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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 424, कुल 549 में से

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पृष्ठ 424

४१६ कंब रामायण

सौमित्रि उसके वचनों को सह नहीं सके और बोले—अभी यहाँ से भाग जा; नहीं तो तेरे कानों और नाक को काट दूँगा। तब वह राक्षसी स्तब्ध हो, अपलक खड़ी रही और सोचने लगी—

मैं इसको अपनी गुफा में उठा ले जाऊँगी और वहाँ बन्दी बनाकर रखूँगी। जब इसकी उग्रता शान्त होगी, तब यह मेरी इच्छा पूरी करने को सहमत होगा। यही कर्तव्य है। इस प्रकार सोचकर वह लक्ष्मण के पार्श्व में गई।

उस क्रूर राक्षसी ने मोहन-मंत्र का प्रयोग किया और गगनोन्नत पर्वत-सदृश लक्ष्मण को उठाकर गगन-मार्ग से इस प्रकार चली, जैसे चन्द्रमण्डल के साथ मेघ जा रहा हो।

लक्ष्मण को ले चलनेवाली वह अयोमुखी, मन्दर पर्वत से युक्त समुद्र, देवेन्द्र से आरूढ करिणी और भाले से शूर-पद्म नामक असुर को मारनेवाले, घोर पराक्रम से युक्त, कार्त्तिकेय से आरूढ मयूर के जैसे लगती थी।

उस समय, उस राक्षसी के वक्ष तथा हाथो में स्थित, उज्ज्वल वीर-वलय-भूषित लक्ष्मण, उन शिवजी की समता करते थे, जिन्होंने क्रोध-भरे, मदस्रावी हाथी को मारकर उसके चर्म को वस्त्र के रूप में पहन लिया था।

वह (अयोमुखी) इस प्रकार गई। इधर संतप्तचित्त रामचन्द्र, यह चिंता करते हुए कि जल की खोज में गया हुआ, मेरे प्राण-समान तथा बलवान् पर्वत-समान लक्ष्मण अभीतक, न जाने, क्यो नही आया। वे लक्ष्मण की खोज में चल पड़े।

राम सोच्चते जाते थे कि लक्ष्मण कम वेगवान् नही है। वह शीघ्र आनेवाला है। कदाचित् धूप से जले अरण्य में जल नही मिला या अन्य कोई घटना घटित हुई है। न जाने क्या कारण है ?

मैंने कहा कि इस मार्ग से जाकर कही से जल ले आओ। किन्तु इतना विलंब हो जाने पर भी वह अभी तक नही आया। क्या उसने सीता का हरण करनेवाले राक्षसों के साथ कुछ प्रयोजन होने के विचार से, युद्ध छेड़ दिया है ?

क्या मधुरभाषिणी शुकी-जैसी सीता का हरण करनेवाला रावण, इसे भी उठा ले गया? या विष से भी भयंकर उस रावण के माया-कृत्य से और दुर्देव से वह मृत हो गया ?

दृढ धनुष को धारण करनेवाला मेरे प्राण-समान भाई अभीतक नही लौटा। क्या इस वेदना से कि मै उसके कथन की उपेक्षा करके सीता को खो बैठा, उसने अपने प्राणो का अन्त कर दिया है ?

इस घने अ्रधकार में, मुझसे वियुक्त उस प्यारे लक्ष्मण के अतिरिक्त, मेरे और नेत्र नही है ? (अर्थात्, लक्ष्मण ही मेरे नेत्र हैं, जिसके बिना मै अंधा-सा हूँ)। पहले ही घायल हुए मेरे हृदय में अब एक नई पीडा उत्पन्न हुई है। मैं कुछ भी सोच नही पा रहा हूँ। अब मै कैसे उसका अन्वेषण करूँ ?

मेरे दुर्भाग्य को बदलने का कुछ उपाय नहीं है। अब मेरे प्राण-सदृश तुम भी

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