्रुद्ध होनेवाला है? क्रूर राक्षसो के अत्याचार पर क्रुद्ध होनेवाला है? वेदो पर क्रुद्ध होनेवाला है? न जाने, राम के क्रोध का परिणाम क्या होगा?

उस श्याम-रूप (राम) की मनोदशा के परिवर्त्तित हो जाने से, अपरिमेय (चर-अचर रूप) वस्तुजाल, ऊपर के रहनेवाले नीचे और नीचे के रहनेवाले ऊपर होकर सब उसी प्रकार अस्त-व्यस्त हो गये, जिस प्रकार प्रलय-काल में, सृष्टि के कारणभूत परमात्म-तत्त्व में विलीन होने के लिए वे (सृष्टि के पदार्थ) अस्त-व्यस्त होकर मिट जाते हैं।

तब अनुज (लक्ष्मण) ने रामचन्द्र को नमस्कार करके कहा—रथ के पहियो के चिह्नों को हम यहाँ देख रहे हैं। कोई राक्षस देवी का स्पर्श करने से डरकर यहाँ के भूखंड-सहित ही उन्हें उठाकर ले गया है। अब निःशक्त-से खड़े रहकर व्यर्थ ही कुछ सोचते रहने से कुछ लाभ नहीं होगा। (उस राक्षस के) दूर जाने के पूर्व ही हम उसका पीछा करेंगे।

अमल रूप (राम) ने भी इससे सहमत होकर कहा—हाँ, यही उचित है। फिर, वे दोनों वीर अपने उज्ज्वल तूणीर आदि को लेकर उस मार्ग से होकर चल पड़े, जहाँ से रावण का बड़ा रथ सुन्दर तथा बड़े पर्वतो को चूर-चूर करता हुआ गया था।

उस मार्ग में, उस राक्षस के रथ का चिह्न कुछ दूर तक जाकर फिर अदृश्य हो गया था और ऐसा लगा, जैसे वह रथ नभ में उठ गया हो। तब रामचन्द्र ने ऐसी व्यथा के साथ, जैसे जले हुए घाव में बरछा चुभ गया हो, कहा—ऐ भाई! अब हम क्या उपाय करें?

लक्ष्मण ने उत्तर दिया—मल्लयुद्ध के लिए सन्नद्ध, पुष्ट कंधोंवाले हे महिमामय! यह बात स्पष्ट विदित हो रही है कि वह रथ दक्षिण दिशा की ओर गया है। आपके धनुष