कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 423, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरण्यकाण्ड ४१५
दीर्घ मापदंड से मापने योग्य दूरी उसके एक पग मे समाती थी। उसके बड़ी तेजी से चलने के कारण आँतों और चरवी से संयुक्त मासखंड इधर-उधर गिरते थे। उसका जघन-तट अनेक पापों का स्थान था। उसके दाँत पीसने से वज्र घोष-सा शब्द होता था।
वह इस प्रकार घूरती थी कि उसकी दृष्टि शिवजी की-सी (अग्निमय) लगती थी। उसके दाँत इतने भयकर थे कि वे अग्निमय नयन भी (उन दाँतों की तुलना मे) शीतल लगते थे। उसके गमन-वेग से पर्वत अस्त-व्यस्त हो जाते थे। समुद्र परस्पर मिल जाते थे और दोषहीन भूमि भी उसे देखकर लजित होती थी। (अर्थात्, क्षमामय भूदेवी भी अयोमुखी जैसी एक पापिन स्त्री को देखकर उसके स्त्रीत्व पर लज्जित होती थी)।
उसके करों में दीर्घ सर्पों के वलय पड़े थे। उसने गरजनेवाले व्याघ्रों का हार पहन रखा था। अनेक शरभों को एक साथ गूँथकर ताली¹ बनाकर पहन लिया था। बलवान् सिंहों को कर्णाभरण के रूप में धारण कर लिया था।
वह (अयोमुखी) प्रकृति से ही 'घुँघची' के जैसे रहनेवाले (अर्थात्, लाल) नेत्रों से काम-वेदना से अश्रु भरकर (लक्ष्मण को) घूरती हुई खड़ी रही। तब अँधेरे मे घूमनेवाले सिंह-सदृश लक्ष्मण ने उसके बिजली-जैसे दाँतों के प्रकाश में उसे देखा।
तुरंत वे लक्ष्मण समझ गये कि यह स्त्री दुष्ट राक्षसों के कुल में उत्पन्न है और पहले नाक आदि के कट जाने से दुःखी हुई, अति बलशाली शूर्पणखा, ताड़का आदि के जैसे स्वभाववाली है।
इन गुणहीन तथा पापी राक्षसियों के हमारे निकट आने का और कोई उपयुक्त कारण नहीं है, यों विचारकर उससे पूछा—हिंस्र जन्तुओं के आवासभूत इस अरण्य में इस घने अँधेरे में आई हुई तू कौन है ? शीघ्र बता।
लक्ष्मण ने इस प्रकार कहा। उस समय, संशय से युक्त मनवाली उस राक्षसी ने, बोलने में कुछ संकोच किये बिना, उत्तर दिया—यद्यपि तुमसे मेरा पूर्ण परिचय नहीं है, तो भी तुम पर प्रेम करके मैं आई हूँ। मेरा नाम अयोमुखी है।
फिर वह कहने लगी—हे अति सुन्दर वीर ! पहले अन्य किसी से अस्पृष्ट (इसके पहले दूसरे किसीसे न छुए गये) मेरे इन स्तनों का, तुम अपने स्वर्ण रंगवाले विशाल वक्ष से आलिंगन करो और मेरे प्राणों की शीघ्र रक्षा करो।
क्रूर गुण को शांत करके उस राक्षसी ने ये वचन कहे। तब क्रोधी सिंह जैसे लक्ष्मण के नयन लाल हो उठे और उन्होने कहा—यदि तू ऐसी बात फिर अपने मुँह से निकालेगी, तो मेरा अनुपम बाण तेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर देगा।
लक्ष्मण को अपने प्रतिकूल कुछ कहते हुए सुनकर भी वह मन मे क्रुद्ध नहीं हुई। किन्तु, सिरपर हाथ जोड़कर (नमस्कार करती हुई) उसने निवेदन किया—हे नायक। यदि तुमको मैं अपने प्राण-रक्षक के रूप में पाऊँगी, तो मुझे आज नया जन्म मिलेगा।
क्रोधहीन हो वह (राक्षसी) पुन: बोली—हे उत्तम ! अगर तुम्हे यहाँ स्वच्छ जल को पाना है, तो मुझे अभयदान दो। मैं गंगा का जल भी अभी यहाँ पर लाकर उपस्थित करूँगी।
१. 'ताली' एक आभूषण या पदक है, जिसे दक्षिण में विवाहिता स्त्रियां अपने गले में पहनती है।—अनु०