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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 412, कुल 549 में से

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पृष्ठ 412
४०४कंब रामायण

से निकलनेवाले शर के लिए गगन-मंडल भी कुछ बड़ा नहीं है। आपका इस प्रकार दुःख से अधीर होना उचित नहीं है।

तब राम ने कहा—हाँ, तुम्हारा कथन ठीक ही है। फिर, वे दोनों दक्षिण दिशा की ओर गये। दो योजन दूर जाने पर वहाँ उन्होंने ढहे हुए ऊँचे पर्वत के समान धरती पर गिरी हुई और वीणा के चित्र से युक्त पटवाली एक ध्वजा देखी।

उस ध्वजा को देखकर उन्होंने विचार किया—कदाचित् सीता के निमित्त से देवों ने उन राक्षसों से युद्ध किया होगा। फिर, रामचन्द्र ने यह सोचकर कि (जटायु की) चोंच-रूपी शस्त्र से ही यह उज्ज्वल ध्वजा टूटकर गिरी है। अपने कमल-जैसे नयनों में अश्रु भरकर कहा—

भाई ! मेरा विचार है कि हमारे पितृतुल्य (जटायु) शीघ्रता से यहाँ आये होंगे और उनकी चोंच से ही यह (ध्वजा) टूटी होगी। (जटायु) ने बड़े वेग से इसपर आक्रमण किया होगा। हमें विदित नहीं हुआ है कि उन्हें (अर्थात्, जटायु को) इस बीच में क्या हुआ। वे अकेले हैं और जरा से जीर्णदेह भी हैं।

तब लक्ष्मण ने कहा—बहुत ठीक है। यह निश्चित है कि अवार्य पराक्रम से युक्त वे (जटायु) आज दिन-भर उस राक्षस को रोके खड़े रहेंगे। हम भी शीघ्र उनके पास पहुँच जायें। कदाचित् वे (जटायु) स्वयं ही (सीता) देवी को मुक्त कर लायेंगे। अब अन्य कुछ सोचते हुए विलंब करने से कुछ प्रयोजन नहीं है।

राम भी वैसे ही आगे बढ़ने को सहमत हुए। फिर, वे दोनों धरती पर चक्कर काटकर बहनेवाली हवा (अर्थात्, बवंडर) के जैसे, और चरखी के जैसे अतिवेग से बढ़ चले। इधर-उधर दृष्टि डालते हुए जानेवाले उन वीरों ने एक स्थान पर, गगन से टूटकर गिरे हुए इन्द्र-धनुष के समान और समुद्र से उठी हुई वीची के समान पड़े हुए एक टूटे हुए विशाल धनुष को देखा।

तब रामचन्द्र ने लक्ष्मण से कहा—हे लक्ष्मण ! यह धनुष देवताओं के द्वारा क्षीर-सागर को मथने में मथानी बनाये गये मन्दर-पर्वत की समता करता है। चन्द्र की-सी देहकान्ति-वाले जटायु ने अपनी चोंच से काटकर इसे तोड़ दिया है, उस (जटायु) की शक्ति भी कैसी है ?

फिर, कुछ दूर जाने पर उन्होंने एक स्थान में एक त्रिशूल को और अनेक बाणों से पूर्ण दो तूणीरों को पर्वत-जैसे पड़े हुए देखा और उनके निकट गये।

फिर, आगे बढ़कर उन्होंने राक्षसराज के वक्ष पर से (जटायु के द्वारा) खींचकर नीचे गिराये गये उस कवच को देखा, जो ऐसा लगता था, मानो नभ में संचरण करनेवाले सब ज्योतिष्पिंड एकत्र होकर उस रूप में वहाँ आये हों और जो अरण्य-पथ को (अपनी विशालता और कान्ति से) आवृत करके पड़ा हुआ हो।

फिर, वे आगे बढ़कर उस स्थान पर पहुँचे, जहाँ पवन-के-से वेगवाले घोड़े, अरण्य-प्रदेश को ढककर बिखरे पड़े थे और सारथि भी मरा हुआ पड़ा था। वहाँ रक्त से युक्त मांस-खंड भी बिखरे थे। फिर, वे उस स्थान पर आ पहुँचे, जहाँ जटायु ऐसे गिरा हुआ था, जैसे गगन ही धरती पर आ गिरा हो।