कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
अरण्यकाण्ड ४०३
नही मिटेगी, नही मिटेगी। और, त्वरित गति से दीर्घ मार्ग को पार करके, धनुष से निकले शर के समान चले और स्वर्ण-सदृश सीता के आवासभूत मनोहर पर्णशाला मे जा पहुँचे।
इस प्रकार, राम आश्रम मे दौड़े आये। किन्तु, वहाँ फुलवारी के सघन पुष्पों से आभूषित कुतलोंवाली (सीता) को न देखकर इस प्रकार स्तब्ध खडे रहे, जिस प्रकार प्राण शरीर को छोड़कर बाहर जाकर फिर वापस लौट आये हों और अपने शरीर को न देखकर स्तब्ध खड़े हो।
सुन्दर कर्णाभरण से भूषित सीता को न देखकर रामचन्द्र का मन विरक्त-सा हुआ। वे इस प्रकार हो गये, जिस प्रकार कोई धनी व्यक्ति, जिसकी भूमि मे गाड़ी हुई सब संपत्ति को धूर्त्त व्यक्तियो ने हर लिया हो और जो जीवन के आश्रयभूत किंचित् धन से भी वञ्चित हो गया हो और भ्रांत होकर खड़ा हो।
उस समय धरती चकराने लगी। बड़े-बडे पर्वत चकराने लगे। दिव्य ज्ञान से युक्त सत्पुरुषों के हृदय चकराने लगे। वीची-भरे सप्त समुद्र चकराने लगे। आकाश चकराने लगा। ब्रह्मा के नयन चकराने लगे। सूर्य और चन्द्र चकराने लगे।
समस्त लोक यह आशंका करते हुए थरथराने लगे कि यह महिमावान् (राम) धर्म पर क्रुद्ध होनेवाला है? या कृपण (नामक गुण) पर क्रुद्ध होनेवाला है? देवताओं के पराक्रम पर क्रुद्ध होनेवाला है? मुनियो पर क्रुद्ध होनेवाला है? क्रूर राक्षसो के अत्याचार पर क्रुद्ध होनेवाला है? वेदो पर क्रुद्ध होनेवाला है? न जाने, राम के क्रोध का परिणाम क्या होगा?
उस श्याम-रूप (राम) की मनोदशा के परिवर्त्तित हो जाने से, अपरिमेय (चर-अचर रूप) वस्तुजाल, ऊपर के रहनेवाले नीचे और नीचे के रहनेवाले ऊपर होकर सब उसी प्रकार अस्त-व्यस्त हो गये, जिस प्रकार प्रलय-काल में, सृष्टि के कारणभूत परमात्म-तत्त्व में विलीन होने के लिए वे (सृष्टि के पदार्थ) अस्त-व्यस्त होकर मिट जाते हैं।
तब अनुज (लक्ष्मण) ने रामचन्द्र को नमस्कार करके कहा—रथ के पहियो के चिह्नों को हम यहाँ देख रहे हैं। कोई राक्षस देवी का स्पर्श करने से डरकर यहाँ के भूखंड-सहित ही उन्हें उठाकर ले गया है। अब निःशक्त-से खड़े रहकर व्यर्थ ही कुछ सोचते रहने से कुछ लाभ नहीं होगा। (उस राक्षस के) दूर जाने के पूर्व ही हम उसका पीछा करेंगे।
अमल रूप (राम) ने भी इससे सहमत होकर कहा—हाँ, यही उचित है। फिर, वे दोनों वीर अपने उज्ज्वल तूणीर आदि को लेकर उस मार्ग से होकर चल पड़े, जहाँ से रावण का बड़ा रथ सुन्दर तथा बड़े पर्वतो को चूर-चूर करता हुआ गया था।
उस मार्ग में, उस राक्षस के रथ का चिह्न कुछ दूर तक जाकर फिर अदृश्य हो गया था और ऐसा लगा, जैसे वह रथ नभ में उठ गया हो। तब रामचन्द्र ने ऐसी व्यथा के साथ, जैसे जले हुए घाव में बरछा चुभ गया हो, कहा—ऐ भाई! अब हम क्या उपाय करें?
लक्ष्मण ने उत्तर दिया—मल्लयुद्ध के लिए सन्नद्ध, पुष्ट कंधोंवाले हे महिमामय! यह बात स्पष्ट विदित हो रही है कि वह रथ दक्षिण दिशा की ओर गया है। आपके धनुष
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से निकलनेवाले शर के लिए गगन-मंडल भी कुछ बड़ा नहीं है। आपका इस प्रकार दुःख से अधीर होना उचित नहीं है।
तब राम ने कहा—हाँ, तुम्हारा कथन ठीक ही है। फिर, वे दोनों दक्षिण दिशा की ओर गये। दो योजन दूर जाने पर वहाँ उन्होंने ढहे हुए ऊँचे पर्वत के समान धरती पर गिरी हुई और वीणा के चित्र से युक्त पटवाली एक ध्वजा देखी।
उस ध्वजा को देखकर उन्होंने विचार किया—कदाचित् सीता के निमित्त से देवों ने उन राक्षसों से युद्ध किया होगा। फिर, रामचन्द्र ने यह सोचकर कि (जटायु की) चोंच-रूपी शस्त्र से ही यह उज्ज्वल ध्वजा टूटकर गिरी है। अपने कमल-जैसे नयनों में अश्रु भरकर कहा—
भाई ! मेरा विचार है कि हमारे पितृतुल्य (जटायु) शीघ्रता से यहाँ आये होंगे और उनकी चोंच से ही यह (ध्वजा) टूटी होगी। (जटायु) ने बड़े वेग से इसपर आक्रमण किया होगा। हमें विदित नहीं हुआ है कि उन्हें (अर्थात्, जटायु को) इस बीच में क्या हुआ। वे अकेले हैं और जरा से जीर्णदेह भी हैं।
तब लक्ष्मण ने कहा—बहुत ठीक है। यह निश्चित है कि अवार्य पराक्रम से युक्त वे (जटायु) आज दिन-भर उस राक्षस को रोके खड़े रहेंगे। हम भी शीघ्र उनके पास पहुँच जायें। कदाचित् वे (जटायु) स्वयं ही (सीता) देवी को मुक्त कर लायेंगे। अब अन्य कुछ सोचते हुए विलंब करने से कुछ प्रयोजन नहीं है।
राम भी वैसे ही आगे बढ़ने को सहमत हुए। फिर, वे दोनों धरती पर चक्कर काटकर बहनेवाली हवा (अर्थात्, बवंडर) के जैसे, और चरखी के जैसे अतिवेग से बढ़ चले। इधर-उधर दृष्टि डालते हुए जानेवाले उन वीरों ने एक स्थान पर, गगन से टूटकर गिरे हुए इन्द्र-धनुष के समान और समुद्र से उठी हुई वीची के समान पड़े हुए एक टूटे हुए विशाल धनुष को देखा।
तब रामचन्द्र ने लक्ष्मण से कहा—हे लक्ष्मण ! यह धनुष देवताओं के द्वारा क्षीर-सागर को मथने में मथानी बनाये गये मन्दर-पर्वत की समता करता है। चन्द्र की-सी देहकान्ति-वाले जटायु ने अपनी चोंच से काटकर इसे तोड़ दिया है, उस (जटायु) की शक्ति भी कैसी है ?
फिर, कुछ दूर जाने पर उन्होंने एक स्थान में एक त्रिशूल को और अनेक बाणों से पूर्ण दो तूणीरों को पर्वत-जैसे पड़े हुए देखा और उनके निकट गये।
फिर, आगे बढ़कर उन्होंने राक्षसराज के वक्ष पर से (जटायु के द्वारा) खींचकर नीचे गिराये गये उस कवच को देखा, जो ऐसा लगता था, मानो नभ में संचरण करनेवाले सब ज्योतिष्पिंड एकत्र होकर उस रूप में वहाँ आये हों और जो अरण्य-पथ को (अपनी विशालता और कान्ति से) आवृत करके पड़ा हुआ हो।
फिर, वे आगे बढ़कर उस स्थान पर पहुँचे, जहाँ पवन-के-से वेगवाले घोड़े, अरण्य-प्रदेश को ढककर बिखरे पड़े थे और सारथि भी मरा हुआ पड़ा था। वहाँ रक्त से युक्त मांस-खंड भी बिखरे थे। फिर, वे उस स्थान पर आ पहुँचे, जहाँ जटायु ऐसे गिरा हुआ था, जैसे गगन ही धरती पर आ गिरा हो।
अँरण्यकाण्ड ४०५
प्रलय-काल मे जिस प्रकार उज्ज्वल कान्ति बिखेरनेवाले अनेक सूर्यमंडल मनोहर नभोमंडल को छोड़कर धरती पर आ पड़े हों, उसी प्रकार अनेक रत्नमय कुंडल एवं उत्तम रत्न-जटित अनेक आभरण वहाँ बिखरे पड़े थे। उन्हें देखकर वे विस्मित हुए।
राम ने लक्ष्मण से कहा—हे भाई ! यहाँ अनेक अंगद गिरे हैं। उज्ज्वल कुंडल भी अनेक गिरे हैं। रत्नमय किरीट अनेक गिरे हैं। अतः, निस्सहाय वृद्ध जटायु के साथ युद्ध करनेवाले सिंह-सदृश वीर अनेक रहे होंगे।
लक्ष्मी के पति ने जब इस प्रकार कहा, तो सुमित्रा के सिंह (सदृश पुत्र) ने कहा—वृक्ष-समान दीर्घ भुजाएँ अनेक हैं, शिर अनेक हैं, हमारे तात (जटायु) से युद्ध करनेवाला और इतनी दूर तक ले आनेवाला एक ही था। वह रावण ही रहा होगा।
पुष्पहारो से भूषित अनुज की बात से सहमत होकर रामचन्द्र अपने दृढ मन तथा नयनों से क्रोधाग्नि उगलते हुए इधर-उधर देखते हुए बढ़ चले और वहाँ एक स्थान पर अपने शरीर से प्रवाहित रक्त-धारा मे, समुद्र मे रखे पर्वत (मंदर) जैसे पड़े हुए तात (जटायु) को देखा।
उत्तम तथा अमल (रामचन्द्र), पुष्ट अरुण कमल-जैसे अपने नयनो से अश्रु बहांत हुए, अपने प्राणों के सदृश उपमाहीन, उदार, गुणवान् जटायु पर आकर इस प्रकार गिरे, मानों अग्निवर्ण शिवजी के रजताचल पर कोई अंजन-पर्वत आ गिरा हो।
रामचन्द्र एक मुहूर्त्तकाल तक श्वास-हीन पड़े रहे। लक्ष्मण ने यह आशंका करके कि राम मूर्च्छित हो गये हैं, उनके समीप जाकर उनको अपने अरुण करों से उठाकर आलिंगित कर लिया और निर्झर से जल लेकर उनके मुख पर छिड़का। तब राम ने अपने कमल-समान नयन खोलकर धीरे-धीरे प्रज्ञा पाई और यो कहने लगे—
कौन पुत्र ऐसे हुए हैं, जिन्होने अपने पिता की हत्या की हो। मेरे पिता मेरे विरह से पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो गये। हे मेरे पितृतुल्य (जटायु) ! मेरी सहायता करने आकर तुम भी प्राणहीन हो गये ! हाय ! मै पापी, इन (दोनों) की मृत्यु (का कारण) बन गया।
हे मेरी माता-समान (जटायु) ! यह न सोचकर कि मैं अकेला हूँ, और यह भी विचार न करके कि आगे का परिणाम क्या होगा, मोह-ग्रस्त होकर (मायामृग के पीछे) गया। मेरी पत्नी की विपदा से रक्षा करने के लिए आकर तुमने अपना कर्त्तव्य निवाहा। किन्तु मै, जो अपने कर्त्तव्यो को पूर्ण नही कर सका हूँ, किस प्रयोजन से व्याकुल होऊँ? (अर्थात्, अब मेरा रोना व्यर्थ है।)
मुझे मर जाना चाहिए। किन्तु, वेदज्ञ मुनियों की इच्छाओ को पूर्ण करने का व्रत मैने लिया है। अतः, अभी तक प्राण रख रहा हूँ। वृक्ष के जैसे बढ़ा हूँ, किन्तु किंचित् भी प्रयोजन से रहित नीच कार्य करनेवाला हूँ। वंचना के विषयभूत इस क्षुद्र जन्म को मैं नही चाहता।
मेरी पत्नी के बन्दी हो जाने पर, उसे मुक्त करने के लिए लड़कर महिमामय तुम, जो आहत होकर पडे हो। तुमको मारनेवाला वह शत्रु अभी जीवित है। दृढ धनुष को और शरों को ढोता हुआ मैं लंबे पेड़ के जैसे खड़ा हूँ, खड़ा हूँ। अहो !
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अब मेरे समान यशस्वी ( इस संसार मे ) और कौन है ? हे दृढ पंखोवाले ! असंख्य दाँतोवाले ! पुरातन पाप से युक्त मेरी पत्नी के देखते हुए, शस्त्रधारी शत्रु ने तुमको मार दिया और चला गया । मै धनुष हाथ मे रखकर व्यर्थ ही जीवित हूँ । अहो, मेरी वीरता भी कैसी है !
अपना उपमान न रखनेवाले रामचन्द्र इस प्रकार के अनेक वचन कहकर अश्रु बहाते रहे और मूर्च्छित हो गये। अनुज ( लक्ष्मण ) की भी वैसी ही दशा हो गई । तब गृध्र-राज कुछ-कुछ प्रज्ञा पाकर बड़ी कठिनाई से साँस लेने लगा और आँखें खोलकर उन दोनों को देखा ।
( सीता की क्या दशा हुई ) यह वृत्तांत कुछ न जाननेवाले. व्याकुल प्राणो के साथ उष्ण श्वास भरनेवाले जटायु ने उन विजयी वीरों को देखा । उससे उसका मन ऐसा आनंदित हुआ, जैसे उसके कटे हुए पक्ष, प्रिय प्राण और सत लोक भी उसे प्राप्त हो गये हो। उसने ऐसा सोचा कि मैंने शत्रु को ही जीतकर उससे प्रतिशोध लिया है।
फिर जटायु ने कहा— हे पुण्यात्माओ ! मैं अब अपने इस निष्प्रयोजन तथा अपयश के भाजन शरीर को त्याग रहा हूँ । सौभाग्य से ही इस समय तुम दोनो को देख सका हूँ । मेरे निकट आओ । फिर, रावण के किरीटधारी शिरो पर चोट मार-मारकर छिन्न हुई अपनी चोंच से उनके शिरों को बारी-बारी से कई बार सूँघा ।
मेरे मन ने पहले ही कहा था कि उस ( रावण ) का यहाँ आगमन माया से हुआ है । ( अर्थात्, वह माया से तुमको धोखा देकर ही वहाँ आया ) । फिर भी, अक्षुण्ण पराक्रम से युक्त तुम दोनों, मधुर बोलीवाली उस अरुंधती को (अर्थात्, अरुंधती-तुल्य पतिव्रता सीता को) अकेली ही छोड़कर कैसे चले गये ?
उसके यह कहते ही कनिष्ठ ( लक्ष्मण ) ने मायामृग के आने से लेकर सारी घटनाओ को कह सुनाया ।
रामचन्द्र की आज्ञा से वीर लक्ष्मण ने जब सब कह सुनाया, तब गृध्रराज ने सब सुनकर और यह विचार करके कि राम-लक्ष्मण को उनके दुःख में कुछ सांत्वना देना आवश्यक है, इस प्रकार के वचन कहे—
इस निंदनीय जीवन के सुख-दुःख विधि के वशीभूत हैं। कोई उनमें कुछ परिवर्त्तन नही कर सकता । इस तत्त्व को हमें मानना पड़ेगा। यदि इसे नही मानेंगे, तो क्या अपनी बुद्धि के बल से विधि के विधान को मिटा सकेंगे ?
जब विधिवश विपदा उत्पन्न होती है, तब मन की धीरता का त्याग कर व्याकुल होना अज्ञता है । जिस नियति ने सारी सृष्टि के कर्त्ता के सिर को काटा था; उसके लिए असाध्य कार्य कुछ नहीं है ।
जब सुख या दुःख उत्पन्न हो, तब यह कहना कि इसको हम रोक सकते हैं, असत्य वचन होगा ( अर्थात्, कर्मफल से प्राप्त सुख को कोई रोक नहीं सकता ) । त्रिपुरों को जलाने के लिए जिस ( शिव ) ने शर का प्रयोग किया था, उसने कपाल में भिक्षा माँगकर खाते हुए तपस्या की थी । क्या यह उनके लिए योग्य था ?
अरण्यकाण्डं ४०७
फुफकार भरनेवाले घोर सर्प (राहु और केतु) गगन में उष्ण किरणों को प्रसारित करनेवाले (सूर्य) को निगलकर फिर उगल देते हैं। विशाल धरती के अंधकार को दूर करके उसे प्रकाशित करनेवाला चंद्रमा घटता-बढ़ता रहता है।
हे सुन्दर कंधोंवाले! विपदाओं का आना और जाना प्रारब्ध कर्म का परिणाम है। ज्ञानवान् देवगुरु (बृहस्पति) के शाप-वचन से देवेंद्र¹ को जो विपदाएँ उठानी पड़ीं, क्या उन्हें कोई गिन सकता है?
हे धनुर्विद्या में चतुर वीर! जब अवार्य पराक्रमशाली शंबर नामक असुर के अत्याचारों से वज्रधारी इंद्र पराजित हुआ था; तब तुम्हारे पिता ने अपने पुष्ट कंधों के प्रभाव से उस असुर को मारा था।
(गीध, चील आदि) पक्षियों और ज्ञान-रहित भूतों के लिए मातृ-तुल्य, मांसगंध से युक्त माला धारण करनेवाला (अर्थात्, राक्षसों को युद्ध में मारकर उनके मांस का भोजन भूतों तथा पक्षियों को देनेवाला) उपेक्षित धर्म एवं देवताओं की विपदा ने तुम्हें मधुर बोलीवाली सीता से विलग किया है, अतः माया-युद्ध करनेवाले राक्षस नामक काँटेदार झाड़ियों को उखाड़कर तुम जियो।
आम के टिकोरे के जैसे सुन्दर नयनोंवाली तथा दीर्घ केशपाशवाली (सीता) को रावण भूखंड-सहित उठाकर ले जा रहा था। तब मैंने अपनी शक्ति-भर उसे रोका, किंतु उसने तपस्या के प्रभाव से प्राप्त करवाळ से मुझे आहत कर दिया, जिससे मैं यों गिरा हूँ। आज ही यह घटना घटी है।—इस प्रकार जटायु ने कहा।
जटायु के कहे ये वचन कानों में प्रवेश करें, इसके पूर्व ही रामचन्द्र के अरुण नयन अग्नि उगलने लगे। उनके निःश्वास से चिनगारियाँ बिखरीं। भौंहें ऊपर जा चढ़ीं। (उनके ऐसे क्रोध से) ज्योतिष्पिंड (सूर्य, चन्द्र आदि) भयभीत होकर भाग गये। ब्रह्मांड में अनेक स्थानों पर दरारें पड़ गईं। पर्वत दह गये।
धरती घूम उठी। ऊँचे पर्वत घूम उठे। विशाल समुद्र जल, पवन और सूर्य-चन्द्र घूम उठे। ऊपर के लोक में स्थित ब्रह्मा घूम उठा। तब यह सत्य स्पष्ट हुआ कि वह वीर (राम) ही सब प्रकार के पदार्थ हैं (अर्थात्, सृष्टि के सब पदार्थ उस राम के ही अनेक रूप हैं)।
यह सोचते हुए कि रामचन्द्र अपना क्रोध न जाने, किस पर उतारेंगे, सकल लोक भय से काँप उठे। उस समय लाल अग्नि ज्वालाएँ चिनगारियों तथा धुएँ के साथ सर्वत्र
१. पुराणों में यह कथा प्रसिद्ध है कि एक बार देवेंद्र ने अपनी संपत्ति से गर्विष्ठ होकर अपने गुरु बृहस्पति का निरादर किया, जिसपर क्रुद्ध होकर बृहस्पति कहीं अदृश्य हो गये। गुरु के न रहने से इन्द्र त्वष्टा के पुत्र विश्व-रूप को गुरु बनाकर स्वर्ग का शासन करने लगा। विश्व-रूप ने असुरों के प्रति प्रेम दिखाकर उन्हें यज्ञों में हविर्भाग दिया, तो उसपर क्रुद्ध होकर इंद्र ने उन्हें मार डाला। तब त्वष्टा ने यज्ञ से वृत्र को उत्पन्न करके इंद्र के विरुद्ध भेजा। उसके साथ युद्ध में इंद्र ने अनेक कष्ट उठाये। पश्चात् दधीचि महर्षि की अस्थि का शस्त्र बनाकर उसे मारा। किन्तु, ब्रह्महत्या के कारण इंद्र को अनेक वर्ष तक राज्यभ्रष्ट होकर कष्ट भोगने पड़े। इस पद्य में उसी कथा की ओर संकेत है। —अनु०
४०८ कंब रामायण
उठने लगी। एक ज्वलन्त अट्टहास भयंकर शब्द कर उठा (अर्थात्, रामचन्द्र वीरता के आवेश में ठठाकर हँस पडे)। फिर वे कहने लगे—
एक अज्ञ राक्षस एक निस्सहाय स्त्री को उठाकर ले गया और तुम्हारी ऐसी दशा हुई। तो भी अष्ट दिशाओं में स्थित ये सब लोक विचलित हुए बिना अबतक स्थिर खड़े हैं। देवता लोग अत्याचार को देखते हुए चुपचाप खड़े रहें। देखो, अभी मै इन सबको विध्वस्त कर डालता हूँ।
अभी तुम देखोगे कि सब नक्षत्र टूटकर गिरते हैं। अनुपम किरणवाला सूर्य चूर-चूर हो जाता है। विशाल आकाश में सर्वत्र आग लग जाती है। जल, पृथ्वी, अग्नि, आकाश और पवन एव सब चराचर वस्तुजाल समूल विनष्ट हो जाते हैं और देवता लोग मिट जाते हैं—(यह सब तुम अभी देखोगे)।
तुम यह भी देखोगे कि किस प्रकार स्थित रहनेवाले तथा महान् लगनेवाले ये चतुर्दश लोक एक क्षण में मिट जाते हैं। अष्ट दिशाओं की सीमा में स्थित तथा ब्रह्मांड के बाहर स्थित पदार्थ ही एक क्षण में जलकर भस्म हो जाते हैं—यह सारा दृश्य तुम अब देखनेवाले हो। इस प्रकार राम ने क्रोध के साथ कहा।
उष्ण किरणवाला सूर्य (राम के क्रोध से) बचने का प्रयत्न करता हुआ मेरु पर्वत के शिखरों में जा छिपा। अष्ट दिशाओं में स्थित महान् गज भय से भाग गये। अब क्या यह कहना आवश्यक है कि संसार के सब प्राणी भय से विह्वल हो गये? अत्यन्त धीर चित्तवाला लक्ष्मण भी (राम का क्रोध देखकर) भय से काँपने लगा, तो अन्य लोगों के भय की क्या कोई सीमा हो सकती थी?
जब इस प्रकार घट रहा था, तब गृध्रराज (जटायु) ने कहा—हे उत्तम गुणवाले! तुम जीवित रहो, किंचित् भी क्रोध मत करो। कठोर प्रतापयुक्त हे वीर, देव और मुनि यह विचार कर कि तुम्हारे कारण (राक्षसों पर) उनकी विजय होगी, आनन्दित हैं। वे अन्य किस बल से रावण को पराजित कर सकते हैं?
कमलभव ब्रह्मा से प्राप्त वर के प्रभाव से रावण ने मुझपर जो वीरता दिखाई, इसे प्रत्यक्ष तुम देख रहे हो। अब इसके बारे में (अर्थात्, रावण के पराक्रम के सम्बन्ध में) और क्या कहना है? कमल में उत्पन्न ब्रह्मा से लेकर सब देवता उस दशमुख की सेवकाई करते हैं, न कि धर्म की रक्षा। उसकी रक्षा करनेवाला कौन है?
समुद्र से घिरी धरती पर रहनेवाले सब लोग स्त्रियों के समान उस शत्रु (रावण) की सेवकाई करते रहते हैं। देवताओं की यह दशा है। यदि क्षीरसागर के मंथन के समय उन देवताओं ने अमृत नही पिया होता, तो उनके प्राण कभी के मिट गये होते।
दृढ़ शरासन को अपने सुन्दर करों में धारण करनेवाले हे वीरो! कंचुक में बँधे स्तनोंवाली लता-तुल्य उस देवी को एकाकी छोड़कर सींगवाले हरिण के पीछे जाकर तुम इस प्रकार के अपयश के भाजन हो गये। विचार कर देखने पर विदित होगा कि यह अपराध तुम्हारा ही है। संसार के लोगों का नहीं।
अतः, तुम क्रोध मत करो। अरुंधती-समान उस पतिव्रता की विपदा को दूर करो।
श्रीअरण्यकांड ४०६
देवताओ के मनोरथ को पूर्ण करो। अपने सब कर्त्तव्यो को वेदोक्त विधान से संपन्न करो और संसार के पापो को दूर करो। इस प्रकार, भगवान् के चरण-कमलो को प्राप्त होनेवाले जटायु ने कहा।
मेघ-जैसे श्यामल (राम) ने उस पुण्यवान् (जटायु) की बात को दशरथ की ही आज्ञा मानकर स्वीकार किया और यह विचार कर कि दूसरो पर क्रोध करने से अब क्या प्रयोजन है, राक्षसो के कुल का नाश करना ही प्रस्तुत कर्त्तव्य है, अपने मन के क्रोध को शान्त कर लिया।
फिर, उस अमल (राम) ने जटायु से कहा—तुमने मुझे शान्त रहने की जो आज्ञा दी है, उसके अतिरिक्त मेरे लिए अन्य कोई कर्त्तव्य नही है। अब बताओ कि वह राक्षस (रावण) किस दिशा में गया? किन्तु, इतने में वह गृध्रराज शिथिल हो गया। उसकी प्रज्ञा मिट गई। कुछ उत्तर नही दे पाया और धीरे-धीरे उसके प्राण निकल गये।
वह जटायु (अपनी अंतिम घड़ी मे) उस भगवान् (राम) के चरणो के दर्शन कर सका, जो भगवान् शीतल कमल से उत्पन्न ब्रह्मा के लिए क्या, स्वयं वेदो के लिए भी अज्ञेय हैं। अतः, वह उस (वैकुंठ) लोक में जा पहुँचा, जो पञ्चभूतो को भी मिटा देनेवाले महाप्रलय में भी नही मिटता।
जब जटायु मुक्ति पा गया, तब राम और उनके अनुज शोक-मग्न हुए। वन के वृक्ष, मृग, पक्षी और पत्थर भी पिघल उठे। ब्रह्मा आदि देवता, नाग तथा भूलोकवासी अपने शिर पर हाथ जोड़कर नमस्कार करते हुए खड़े रहे।
उस समय, राम ने अपने अनुज से कहा—भाई धर्महीन राक्षस से मेरा पौरुष परास्त हुआ। क्या अब संन्यास लेकर तपस्या करूँ? या प्राण छोड़ दूँ? बताओ। मुझे पुत्र के रूप मे पाकर पिता मर गये। ऐसा जन्म पाकर मै अबतक मरा नही। मै क्या करूँ?
राम के इस प्रकार कहने पर लक्ष्मण ने उन्हे प्रणाम करके उत्तर दिया—हे विजयशील! विधि के परिणाम से ऐसी विपदाएँ होती हैं। अब उनको सोचकर दुःखी होने से क्या प्रयोजन है? उन क्रूर राक्षसो का समूल विनाश करना पहला कर्त्तव्य है। उसके पश्चात् (जटायु की मृत्यु आदि विपदाओ का स्मरण कर) दुःख कर सकते हैं (अर्थात्, यह दुःख करने का समय नही, वरन् शत्रु-नाश करने का है)।
हे मेरे प्रभु! विरक्त होकर आप सुन्दर कुंतलोवाली देवी को खोकर भी शांति के साथ रह सकते हैं, तो रहे। किन्तु, हमारे पितृ-तुल्य (जटायु) को मारनेवाले राक्षस को मारे बिना आप किस प्रकार तपस्या-निरत रह सकते हैं?
अनुज के वचनो से किंचित् स्वस्थ होकर सर्वज्ञ राम ने यह सोचकर कि इस प्रकार दुःख-मग्न होना अज्ञता है, अपनी व्याकुलता तथा अश्रुओ को भी दूर करके कहा—हे भाई! मरे हुए पितृ-तुल्य जटायु की अंतिम क्रिया यथाविधि संपन्न करें।
उन्होने काले अगरु-काष्ठो के साथ चंदन-काष्ठो को सजाकर उनपर दर्भों को बिछाया। फिर पुष्प बिखेरे। मिट्टी की वेदी बनाकर उसपर स्वच्छ जल को रखा। फिर, राम जटायु की देह को अपने विशाल हाथो से उठाकर लाये।
४१० | कंब रामायण
समृद्ध शास्त्रों के तत्त्वों और मंत्रों को जाननेवाले राम ने (जटायु की देह पर) जल, चंदन और पुष्प डाले। अपने दोनों हाथों से उसे चिता पर रखा। फिर, चिता के' सिरहाने से अग्नि प्रज्वलित की एवं अन्य सब संस्कार पूर्ण किये।
राक्षसों के प्रति क्रोध करने से राम का दुःख किंचित् शान्त हुआ। उनके पुष्ट तथा शुक के-से रंगवाले श्यामल शरीर पर उनके नेत्रों से इस प्रकार अश्रु झड़ पड़े, जिस प्रकार प्रफुल्ल कमल से मधु-बिन्दु गिरते हैं। यों मेघ-समान उन (राम) ने नदी में स्नान किया और अंजलि में स्वच्छ जल लेकर जटायु को तिलांजलि अर्पित की।
राम के द्वारा अर्पित उस जलांजलि से ब्रह्मा से लेकर उच्च तथा नीच सब प्राणि-जात, अत्यत तृप्त हुए। गृध्रराज को उद्दिष्ट करके प्रभु ने अपनी अंजलि से जो स्वच्छ जल अर्पित किया, वह स्वयं भगवान् के लिए भी पीने योग्य बन गया। अब उस जल-तर्पण के बारे में और क्या कहा जाय ?
विजयशील चक्रवर्ती कुमार (राम) ने सब संस्कार वेदोक्त प्रकार से संपन्न किये। उस समय सूर्य पश्चिमी समुद्र में जा पहुँचा, मानो वह अपने कुल से सम्बन्ध रखने-वाले जटायु की मृत्यु से उत्पन्न शोक से जल में स्नान करने और सद्गति देनेवाले संस्कार करने को जा रहा हो। (१-१५०)
अध्याय १०
अयोमुखी पटल
जब संध्या हो रही थी तब वे (राम-लक्ष्मण) उस स्थान से चलकर उस वन में स्थित एक पर्वत पर जाकर ठहरे, जिस पर्वत के शिखर पर हाथी और मेघ विश्राम करते थे। इतने में अत्यन्त दुःख का कारणभूत अंधकार इस प्रकार फैला, जैसे इंद्र के वश में न होने-वाले राक्षस सर्वत्र फैल गये हों।
उस रात्रिकाल में, जब वन्य वृक्षों तथा पर्वतों से मधु और जल की धाराएँ इस प्रकार बह रही थी, मानो (राम-लक्ष्मण के दुःख से) शोकाकुल होकर वे आँसू बहा रहे हों, राम और लक्ष्मण के मन में अभिमान, क्रोध, दुःख तथा ज्ञान—ये सब परस्पर संघर्ष करने लगे।
उस रात्रिकाल में, जो तत्त्वज्ञान से रहित बुद्धि को पापमार्ग में चलानेवाले असत्य जन्म के जैसे ही उत्तरोत्तर बढ़ रहा था, उन (राम और लक्ष्मण) का निःश्वास घी के पड़ने पर भड़की हुई आग के समान बढ़ रहा था। तब उनके शोक का कहीं कुछ अन्त नहीं था।
मधुयुक्त पुष्पमाला से भूषित राम के नयन-रूपी अरुण-कमल रात्रि के समय में भी मुकुलित नहीं हुए। वह क्या मनोहर मदहास से शोभित सीता नामक लक्ष्मी के वियोग
आरण्यकाण्डे ४११
के कारण था ? या उस (सीता) के मुख-रूपी चन्द्र के दर्शन न करने के कारण था ? हम उसका कारण नहीं कह सकते ।
स्त्री-रूप दीप के समान स्थित, अति रूपवती सीता के वियोग के कारण उत्पन्न अत्यधिक दुःख में राम ने अपने मन में क्या विचार किया—यह हम नहीं जानते, (हम इतना ही कह सकते हैं कि) उस पुष्प-स्वरूप राम के नयन भी निद्रा में मुकुलित न होकर उनके पुष्ट कंधोंवाले भाई (लक्ष्मण) के नयनों के जैसे ही (खुले) रहे^१ (अर्थात्, राम ने निद्रा नहीं की)।
जहाँ शीतल तथा मधुर मद मारुत-रूपी सर्प संचरण करता था, उस पर्वत के समीप में गगनतल को प्रकाशित करता हुआ उज्ज्वल चन्द्रमा इस प्रकार उदित हुआ कि रामचन्द्र ने मानो भ्रमरों से गुंजरित पुष्पमाला धारण करनेवाली सीता के वदन-बिंब को ही देखा हो।
उस रात्रिकाल में गर्व-भरा मन्मथ-रूपी चोर जब छिपकर अपना प्रभाव दिखाता था, संसार-भर में प्रकाशित होकर बढ़नेवाली चाँदनी की बाढ़ (राम को) इस प्रकार जलाने लगी, जैसे अंधकार-रूपी विष से युक्त सर्प के छेदवाले विष-दंत के भीतर का विष हो।
विष के समान फैलनेवाली उज्ज्वल चाँदनी वीर (राम) को पीड़ित कर रही थी। सीता के हरण से उत्पन्न अपमान की भावना उनके विवेक को हर रही थी, वे अन्य सब विचारों को छोड़कर केवल उन सीता के, जो सर्पफण-सदृश जघन तटवाली थी, दुग्ध-जैसी मीठी बोलीवाली थी और दीर्घ नेत्रवाली थी, अकेलेपन के बारे में ही सोच रहे थे।
राम ओठ चबाते, निःश्वास भरते, उनके कंधे फूलते और शिथिल होते। महान् गज के द्वारा तोड़ी गई, शीतल पल्लवों तथा पुष्पों से शोभायमान शाखा-सदृश सीता के बारे में सोचते।
समुद्र में उठनेवाली वीचियों के समान उनके निःश्वास उठ-उठकर गिरते थे। वे सोचते कि सीता यह सोचकर कि रामचन्द्र अपना धनुष झुकाये हुए आते ही होंगे, मार्ग के दोनों ओर देखती हुई गई होगी।
जब विद्युत्-जैसे खड्ग-दंतोंवाला रावण—'ठहरो!' 'ठहरो!' कहता हुआ सीता के निकट (उसे उठा ले जाने के लिए) गया होगा, तब सीता ने मेरा स्मरण नहीं किया होगा—यह कहना उचित नहीं है। (उसके स्मरण करने पर भी जब मैं उसकी रक्षा के लिए नहीं आया, तब न जाने मेरे बारे में उसने क्या सोचा होगा।)
विष-दंतों से युक्त (राहु नामक) सर्प के मुँह में पड़े चन्द्र के समान कांतिहीन सीता, क्रूर राक्षस के क्रोध से भयभीत हुई होगी। हाय! यों सोचते।
अपमान और विरह-ताप—इन दोनों से व्याकुल होनेवाले उनके प्राण इन दोनों के मध्य रहकर इनके द्वारा बारी-बारी से सताये जा रहे थे, जिससे दुःखी हो रामचन्द्र सोचते—क्या अब भी मुझे धनुष की आवश्यकता है?
सनातन वेदों के पारंगत सब पंडितों के द्वारा देखे जानेवाले राम अपने धनुष को
^१ इसके पूर्व अयोध्याकांड में यह कहा गया है कि लक्ष्मण वनवास के समय, कभी नहीं सोते थे, किंतु रात-दिन जागरित रहकर राम की परिचर्या में निरत रहते थे।—अनु०
४१२ | कंब रामायण
देखकर हँसते, तथा संसार में, प्राप्त होनेवाले अपने अपयश को सोचकर स्तब्ध रह जाते।
वे (राम) हाथी के जैसे बड़े शब्द के साथ निःश्वास भरते। शीतल पवन-रूपी क्रूर यम को देखकर कहते—हाय ! वेदोक्त विधान से मेरे द्वारा परिणीत सीता मुझसे वियुक्त हो गई।
मैंने अनेक प्राणियों की रक्षा करने का व्रत लिया है। किन्तु, आभरणों से भूषित मेरी पत्नी बनी हुई एक कुलीन नारी की विपदा को मैं दूर नहीं कर सका। मेरा पराक्रम भी खूब है। इस प्रकार सोचकर राम लज्जित होते।
उसका मन व्याकुल होता, उसके ओंठ सूख जाते, वे मूर्च्छित होते। अनुज के द्वारा निर्मित शीतल पल्लव-शय्या पर लेट जाते। उनके शरीर-ताप से वे पल्लव झुलस जाते, तो (राम) अपने अनुज से कहते कि ये पत्ते हटा दो। फिर (लक्ष्मण के द्वारा लाये गये) नये तथा अरुण पल्लवों को देखते। किंतु, उनके शरीर-स्पर्श से वे नये पल्लव भी झुलस जाते, तो व्याकुल-प्राण हो वे थक जाते।
वे राम, जिनके कमल-समान नयनों के झँपने के एक क्षण काल में अनेक युग व्यतीत होते थे (अर्थात्, जो विष्णु के अवतार थे) इस समय वहाँ रहकर उस रात्रि का कुछ अन्त नहीं देख पाते थे। इसका कारण सीता का वियोग था या (सीता के प्रति) उनके प्रेम की अधिकता थी, यह हम (लेखक) नहीं जानते।
विजय के कारणभूत भाले को रखनेवाले अपने भाई को देखकर, वे (राम) कहते—तुमने देखा है न कि इसके पहले, सभी दिन एक ही जैसे व्यतीत होते थे। किन्तु, आज यह रात्रि क्यों इतनी दीर्घ हो रही है?
दीर्घ लगनेवाले रात्रिकाल में प्रकाशमान चन्द्र को देखकर वे कहते—हे चन्द्र! पहले तुम प्रतिदिन आते और (सीता के मुख की समता न कर सकने के कारण) क्षीण होकर लज्जित होते रहते थे। अब आभरण-भूषित सीता के उज्ज्वल वदन के दूर हो जाने पर तुम पूर्ण प्रकाश से चमक रहे हो।
राम फिर कहते—गगन में संचरण करनेवाला एक चक्र रथ से युक्त सूर्य भगवान्, प्रसूत चन्द्रिका के सदृश उज्ज्वल कीर्त्ति से सम्पन्न अपने कुल में अवारणीय अपयश के आ जाने से मानो लज्जित होकर ही भूलोक से अदृश्य हो गये हैं।
दुःखद रात्रि के दीर्घ लगने से शिथिल होनेवाले राम सोचते, कदाचित् क्रूर रावण ने सूर्य के सारथि अरुण के साथ सूर्य को भी बाँधकर बड़े कारागार में डाल रखा है (इसलिए दिन नहीं हो रहा है)।
राम सोचते—यदि डमरू-समान कटिवाली सीता नहीं दिखाई पड़े और घोर अंधकार से पूर्ण रात्रि-रूपी कल्पकाल भी यों ही व्यतीत हो जाये, तो समुद्र से घिरी हुई यह धरती मेरे हाथों विनष्ट हो जायगी।
राम कहते—कठोर तपस्या करनेवाले मुनिगण विपदा में पड़े रहें और उन (मुनियों) के प्राणों को पीड़ित करके संसार के प्राणियों को खाकर विचरनेवाले अधर्मी राक्षस बलवान् होकर जीवित रहे, तो अब धर्म से क्या प्रयोजन है?
अरण्यकाण्ड ४१३
भ्रमरो की दिव्य डोरी से युक्त धनुष मे पुष्प-शरो को रखकर प्रयुक्त करनेवाले वीर मन्मथ ने राम पर वाण प्रयुक्त करने के लिए लक्ष्य-संधान किया। तव रामचन्द्र कर्तव्य-मूढ होकर स्तब्ध रह गये।
जब कोई दुःखी व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है, तब उसे उसके पुराने दुःख का स्मरण अधिक सताने लगता है। उसी प्रकार मन्मथ, जो इनके पहले एक बार तपस्वी शिव के क्रोध से जल गया था, अब उसका स्मरण करके दुःखी हुआ। (भाव यह है कि अपने बाणों से भीत होकर संतप्त होनेवाले राम को देखने से मन्मथ को शिवजी के द्वारा उसको उत्पन्न पुराना दुःख स्मरण हो आया, जिससे अव वह दुःखी हुआ।)
इस प्रकार, नीलवर्ण रामचन्द्र के मन में (वियोग-दुःख) शूल-सा साल रहा था। इस समय वह रात्रिकाल ऐसे ही समाप्त हुआ, जैसे आदिकारणभूत भगवान् (नारायण) के नाभि-कमल से उत्पन्न ब्रह्मा का एक कल्प समाप्त हुआ हो।
जल-धारा से शब्दायमान क्षीरसागर में सुखमय योग-निद्रा करना छोड़कर, भ्रमरो तथा मधु से शब्दायमान पुष्पमाला से भूषित सीता के शील-रूपी समुद्र मे निमग्न होनेवाले राम को देखकर सहानुभूति से पक्षी शब्द करते थे, कानन शब्द करते थे और पर्वत-निर्झर शब्द करते थे। राम के मन मे (सीता का) अलंकृत रूप प्रकट था। किन्तु, नयनो के सम्मुख प्रकट नही था। अतः, उन (राम) के प्राणों के स्वस्थ रहने का क्या उपाय हो सकता था ?
मयूर और मयूरी साथ-साथ संचरण करते थे। हरिण और हरिणी साथ-साथ विहार करते थे। करी और करिणी साथ-साथ घूमते-फिरते क्रीडा करते थे। इन सबको देखकर, रामचन्द्र, जो पिक, इक्षु, मधु, मुरली-वीणा, गाढ़ी चाशनी, अमृत आदि को भी फीका करनेवाली मीठी वाणी से युक्त सीता से वियुक्त थे, क्या दुःखी न होगे ?
किरणों से युक्त सूर्य, किरीट-जैसे शिखरवाले उदयगिरि पर अत्युज्ज्वल रूप मे ऐसे प्रकाशमान हुआ, मानो प्रभात होने पर भी सीता के दर्शन न पाने से दुःखी रहनेवाले वीर रामचन्द्र को उस समय कमल-पुष्पों को प्रफुल्ल कर यह दिखाना चाहता हो कि पहले दिन की संध्या को जिन कमलो को मैने वन्द किया था, उनमें सीता नही है।
रामचन्द्र वहाँ के वन को देखते। उस वन में स्थित चक्रवाक को देखते। वृक्ष की पुष्पित शाखाओं को देखते। बाल कलापी-तुल्य सीता के केशपाश का स्मरण करते। पर्वत सदृश स्तन-द्वय को याद करते। उनपर की पत्रलेखा को याद करते और फिर अपनी भुजाओ को देखते। यों अपना समय व्यतीत करते।
उस समय, अनुज (लक्ष्मण) ने उनके चरणों को नमस्कार करके कहा—हे प्रभु। देवी का अन्वेषण किये बिना यहाँ इस प्रकार विलंब करना क्या उचित है ? तब कीर्त्तिमान् प्रभु ने उत्तर दिया—उस रावण के स्थान को ढूँटकर पहचानेंगे। फिर, उज्ज्वल धनुष से युक्त वे दोनों पर्वत-श्रेणी से युक्त तथा धूप से तप्त उस कानन मे चल पड़े।
दिग्गजों के समान वे दोनों हरियाली से युक्त अनेक अरण्यों को पीछे छोड़कर अठ्ठारह योजन दूरी पार कर चले।
अरण्यकाण्ड ४१५
दीर्घ मापदंड से मापने योग्य दूरी उसके एक पग मे समाती थी। उसके बड़ी तेजी से चलने के कारण आँतों और चरवी से संयुक्त मासखंड इधर-उधर गिरते थे। उसका जघन-तट अनेक पापों का स्थान था। उसके दाँत पीसने से वज्र घोष-सा शब्द होता था।
वह इस प्रकार घूरती थी कि उसकी दृष्टि शिवजी की-सी (अग्निमय) लगती थी। उसके दाँत इतने भयकर थे कि वे अग्निमय नयन भी (उन दाँतों की तुलना मे) शीतल लगते थे। उसके गमन-वेग से पर्वत अस्त-व्यस्त हो जाते थे। समुद्र परस्पर मिल जाते थे और दोषहीन भूमि भी उसे देखकर लजित होती थी। (अर्थात्, क्षमामय भूदेवी भी अयोमुखी जैसी एक पापिन स्त्री को देखकर उसके स्त्रीत्व पर लज्जित होती थी)।
उसके करों में दीर्घ सर्पों के वलय पड़े थे। उसने गरजनेवाले व्याघ्रों का हार पहन रखा था। अनेक शरभों को एक साथ गूँथकर ताली¹ बनाकर पहन लिया था। बलवान् सिंहों को कर्णाभरण के रूप में धारण कर लिया था।
वह (अयोमुखी) प्रकृति से ही 'घुँघची' के जैसे रहनेवाले (अर्थात्, लाल) नेत्रों से काम-वेदना से अश्रु भरकर (लक्ष्मण को) घूरती हुई खड़ी रही। तब अँधेरे मे घूमनेवाले सिंह-सदृश लक्ष्मण ने उसके बिजली-जैसे दाँतों के प्रकाश में उसे देखा।
तुरंत वे लक्ष्मण समझ गये कि यह स्त्री दुष्ट राक्षसों के कुल में उत्पन्न है और पहले नाक आदि के कट जाने से दुःखी हुई, अति बलशाली शूर्पणखा, ताड़का आदि के जैसे स्वभाववाली है।
इन गुणहीन तथा पापी राक्षसियों के हमारे निकट आने का और कोई उपयुक्त कारण नहीं है, यों विचारकर उससे पूछा—हिंस्र जन्तुओं के आवासभूत इस अरण्य में इस घने अँधेरे में आई हुई तू कौन है ? शीघ्र बता।
लक्ष्मण ने इस प्रकार कहा। उस समय, संशय से युक्त मनवाली उस राक्षसी ने, बोलने में कुछ संकोच किये बिना, उत्तर दिया—यद्यपि तुमसे मेरा पूर्ण परिचय नहीं है, तो भी तुम पर प्रेम करके मैं आई हूँ। मेरा नाम अयोमुखी है।
फिर वह कहने लगी—हे अति सुन्दर वीर ! पहले अन्य किसी से अस्पृष्ट (इसके पहले दूसरे किसीसे न छुए गये) मेरे इन स्तनों का, तुम अपने स्वर्ण रंगवाले विशाल वक्ष से आलिंगन करो और मेरे प्राणों की शीघ्र रक्षा करो।
क्रूर गुण को शांत करके उस राक्षसी ने ये वचन कहे। तब क्रोधी सिंह जैसे लक्ष्मण के नयन लाल हो उठे और उन्होने कहा—यदि तू ऐसी बात फिर अपने मुँह से निकालेगी, तो मेरा अनुपम बाण तेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर देगा।
लक्ष्मण को अपने प्रतिकूल कुछ कहते हुए सुनकर भी वह मन मे क्रुद्ध नहीं हुई। किन्तु, सिरपर हाथ जोड़कर (नमस्कार करती हुई) उसने निवेदन किया—हे नायक। यदि तुमको मैं अपने प्राण-रक्षक के रूप में पाऊँगी, तो मुझे आज नया जन्म मिलेगा।
क्रोधहीन हो वह (राक्षसी) पुन: बोली—हे उत्तम ! अगर तुम्हे यहाँ स्वच्छ जल को पाना है, तो मुझे अभयदान दो। मैं गंगा का जल भी अभी यहाँ पर लाकर उपस्थित करूँगी।
१. 'ताली' एक आभूषण या पदक है, जिसे दक्षिण में विवाहिता स्त्रियां अपने गले में पहनती है।—अनु०
४१६ कंब रामायण
सौमित्रि उसके वचनों को सह नहीं सके और बोले—अभी यहाँ से भाग जा; नहीं तो तेरे कानों और नाक को काट दूँगा। तब वह राक्षसी स्तब्ध हो, अपलक खड़ी रही और सोचने लगी—
मैं इसको अपनी गुफा में उठा ले जाऊँगी और वहाँ बन्दी बनाकर रखूँगी। जब इसकी उग्रता शान्त होगी, तब यह मेरी इच्छा पूरी करने को सहमत होगा। यही कर्तव्य है। इस प्रकार सोचकर वह लक्ष्मण के पार्श्व में गई।
उस क्रूर राक्षसी ने मोहन-मंत्र का प्रयोग किया और गगनोन्नत पर्वत-सदृश लक्ष्मण को उठाकर गगन-मार्ग से इस प्रकार चली, जैसे चन्द्रमण्डल के साथ मेघ जा रहा हो।
लक्ष्मण को ले चलनेवाली वह अयोमुखी, मन्दर पर्वत से युक्त समुद्र, देवेन्द्र से आरूढ करिणी और भाले से शूर-पद्म नामक असुर को मारनेवाले, घोर पराक्रम से युक्त, कार्त्तिकेय से आरूढ मयूर के जैसे लगती थी।
उस समय, उस राक्षसी के वक्ष तथा हाथो में स्थित, उज्ज्वल वीर-वलय-भूषित लक्ष्मण, उन शिवजी की समता करते थे, जिन्होंने क्रोध-भरे, मदस्रावी हाथी को मारकर उसके चर्म को वस्त्र के रूप में पहन लिया था।
वह (अयोमुखी) इस प्रकार गई। इधर संतप्तचित्त रामचन्द्र, यह चिंता करते हुए कि जल की खोज में गया हुआ, मेरे प्राण-समान तथा बलवान् पर्वत-समान लक्ष्मण अभीतक, न जाने, क्यो नही आया। वे लक्ष्मण की खोज में चल पड़े।
राम सोच्चते जाते थे कि लक्ष्मण कम वेगवान् नही है। वह शीघ्र आनेवाला है। कदाचित् धूप से जले अरण्य में जल नही मिला या अन्य कोई घटना घटित हुई है। न जाने क्या कारण है ?
मैंने कहा कि इस मार्ग से जाकर कही से जल ले आओ। किन्तु इतना विलंब हो जाने पर भी वह अभी तक नही आया। क्या उसने सीता का हरण करनेवाले राक्षसों के साथ कुछ प्रयोजन होने के विचार से, युद्ध छेड़ दिया है ?
क्या मधुरभाषिणी शुकी-जैसी सीता का हरण करनेवाला रावण, इसे भी उठा ले गया? या विष से भी भयंकर उस रावण के माया-कृत्य से और दुर्देव से वह मृत हो गया ?
दृढ धनुष को धारण करनेवाला मेरे प्राण-समान भाई अभीतक नही लौटा। क्या इस वेदना से कि मै उसके कथन की उपेक्षा करके सीता को खो बैठा, उसने अपने प्राणो का अन्त कर दिया है ?
इस घने अ्रधकार में, मुझसे वियुक्त उस प्यारे लक्ष्मण के अतिरिक्त, मेरे और नेत्र नही है ? (अर्थात्, लक्ष्मण ही मेरे नेत्र हैं, जिसके बिना मै अंधा-सा हूँ)। पहले ही घायल हुए मेरे हृदय में अब एक नई पीडा उत्पन्न हुई है। मैं कुछ भी सोच नही पा रहा हूँ। अब मै कैसे उसका अन्वेषण करूँ ?
मेरे दुर्भाग्य को बदलने का कुछ उपाय नहीं है। अब मेरे प्राण-सदृश तुम भी
अरण्यकाण्ड ४१७
अदृश्य हो गये । हे तात ! मुझे इस प्रकार छोड़कर तुमने भूल की । यह तुम्हारा कार्य कठोर है । गुरुजन तुम्हारे इस कार्य को नही सराहेगे ।
आई हुई विपदाओं को दूर करने मे समर्थ हे वीर ! तुमने मुझे अवार्य दुःख दिया । शत्रुओं से भी प्रशंसित होनेवाले हे वीर ! क्या मुझसे घृणा करते हुए मुझे इस अरण्य में पीडित होने के लिए छोड़कर चले गये हो ? इतनी देर तक मुझसे वियुक्त होकर कही रह जाना, क्या तुम्हारे लिए उचित है ?
मै अपने पिता से वियुक्त हुआ। अपनी माता से वियुक्त हुआ। लक्ष्मी-समान, स्वर्णाभरण-भूषित सीता से वियुक्त हुआ। फिर, मै जो जीवित रहा, वह तुम, एक के वियुक्त न होने से ही तो था ?
(हरिण के पीछे मेरे जाने पर) मुझे ढूँढ़ते हुए तुम हाथी के समान चले आये थे । अब तुम अदृश्य होकर, स्वर्णमय कर्णाभरणों से भूषित सीता को ढूँढनेवाले मुझ दीन को, अपने भी ढूँढ़ने के लिए दुःखी बनाकर छोड़ गये हो ।
कौन बतानेवाला है कि तुम कहाँ हो ? (तुम्हारे न मिलने पर) मै आज प्राण-त्याग किये बिना नही रहूँगा। यदि मै मरूँगा, तो मेरे स्वजनों में से भी कोई जीवित नही रहेगा । अतः, हे कठोरहृदय ! तुम, एक साथ सब स्वजनों को मारनेवाले हो गये हो । यह क्या तुम्हारे लिए उचित है ?
मान्धाता आदि हमारे पूर्वजी के आचार के अनुसार राजा बनना छोड़कर मैने अरण्य-वास करने का साहस किया । उस समय सच्चा बन्धु बनकर जब दूसरा कोई नही आया, तब तुम्ही मुझ एकाकी के साथी बनकर आये । अब तुम भी मुझे छोड़कर चले गये हो ?
इस प्रकार कहते हुए मेरे अनुपम प्रभु रामचन्द्र उठते, गिरते, स्तब्ध होते, प्रज्ञाहीन होते, फिर कहते—हाय ! इस घने अँधेरे में न बिजली है, न गर्जन । फिर भी, यह क्या विपदा आ पड़ी है ? (अर्थात्, भावी विपदा की पूर्व सूचना कुछ नहीं हुई और यह अकस्मात् क्या हुआ ?) रामचन्द्र की वह दुःखपूर्ण दशा एक-जैसी नही थी ।
युद्ध के उन्माद से पूर्ण मत्तगज की समता करनेवाले वे (राम), अनेक स्थानों में जाकर (लक्ष्मण को) ढूँढते । शीघ्र गति से जाते । (लक्ष्मण का) नाम लेकर पुकारते । व्याकुलप्राण और मूर्च्छित होते ।
क्षमाशील (सीता) देवी के साथ मेरे प्राणों की भी रक्षा करते हुए अपलक रहनेवाला लक्ष्मण, क्या लौट आने मे इतना विलंब करता ? धरती का भार बनकर दुर्भाग्य के साथ संचरण करनेवाले मुझ पापी का जीवित रहना अनुचित है ।
फिर यह कहकर कि, 'यदि मेरे द्वारा किया गया कोई सुकृत हो और उस (लक्ष्मण) का ज्येष्ठ होकर उत्पन्न होने की कुछ योग्यता मुझमें हो, तो मै वैसे ही पुनर्जन्म पाऊँ'—रामचन्द्र अपना तीक्ष्ण करवाल कर में लेकर अपने प्राणों का अन्त करने को उद्यत हुए, इतने में—
उधर लक्ष्मण राक्षसी की माया से मुक्त हुआ और उस (राक्षसी) की नासिका
४१८ कंब रामायण
आदि अगो को काट दिया। तब उस राक्षसी ने बड़ी व्यथा से जो चीख मचाई, वह ध्वनि राम के कानों मे आ गिरी, तो उमसे राम किंचित् स्वस्थ-से हुए।
फिर, राम ने सोचा—प्रस्तरमय अरण्य में अनेक वीर-ककणो से मुखरित युद्ध करनेवाले राक्षसों की विरोध-सूचक ध्वनि यह नहीं है। यह तो विपदा में पड़ी हुई एक स्त्री की ही ध्वनि है और वह कोई राक्षसी ही है।
उस समय, नीलवर्ण राम ने आग्नेय अस्त्र को अपने अरुण कर में लेकर उसे प्रयुक्त करने का उपक्रम किया। तब वहाँ का अंधकार हटकर भूलोक के दूसरे कोने में जाकर इकट्ठा हो गया और उस स्थान में रात्रिकाल दिन के समान भासमान हो उठा।
रामचन्द्र बड़े-बड़े पर्वतों को चूर करते हुए, ऊँचे वृक्षो को तोड़ते हुए, भूमि को अपने पदचाप से पीडित करते हुए और अपने दोनों पाश्र्वों में चड़चड़ाहट की ध्वनि उत्पन्न करते हुए चंडमारुत से भी तिगुने वेग के साथ (उस राक्षसी को निहत करने के लिए) बढ चले।
प्रलयकाल में जिस प्रकार काला समुद्र धरती पर उमड आये, उस प्रकार का दृश्य उपस्थित करते हुए आनेवाले, अपने सहायक ज्येष्ठ भ्राता को लक्ष्मण ने देखा और कहा—'हे उदार! चिंता न करें, चिंता न करें।'
'यह दास आ गया। आप मन में व्याकुल न हो।'—यो कहते हुए लक्ष्मण रामचन्द्र के कोमल पल्लव-जैसे चरणों पर नत हुआ। रामचन्द्र ने मानों अपनी खोई आँखें पुनः प्राप्त कीं।
उन रामचन्द्र की दशा, जिनकी आँखों से झरने के समान अश्रु बह रहे थे, उस गाय की-सी हो गई, जो अपना बछड़ा खो जाने से, उसे खोजने का मार्ग भी न देखती हुई व्याकुल रहती हो और स्वय ही उस बछड़े के आ जाने पर अपने थन से दूध बहाती हुई खड़ी हो।
उस समय, राम ने लक्ष्मण का पुनः-पुनः आलिंगन किया और अपनी अश्रुधारा से उसके स्वर्ण-जैसे शरीर को धो डाला। फिर कहा—हे लोहे के स्तंभ-जैसे कधोवाले। यह सोचकर कि तुम कहो खो गये हो, अबतक मै अत्यत दुःखी हो रहा था।
'क्या घटित हुआ? मुझे बताओ।'—राम के यों पूछने पर लक्ष्मण ने सारा वृत्तांत कह सुनाया। तब उन प्रभु ने, जिनसे बड़ी अन्य कोई सत्ता नहीं है, आनंद और व्यथा दोनों को एक साथ ही प्राप्त किया।
फिर, राम ने लक्ष्मण से कहा—जो विशाल समुद्र के मध्य फँसा हो, क्या प्रत्येक लहर के आते समय उसका भयभीत होना उचित है? उसी प्रकार दुर्दैव के प्रभाव से जन्म-रूपी बंधन में पड़े हुए हमें, दुःखद विपदा के प्राप्त होने पर शिथिल नही होना चाहिए।
तीन देव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश), तीन लोको के निवासी—सब मेरे शत्रु बनकर आवें, तो भी मुझे कौन जीत सकेगा? भाई! तुम मेरे साथ हो—यह एक बात ही मुझे बल देता है। इससे बढकर मुझे और कोई रक्षा नहीं चाहिए। (अर्थात्, अन्य कोई सेना आवश्यक नहीं है।)
अरण्यकाण्ड ४१६
मुझसे जो वियुक्त होते हो, होवें । जितनी भी आपदाएँ आती हो, आये । किंतु दीर्घ वीर-कंकण धारण करनेवाले हे वीर ! वे सारी आपदाएँ तुम्हीं से दूर होनेवाली हैं । मेरे निकट रहकर वे ( विपदाएँ ) मुझे सता नहीं सकती ।
भयंकर युद्ध करने में निपुण वीर । तुमने कहा कि युद्धकुशल राक्षसी को परास्त कर लौटे हो । क्षुद्र स्वभाववाली उस राक्षसी के वचनों से उत्तेजित होकर उसे तुमने मार तो नही डाला ? बताओ ।
तब लक्ष्मण ने कहा—'मैने उस राक्षसी की नाक, कान और बंधन मे स्थित स्तनों को काट दिया । उस समय वह चीख उठी ।' यह कहकर ( लक्ष्मण ) हाथ जोड़कर खड़े रहे ।
आनंद से प्रफुल्ल होकर राम ने कहा—अँधेरे मे तुम्हें मारने के लिए आई हुई राक्षसी को भी तुमने नही मारा । किन्तु, उसका अंग-भंग मात्र किया । तुम चतुर हो । मनु प्रभृति राजाओं के इस वंश के अनुकूल ही तुमने आचरण किया है और अपने भाई को गले लगा लिया ।
वीर ( राम ) और लक्ष्मण—जैसे अपार दुःख से मुक्त हुए । वारुण अस्त्र को प्रयुक्त करके गगन मे वर्षा उत्पन्न की और उसका जल पीकर प्रभात काल की प्रतीक्षा करते हुए एक पर्वत पर विश्राम करते रहे ।
पत्थरो से भरी धरती पर, अरण्य के पल्लवों और पुष्पो को लेकर लक्ष्मण के-द्वारा बनाई गई शय्या पर, बड़ी वेदना भोगते हुए रामचन्द्र ने शयन किया । लक्ष्मण उनके कोमल चरणों को सहलाते रहे ।
राम ने कलापी-तुल्य सीता से वियुक्त हो जाने के पश्चात् अपमान की पीडा से कुछ आहार नही किया था । शोक की अधिकता से निद्रा भी नही की थी । उनके ऐसे दुःख का वर्णन हम कैसे कर सकते हैं ? उनके निःश्वासो के मध्य उनके प्राण झूलते रहे ।
राम, विरह की पीडा से बोल उठे—मेरी आँखों को अरण्य में सर्वत्र सीता का रूप ही दिखाई पड़ता है । यह क्या इसलिए कि मै उसके रूप को नही भूल सका हूँ, या नही तो क्या यह भी राक्षसों की माया है ?
काले केशोंवाली, अरुण रेखावाले नेत्रो से युक्त तथा पतिव्रता नारियो के आभरण-सदृश उस ( सीता ) को मैं अपने पार्श्व में देखता हूँ । किन्तु, उसका आलिंगन करने के लिए उद्यत होने पर उसका स्पर्श नही पाता हूँ । क्या उसकी कटि के समान ही उसका आकार भी थोड़ा-थोड़ा करके क्षीण होता हुआ अदृश्य हो गया है ।
( पहले मुझे ऐसे लगा जैसे ) मैने उसके सद्योविकसित कमल ( समान मुख ) के मधुपूर्ण बिंब तथा प्रवाल के समान अधर के अमृत का पान किया । किन्तु, वह मेरे पार्श्व में नही थी । क्या पलक न लगने पर भी स्वप्न दिखाई पड़ते हैं ?
यदि यह रात्रि मुझे ऐसा दुःख दे, जो पृथ्वी, गगन आदि पञ्चभूतो एव मन के विचार से भी बड़ा हो, तो क्या यह ( रात्रि ) शीतल, सुगध तथा नीलवर्ण से युक्त कुतलों-वाली सीता की आँखों से भी बड़ी होगी ?
| ४२० | कंब रामायण |
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जल तथा उसमें संचरण करनेवाले मीनों से युक्त समुद्र से मनोहर चन्द्र के नाम से जो प्रलयाग्नि उत्पन्न हुई है, उसकी उष्ण किरणों के स्पर्श से उन्नत आकाश के शरीर-भर में फफोले-से पड़ गये हैं (अर्थात्, नक्षत्र आकाश के फफोले कहे गये हैं।)
चक्रवर्त्ती राम इस प्रकार के अनेक वचन कहकर व्याकुल हो रहे थे। उसी समय अरुण किरणोंवाला-सूर्य इस प्रकार उदित हुआ, जैसे उन (राम) की दुःखमय दशा को देखकर स्वयं दुःखी होकर सहानुभूति दिखा रहा हो। (१-१०१)
अध्याय ११
कबन्ध पटल
वे (राम-लक्ष्मण), प्रभात के समय उस कलापी-तुल्य रूपवती, पतिव्रता (सीता) देवी का, जिसकी क्षमा की तुलना में पृथ्वी का क्षमा-गुण भी निस्सार-सा लगता था, अन्वेषण करते हुए गये। पक्षी इस प्रकार शब्द कर रहे थे, मानों वे उनके दुःख को देखकर रो रहे हों।
वे दोनों धनुर्धर वीर, पचास योजन-पर्यंत अरण्य को पार करके गये और कबंध नामक उस राक्षस के वन में जा पहुँचे, जो एक ही स्थान पर पड़ा रहता था और अपनी दीर्घ बाँहों को दूर तक फैलाकर सब प्राणियों को हाथों से उठाकर अपने पेट में भर लेता था। इतने में सूर्य भी आकाश के मध्य आ पहुँचा।
(उस राक्षस के हाथों में पड़नेवाले) हाथी से चींटी तक, सब प्राणी मिट जाते थे। उसको देखने मात्र से अत्यंत भय से काँपने लगते थे। उसके चंगुल में आकर फिर उस बंधन से वे कभी छूट नहीं पाते थे।
कबंध के निकट सब प्राणी इस प्रकार काँपते रहते थे, जिस प्रकार, कुल-परंपरा से आगत नीतिमार्ग को छोड़नेवाले, शासन की दक्षता से रहित, शक्तिहीन राजा के राज्य में रहनेवाले प्राणी हों। वे बिखर जाते, एक साथ सम्मिलित होते, पीडित होकर भागते और स्तब्ध हो खड़े रहते।
बड़े-बड़े पर्वत भी कबंध के हाथों में लुढ़कते हुए चले आते। बड़े-बड़े वृक्ष भी जड़ से उखड़-उखड़कर निकल आते। अरण्य की नदियाँ उमड़कर ऊँचे स्थानों एवं सब दिशाओ में फैल जातीं। जल-भरे मेघ भी नीचे आ गिरते। यह सारा दृश्य उन वीरों ने देखा।
जिस प्रकार सारी सृष्टि के विनाश का कारणभूत प्रलय-काल जब आता है, तब प्रभंजन का थपेड़ा खाकर चतुर्दिक् से समुद्र उमड़ उठता है और गर्जन करता हुआ सारी पृथ्वी को ढक देता है, उसी प्रकार सबको चारों ओर से घेरकर आनेवाली (कबंध की) उन बाँहों में वे (राम-लक्ष्मण) भी फँस गये।
श्रीराघवयादवार्डे ४२१
मानो चक्रवाल पर्वत ही सिमटकर आ रहा हो, इस प्रकार आनेवाली उन प्राचीर-जैसी बाँहो में फँसकर वे दोनों वीर, यह सोचकर प्रसन्न हुए कि मधु-जैसी मीठी बोलीवाली सीता की रक्षा के उद्देश्य से रावण की सेना ही आकर उन्हे घेर रही है (और उस सेना को मिटा देने का सुअवसर हमे प्राप्त हुआ है)।
राम ने अपने अनुज को देखकर कहा—हे तात ! ऐसा लगता है कि सीता का हरण करनेवाला रावण यही पर निवास करता है। अब हमारा दुःख मिटनेवाला है।
तब लक्ष्मण ने (राम को) प्रणाम करके उत्तर दिया—यह राक्षस-सेना होती, तो क्या नगाड़े बजने की ध्वनि और शंखनाद नहीं सुनाई देते ? यह राक्षस-सेना नहीं है और कुछ है। फिर, लक्ष्मण भी सोचने लगे (कि यह क्या है ?)।
फिर, लक्ष्मण ने (राम से) कहा—प्रलयकाल में भी अमर रहनेवाले हे प्रभु ! यह कदाचित् वह सर्प ही है, जिससे देवो ने मंदर-पर्वत को लपेटकर क्षीर-सागर को मथा था, अथवा यह कोई दूसरा सर्प है। यह (सर्प) अपने मुँह से अपनी पूँछ को जोड़कर घेरा बनाकर हमें बाँध रहा है।
आगे-आगे चलनेवाले (राम) ने लक्ष्मण के इन वचनों को सुनकर सोचा कि उसका कथन ठीक ही है। फिर (उस घेरे मे) दो योजन दूर जाने पर वे दोनो उस पर्वताकार राक्षस के सम्मुख आ खड़े हुए।
वह राक्षस अपनी आँखो के साथ ऐसा दृश्य उपस्थित करता था, जैसे उष्ण किरणवाले दो सूर्यों से युक्त मेरुपर्वत हो। उसके पेट मे ही उसका मुँह था, जिसमे दाँत ऐसे थे कि उनके मध्य दो-दो 'खात' (दस मील का एक खात होता था) की दूरी थी और (वह मुँह) मकर-मीनों से पूर्ण समुद्र के समान था।
उसकी बाँहें इस प्रकार पड़ी थी, जैसे देवो के द्वारा मदर-रूपी दिव्य मथानी को (क्षीरसमुद्र में) डालकर उसपर लपेटा गया वासुकि सर्प दोनों ओर से खींचा जाकर फैला हुआ पड़ा हो।
उसकी नासिका से इस प्रकार अग्नि और धूमलता निकल रही थी, जैसे लुहार की भाथी हो। उसके सामने उसकी जिह्वा इस प्रकार निकली हुई थी, जैसे विशाल समुद्र को एक ही दशा में रखनेवाली वडवाग्नि की ज्वाला हो।
उसके मुँह के दोनो खड्ग-दंत इस प्रकार लगते थे, मानो पूर्णचन्द्र, (राहु नामक) सर्प को अपनी ओर आते हुए देखकर भय से एक सुरक्षित स्थान को खोजता हुआ आया हो और निर्झरों से पूर्ण महान् पर्वत की कंदरा के भीतर, दो खंड होकर, घुस रहा हो।
उसका शरीर शीतल जल, प्रभृति प्रसिद्ध पञ्चभूतो से नही बना था, किंतु शास्त्रों मे बताये गये पञ्चमहापाप ही एकत्र होकर उस आकार मे आ गये थे।
उसके कर्ण-कुहर ऐसे थे, जैसे उष्ण तथा शीतल किरणवाले ज्योतिष्पिंडों (अर्थात्, सूर्य-चन्द्रो) को निगलनेवाले सर्पों (राहु-केतु) के, कुछ कार्य न रहने पर, विश्राम करने के लिए योग्य बिल हो। उसका उदर उस नरक का भी उपहास करनेवाला था, जिसमें असत्य भाषण आदि पाप कर्म करनेवाले नीच गुणवाले पापी रहते हैं।
४२२ | कंब रामायण
वह (कबंध) अपने करों से सब प्राणियों को उठाकर अपने विशाल नाव-जैसे उदर में भर लेता था, जिससे उसका मुँह यम-पुरी के विजयशील द्वार के समान था।
वह समुद्र के समान बड़ा कोलाहल कर रहा था। उसका शरीर हलाहल विष के समान काला और उष्ण था। उसका आकार, विष्णु के चक्र के द्वारा शिर के कट जाने पर पड़े हुए कालनेमि (नामक राक्षस) के कबंध (धड़) के समान था।
वह ऐसा लगता था, जैसे मेरु पर्वत प्रभंजन के झोंके खाने से शिखरों के टूट जाने पर, शिखरहीन हो पड़ा हो। इस प्रकार के कबंध को सूक्ष्म ज्ञानवाले उन दोनों वीरों ने देखा।
उन्होंने उसके उस फटे मुँह को देखा, जिसमें चक्रवाल पर्वतों की सीमा से घिरी हुई सारी पृथ्वी समस्त समुद्रों-सहित गुम सकती थी और उन्होंने सोचा कि यह राक्षसों-जैसे किसी प्राचीरावृत्त नगर का द्वार है, जिसके भीतर देवता लोग भी प्रवेश नहीं कर सकते।
उस समय, अनुज (लक्ष्मण) ने, (कबंध को) भली भाँति देखकर कहा—हे धनुर्विद्या में निपुण! यह कोई बड़ा भूत है। यह सब प्राणियों को अपने हाथों से घेरकर अपने मुँह में डालता है। हमको भी उन प्राणियों के साथ मिलाकर खा जायगा। अब हम क्या करें! तब राम ने उत्तर दिया—
हे धरती को उठानेवाले आदिवराह जैसे बलवाले! हाँ, यह कोई भूत ही है; क्योंकि वह देखो, इसका शरीर इस प्रकार फैला है कि यह विशाल धरती भी इसके लिए पर्याप्त नहीं मालूम होती। इसके दायें और बायें दीर्घ बाँहें फैली हैं।
हे भाई! कलापी-तुल्य सीता वियुक्त हुई। पितृ-तुल्य जटायु मर गये। अपयश से पीडित चित्त के साथ मैं जीवित रहना नहीं चाहता हूँ। अतः, मैं इस (भूत) का भोजन बन जाऊँगा। तुम यहाँ से बचकर चले जाओ।
मुझे जन्म देनेवालों को दुःखी बनाते हुए, अपने भाई को दुःखी करते हुए, गुरुजनों के दुःखी होते हुए, सब अपयश का आश्रम बनकर, मैं उत्पन्न हुआ हूँ। अब मैं अपने प्राण छोड़े बिना इस अपयश को मिटा नहीं सकता।
क्या मैं मिथिला के राजा के पास पर्वत-जैसे दृढ़ तूणीर तथा धनुष को लेकर यह कहता हुआ जा सकूँगा कि गृहस्थाश्रम के योग्य आपके द्वारा प्रदत्त, मधुरभाषिणी पुष्प-लता-समान सीता राक्षसों के घर में रहती है।
'विकसित पुष्पों से भूषित सीता की रक्षा करने के सामर्थ्य से हीन होकर, मैं, अपने अनुज की रक्षा पाकर ही जीवित हूँ'—ऐसी बात सुनने की अपेक्षा यह वचन अच्छा होगा कि 'मैं परलोक में रहता हूँ।' अतः, अब इस जीवन को त्याग देना ही उचित है।
हमारी (लेखक की) दासता को स्वीकार करनेवाले राम ने जब ये बातें कहीं, तब अनुज ने कहा—मैं आपके पीछे-पीछे इस कानन में आया। मेरे आने पर भी ऐसी विपदा आपको प्राप्त हुई है। किन्तु, यदि आपके पूर्व ही मैं अपने प्राण न त्यागकर अपने प्यारे प्राण लेकर लौट जाऊँ, तो मेरी सेवा क्या बहुत भली होगी?