कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
४१६ कंब रामायण
सौमित्रि उसके वचनों को सह नहीं सके और बोले—अभी यहाँ से भाग जा; नहीं तो तेरे कानों और नाक को काट दूँगा। तब वह राक्षसी स्तब्ध हो, अपलक खड़ी रही और सोचने लगी—
मैं इसको अपनी गुफा में उठा ले जाऊँगी और वहाँ बन्दी बनाकर रखूँगी। जब इसकी उग्रता शान्त होगी, तब यह मेरी इच्छा पूरी करने को सहमत होगा। यही कर्तव्य है। इस प्रकार सोचकर वह लक्ष्मण के पार्श्व में गई।
उस क्रूर राक्षसी ने मोहन-मंत्र का प्रयोग किया और गगनोन्नत पर्वत-सदृश लक्ष्मण को उठाकर गगन-मार्ग से इस प्रकार चली, जैसे चन्द्रमण्डल के साथ मेघ जा रहा हो।
लक्ष्मण को ले चलनेवाली वह अयोमुखी, मन्दर पर्वत से युक्त समुद्र, देवेन्द्र से आरूढ करिणी और भाले से शूर-पद्म नामक असुर को मारनेवाले, घोर पराक्रम से युक्त, कार्त्तिकेय से आरूढ मयूर के जैसे लगती थी।
उस समय, उस राक्षसी के वक्ष तथा हाथो में स्थित, उज्ज्वल वीर-वलय-भूषित लक्ष्मण, उन शिवजी की समता करते थे, जिन्होंने क्रोध-भरे, मदस्रावी हाथी को मारकर उसके चर्म को वस्त्र के रूप में पहन लिया था।
वह (अयोमुखी) इस प्रकार गई। इधर संतप्तचित्त रामचन्द्र, यह चिंता करते हुए कि जल की खोज में गया हुआ, मेरे प्राण-समान तथा बलवान् पर्वत-समान लक्ष्मण अभीतक, न जाने, क्यो नही आया। वे लक्ष्मण की खोज में चल पड़े।
राम सोच्चते जाते थे कि लक्ष्मण कम वेगवान् नही है। वह शीघ्र आनेवाला है। कदाचित् धूप से जले अरण्य में जल नही मिला या अन्य कोई घटना घटित हुई है। न जाने क्या कारण है ?
मैंने कहा कि इस मार्ग से जाकर कही से जल ले आओ। किन्तु इतना विलंब हो जाने पर भी वह अभी तक नही आया। क्या उसने सीता का हरण करनेवाले राक्षसों के साथ कुछ प्रयोजन होने के विचार से, युद्ध छेड़ दिया है ?
क्या मधुरभाषिणी शुकी-जैसी सीता का हरण करनेवाला रावण, इसे भी उठा ले गया? या विष से भी भयंकर उस रावण के माया-कृत्य से और दुर्देव से वह मृत हो गया ?
दृढ धनुष को धारण करनेवाला मेरे प्राण-समान भाई अभीतक नही लौटा। क्या इस वेदना से कि मै उसके कथन की उपेक्षा करके सीता को खो बैठा, उसने अपने प्राणो का अन्त कर दिया है ?
इस घने अ्रधकार में, मुझसे वियुक्त उस प्यारे लक्ष्मण के अतिरिक्त, मेरे और नेत्र नही है ? (अर्थात्, लक्ष्मण ही मेरे नेत्र हैं, जिसके बिना मै अंधा-सा हूँ)। पहले ही घायल हुए मेरे हृदय में अब एक नई पीडा उत्पन्न हुई है। मैं कुछ भी सोच नही पा रहा हूँ। अब मै कैसे उसका अन्वेषण करूँ ?
मेरे दुर्भाग्य को बदलने का कुछ उपाय नहीं है। अब मेरे प्राण-सदृश तुम भी
अरण्यकाण्ड ४१७
अदृश्य हो गये । हे तात ! मुझे इस प्रकार छोड़कर तुमने भूल की । यह तुम्हारा कार्य कठोर है । गुरुजन तुम्हारे इस कार्य को नही सराहेगे ।
आई हुई विपदाओं को दूर करने मे समर्थ हे वीर ! तुमने मुझे अवार्य दुःख दिया । शत्रुओं से भी प्रशंसित होनेवाले हे वीर ! क्या मुझसे घृणा करते हुए मुझे इस अरण्य में पीडित होने के लिए छोड़कर चले गये हो ? इतनी देर तक मुझसे वियुक्त होकर कही रह जाना, क्या तुम्हारे लिए उचित है ?
मै अपने पिता से वियुक्त हुआ। अपनी माता से वियुक्त हुआ। लक्ष्मी-समान, स्वर्णाभरण-भूषित सीता से वियुक्त हुआ। फिर, मै जो जीवित रहा, वह तुम, एक के वियुक्त न होने से ही तो था ?
(हरिण के पीछे मेरे जाने पर) मुझे ढूँढ़ते हुए तुम हाथी के समान चले आये थे । अब तुम अदृश्य होकर, स्वर्णमय कर्णाभरणों से भूषित सीता को ढूँढनेवाले मुझ दीन को, अपने भी ढूँढ़ने के लिए दुःखी बनाकर छोड़ गये हो ।
कौन बतानेवाला है कि तुम कहाँ हो ? (तुम्हारे न मिलने पर) मै आज प्राण-त्याग किये बिना नही रहूँगा। यदि मै मरूँगा, तो मेरे स्वजनों में से भी कोई जीवित नही रहेगा । अतः, हे कठोरहृदय ! तुम, एक साथ सब स्वजनों को मारनेवाले हो गये हो । यह क्या तुम्हारे लिए उचित है ?
मान्धाता आदि हमारे पूर्वजी के आचार के अनुसार राजा बनना छोड़कर मैने अरण्य-वास करने का साहस किया । उस समय सच्चा बन्धु बनकर जब दूसरा कोई नही आया, तब तुम्ही मुझ एकाकी के साथी बनकर आये । अब तुम भी मुझे छोड़कर चले गये हो ?
इस प्रकार कहते हुए मेरे अनुपम प्रभु रामचन्द्र उठते, गिरते, स्तब्ध होते, प्रज्ञाहीन होते, फिर कहते—हाय ! इस घने अँधेरे में न बिजली है, न गर्जन । फिर भी, यह क्या विपदा आ पड़ी है ? (अर्थात्, भावी विपदा की पूर्व सूचना कुछ नहीं हुई और यह अकस्मात् क्या हुआ ?) रामचन्द्र की वह दुःखपूर्ण दशा एक-जैसी नही थी ।
युद्ध के उन्माद से पूर्ण मत्तगज की समता करनेवाले वे (राम), अनेक स्थानों में जाकर (लक्ष्मण को) ढूँढते । शीघ्र गति से जाते । (लक्ष्मण का) नाम लेकर पुकारते । व्याकुलप्राण और मूर्च्छित होते ।
क्षमाशील (सीता) देवी के साथ मेरे प्राणों की भी रक्षा करते हुए अपलक रहनेवाला लक्ष्मण, क्या लौट आने मे इतना विलंब करता ? धरती का भार बनकर दुर्भाग्य के साथ संचरण करनेवाले मुझ पापी का जीवित रहना अनुचित है ।
फिर यह कहकर कि, 'यदि मेरे द्वारा किया गया कोई सुकृत हो और उस (लक्ष्मण) का ज्येष्ठ होकर उत्पन्न होने की कुछ योग्यता मुझमें हो, तो मै वैसे ही पुनर्जन्म पाऊँ'—रामचन्द्र अपना तीक्ष्ण करवाल कर में लेकर अपने प्राणों का अन्त करने को उद्यत हुए, इतने में—
उधर लक्ष्मण राक्षसी की माया से मुक्त हुआ और उस (राक्षसी) की नासिका
४१८ कंब रामायण
आदि अगो को काट दिया। तब उस राक्षसी ने बड़ी व्यथा से जो चीख मचाई, वह ध्वनि राम के कानों मे आ गिरी, तो उमसे राम किंचित् स्वस्थ-से हुए।
फिर, राम ने सोचा—प्रस्तरमय अरण्य में अनेक वीर-ककणो से मुखरित युद्ध करनेवाले राक्षसों की विरोध-सूचक ध्वनि यह नहीं है। यह तो विपदा में पड़ी हुई एक स्त्री की ही ध्वनि है और वह कोई राक्षसी ही है।
उस समय, नीलवर्ण राम ने आग्नेय अस्त्र को अपने अरुण कर में लेकर उसे प्रयुक्त करने का उपक्रम किया। तब वहाँ का अंधकार हटकर भूलोक के दूसरे कोने में जाकर इकट्ठा हो गया और उस स्थान में रात्रिकाल दिन के समान भासमान हो उठा।
रामचन्द्र बड़े-बड़े पर्वतों को चूर करते हुए, ऊँचे वृक्षो को तोड़ते हुए, भूमि को अपने पदचाप से पीडित करते हुए और अपने दोनों पाश्र्वों में चड़चड़ाहट की ध्वनि उत्पन्न करते हुए चंडमारुत से भी तिगुने वेग के साथ (उस राक्षसी को निहत करने के लिए) बढ चले।
प्रलयकाल में जिस प्रकार काला समुद्र धरती पर उमड आये, उस प्रकार का दृश्य उपस्थित करते हुए आनेवाले, अपने सहायक ज्येष्ठ भ्राता को लक्ष्मण ने देखा और कहा—'हे उदार! चिंता न करें, चिंता न करें।'
'यह दास आ गया। आप मन में व्याकुल न हो।'—यो कहते हुए लक्ष्मण रामचन्द्र के कोमल पल्लव-जैसे चरणों पर नत हुआ। रामचन्द्र ने मानों अपनी खोई आँखें पुनः प्राप्त कीं।
उन रामचन्द्र की दशा, जिनकी आँखों से झरने के समान अश्रु बह रहे थे, उस गाय की-सी हो गई, जो अपना बछड़ा खो जाने से, उसे खोजने का मार्ग भी न देखती हुई व्याकुल रहती हो और स्वय ही उस बछड़े के आ जाने पर अपने थन से दूध बहाती हुई खड़ी हो।
उस समय, राम ने लक्ष्मण का पुनः-पुनः आलिंगन किया और अपनी अश्रुधारा से उसके स्वर्ण-जैसे शरीर को धो डाला। फिर कहा—हे लोहे के स्तंभ-जैसे कधोवाले। यह सोचकर कि तुम कहो खो गये हो, अबतक मै अत्यत दुःखी हो रहा था।
'क्या घटित हुआ? मुझे बताओ।'—राम के यों पूछने पर लक्ष्मण ने सारा वृत्तांत कह सुनाया। तब उन प्रभु ने, जिनसे बड़ी अन्य कोई सत्ता नहीं है, आनंद और व्यथा दोनों को एक साथ ही प्राप्त किया।
फिर, राम ने लक्ष्मण से कहा—जो विशाल समुद्र के मध्य फँसा हो, क्या प्रत्येक लहर के आते समय उसका भयभीत होना उचित है? उसी प्रकार दुर्दैव के प्रभाव से जन्म-रूपी बंधन में पड़े हुए हमें, दुःखद विपदा के प्राप्त होने पर शिथिल नही होना चाहिए।
तीन देव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश), तीन लोको के निवासी—सब मेरे शत्रु बनकर आवें, तो भी मुझे कौन जीत सकेगा? भाई! तुम मेरे साथ हो—यह एक बात ही मुझे बल देता है। इससे बढकर मुझे और कोई रक्षा नहीं चाहिए। (अर्थात्, अन्य कोई सेना आवश्यक नहीं है।)
अरण्यकाण्ड ४१६
मुझसे जो वियुक्त होते हो, होवें । जितनी भी आपदाएँ आती हो, आये । किंतु दीर्घ वीर-कंकण धारण करनेवाले हे वीर ! वे सारी आपदाएँ तुम्हीं से दूर होनेवाली हैं । मेरे निकट रहकर वे ( विपदाएँ ) मुझे सता नहीं सकती ।
भयंकर युद्ध करने में निपुण वीर । तुमने कहा कि युद्धकुशल राक्षसी को परास्त कर लौटे हो । क्षुद्र स्वभाववाली उस राक्षसी के वचनों से उत्तेजित होकर उसे तुमने मार तो नही डाला ? बताओ ।
तब लक्ष्मण ने कहा—'मैने उस राक्षसी की नाक, कान और बंधन मे स्थित स्तनों को काट दिया । उस समय वह चीख उठी ।' यह कहकर ( लक्ष्मण ) हाथ जोड़कर खड़े रहे ।
आनंद से प्रफुल्ल होकर राम ने कहा—अँधेरे मे तुम्हें मारने के लिए आई हुई राक्षसी को भी तुमने नही मारा । किन्तु, उसका अंग-भंग मात्र किया । तुम चतुर हो । मनु प्रभृति राजाओं के इस वंश के अनुकूल ही तुमने आचरण किया है और अपने भाई को गले लगा लिया ।
वीर ( राम ) और लक्ष्मण—जैसे अपार दुःख से मुक्त हुए । वारुण अस्त्र को प्रयुक्त करके गगन मे वर्षा उत्पन्न की और उसका जल पीकर प्रभात काल की प्रतीक्षा करते हुए एक पर्वत पर विश्राम करते रहे ।
पत्थरो से भरी धरती पर, अरण्य के पल्लवों और पुष्पो को लेकर लक्ष्मण के-द्वारा बनाई गई शय्या पर, बड़ी वेदना भोगते हुए रामचन्द्र ने शयन किया । लक्ष्मण उनके कोमल चरणों को सहलाते रहे ।
राम ने कलापी-तुल्य सीता से वियुक्त हो जाने के पश्चात् अपमान की पीडा से कुछ आहार नही किया था । शोक की अधिकता से निद्रा भी नही की थी । उनके ऐसे दुःख का वर्णन हम कैसे कर सकते हैं ? उनके निःश्वासो के मध्य उनके प्राण झूलते रहे ।
राम, विरह की पीडा से बोल उठे—मेरी आँखों को अरण्य में सर्वत्र सीता का रूप ही दिखाई पड़ता है । यह क्या इसलिए कि मै उसके रूप को नही भूल सका हूँ, या नही तो क्या यह भी राक्षसों की माया है ?
काले केशोंवाली, अरुण रेखावाले नेत्रो से युक्त तथा पतिव्रता नारियो के आभरण-सदृश उस ( सीता ) को मैं अपने पार्श्व में देखता हूँ । किन्तु, उसका आलिंगन करने के लिए उद्यत होने पर उसका स्पर्श नही पाता हूँ । क्या उसकी कटि के समान ही उसका आकार भी थोड़ा-थोड़ा करके क्षीण होता हुआ अदृश्य हो गया है ।
( पहले मुझे ऐसे लगा जैसे ) मैने उसके सद्योविकसित कमल ( समान मुख ) के मधुपूर्ण बिंब तथा प्रवाल के समान अधर के अमृत का पान किया । किन्तु, वह मेरे पार्श्व में नही थी । क्या पलक न लगने पर भी स्वप्न दिखाई पड़ते हैं ?
यदि यह रात्रि मुझे ऐसा दुःख दे, जो पृथ्वी, गगन आदि पञ्चभूतो एव मन के विचार से भी बड़ा हो, तो क्या यह ( रात्रि ) शीतल, सुगध तथा नीलवर्ण से युक्त कुतलों-वाली सीता की आँखों से भी बड़ी होगी ?
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जल तथा उसमें संचरण करनेवाले मीनों से युक्त समुद्र से मनोहर चन्द्र के नाम से जो प्रलयाग्नि उत्पन्न हुई है, उसकी उष्ण किरणों के स्पर्श से उन्नत आकाश के शरीर-भर में फफोले-से पड़ गये हैं (अर्थात्, नक्षत्र आकाश के फफोले कहे गये हैं।)
चक्रवर्त्ती राम इस प्रकार के अनेक वचन कहकर व्याकुल हो रहे थे। उसी समय अरुण किरणोंवाला-सूर्य इस प्रकार उदित हुआ, जैसे उन (राम) की दुःखमय दशा को देखकर स्वयं दुःखी होकर सहानुभूति दिखा रहा हो। (१-१०१)
अध्याय ११
कबन्ध पटल
वे (राम-लक्ष्मण), प्रभात के समय उस कलापी-तुल्य रूपवती, पतिव्रता (सीता) देवी का, जिसकी क्षमा की तुलना में पृथ्वी का क्षमा-गुण भी निस्सार-सा लगता था, अन्वेषण करते हुए गये। पक्षी इस प्रकार शब्द कर रहे थे, मानों वे उनके दुःख को देखकर रो रहे हों।
वे दोनों धनुर्धर वीर, पचास योजन-पर्यंत अरण्य को पार करके गये और कबंध नामक उस राक्षस के वन में जा पहुँचे, जो एक ही स्थान पर पड़ा रहता था और अपनी दीर्घ बाँहों को दूर तक फैलाकर सब प्राणियों को हाथों से उठाकर अपने पेट में भर लेता था। इतने में सूर्य भी आकाश के मध्य आ पहुँचा।
(उस राक्षस के हाथों में पड़नेवाले) हाथी से चींटी तक, सब प्राणी मिट जाते थे। उसको देखने मात्र से अत्यंत भय से काँपने लगते थे। उसके चंगुल में आकर फिर उस बंधन से वे कभी छूट नहीं पाते थे।
कबंध के निकट सब प्राणी इस प्रकार काँपते रहते थे, जिस प्रकार, कुल-परंपरा से आगत नीतिमार्ग को छोड़नेवाले, शासन की दक्षता से रहित, शक्तिहीन राजा के राज्य में रहनेवाले प्राणी हों। वे बिखर जाते, एक साथ सम्मिलित होते, पीडित होकर भागते और स्तब्ध हो खड़े रहते।
बड़े-बड़े पर्वत भी कबंध के हाथों में लुढ़कते हुए चले आते। बड़े-बड़े वृक्ष भी जड़ से उखड़-उखड़कर निकल आते। अरण्य की नदियाँ उमड़कर ऊँचे स्थानों एवं सब दिशाओ में फैल जातीं। जल-भरे मेघ भी नीचे आ गिरते। यह सारा दृश्य उन वीरों ने देखा।
जिस प्रकार सारी सृष्टि के विनाश का कारणभूत प्रलय-काल जब आता है, तब प्रभंजन का थपेड़ा खाकर चतुर्दिक् से समुद्र उमड़ उठता है और गर्जन करता हुआ सारी पृथ्वी को ढक देता है, उसी प्रकार सबको चारों ओर से घेरकर आनेवाली (कबंध की) उन बाँहों में वे (राम-लक्ष्मण) भी फँस गये।
श्रीराघवयादवार्डे ४२१
मानो चक्रवाल पर्वत ही सिमटकर आ रहा हो, इस प्रकार आनेवाली उन प्राचीर-जैसी बाँहो में फँसकर वे दोनों वीर, यह सोचकर प्रसन्न हुए कि मधु-जैसी मीठी बोलीवाली सीता की रक्षा के उद्देश्य से रावण की सेना ही आकर उन्हे घेर रही है (और उस सेना को मिटा देने का सुअवसर हमे प्राप्त हुआ है)।
राम ने अपने अनुज को देखकर कहा—हे तात ! ऐसा लगता है कि सीता का हरण करनेवाला रावण यही पर निवास करता है। अब हमारा दुःख मिटनेवाला है।
तब लक्ष्मण ने (राम को) प्रणाम करके उत्तर दिया—यह राक्षस-सेना होती, तो क्या नगाड़े बजने की ध्वनि और शंखनाद नहीं सुनाई देते ? यह राक्षस-सेना नहीं है और कुछ है। फिर, लक्ष्मण भी सोचने लगे (कि यह क्या है ?)।
फिर, लक्ष्मण ने (राम से) कहा—प्रलयकाल में भी अमर रहनेवाले हे प्रभु ! यह कदाचित् वह सर्प ही है, जिससे देवो ने मंदर-पर्वत को लपेटकर क्षीर-सागर को मथा था, अथवा यह कोई दूसरा सर्प है। यह (सर्प) अपने मुँह से अपनी पूँछ को जोड़कर घेरा बनाकर हमें बाँध रहा है।
आगे-आगे चलनेवाले (राम) ने लक्ष्मण के इन वचनों को सुनकर सोचा कि उसका कथन ठीक ही है। फिर (उस घेरे मे) दो योजन दूर जाने पर वे दोनो उस पर्वताकार राक्षस के सम्मुख आ खड़े हुए।
वह राक्षस अपनी आँखो के साथ ऐसा दृश्य उपस्थित करता था, जैसे उष्ण किरणवाले दो सूर्यों से युक्त मेरुपर्वत हो। उसके पेट मे ही उसका मुँह था, जिसमे दाँत ऐसे थे कि उनके मध्य दो-दो 'खात' (दस मील का एक खात होता था) की दूरी थी और (वह मुँह) मकर-मीनों से पूर्ण समुद्र के समान था।
उसकी बाँहें इस प्रकार पड़ी थी, जैसे देवो के द्वारा मदर-रूपी दिव्य मथानी को (क्षीरसमुद्र में) डालकर उसपर लपेटा गया वासुकि सर्प दोनों ओर से खींचा जाकर फैला हुआ पड़ा हो।
उसकी नासिका से इस प्रकार अग्नि और धूमलता निकल रही थी, जैसे लुहार की भाथी हो। उसके सामने उसकी जिह्वा इस प्रकार निकली हुई थी, जैसे विशाल समुद्र को एक ही दशा में रखनेवाली वडवाग्नि की ज्वाला हो।
उसके मुँह के दोनो खड्ग-दंत इस प्रकार लगते थे, मानो पूर्णचन्द्र, (राहु नामक) सर्प को अपनी ओर आते हुए देखकर भय से एक सुरक्षित स्थान को खोजता हुआ आया हो और निर्झरों से पूर्ण महान् पर्वत की कंदरा के भीतर, दो खंड होकर, घुस रहा हो।
उसका शरीर शीतल जल, प्रभृति प्रसिद्ध पञ्चभूतो से नही बना था, किंतु शास्त्रों मे बताये गये पञ्चमहापाप ही एकत्र होकर उस आकार मे आ गये थे।
उसके कर्ण-कुहर ऐसे थे, जैसे उष्ण तथा शीतल किरणवाले ज्योतिष्पिंडों (अर्थात्, सूर्य-चन्द्रो) को निगलनेवाले सर्पों (राहु-केतु) के, कुछ कार्य न रहने पर, विश्राम करने के लिए योग्य बिल हो। उसका उदर उस नरक का भी उपहास करनेवाला था, जिसमें असत्य भाषण आदि पाप कर्म करनेवाले नीच गुणवाले पापी रहते हैं।
४२२ | कंब रामायण
वह (कबंध) अपने करों से सब प्राणियों को उठाकर अपने विशाल नाव-जैसे उदर में भर लेता था, जिससे उसका मुँह यम-पुरी के विजयशील द्वार के समान था।
वह समुद्र के समान बड़ा कोलाहल कर रहा था। उसका शरीर हलाहल विष के समान काला और उष्ण था। उसका आकार, विष्णु के चक्र के द्वारा शिर के कट जाने पर पड़े हुए कालनेमि (नामक राक्षस) के कबंध (धड़) के समान था।
वह ऐसा लगता था, जैसे मेरु पर्वत प्रभंजन के झोंके खाने से शिखरों के टूट जाने पर, शिखरहीन हो पड़ा हो। इस प्रकार के कबंध को सूक्ष्म ज्ञानवाले उन दोनों वीरों ने देखा।
उन्होंने उसके उस फटे मुँह को देखा, जिसमें चक्रवाल पर्वतों की सीमा से घिरी हुई सारी पृथ्वी समस्त समुद्रों-सहित गुम सकती थी और उन्होंने सोचा कि यह राक्षसों-जैसे किसी प्राचीरावृत्त नगर का द्वार है, जिसके भीतर देवता लोग भी प्रवेश नहीं कर सकते।
उस समय, अनुज (लक्ष्मण) ने, (कबंध को) भली भाँति देखकर कहा—हे धनुर्विद्या में निपुण! यह कोई बड़ा भूत है। यह सब प्राणियों को अपने हाथों से घेरकर अपने मुँह में डालता है। हमको भी उन प्राणियों के साथ मिलाकर खा जायगा। अब हम क्या करें! तब राम ने उत्तर दिया—
हे धरती को उठानेवाले आदिवराह जैसे बलवाले! हाँ, यह कोई भूत ही है; क्योंकि वह देखो, इसका शरीर इस प्रकार फैला है कि यह विशाल धरती भी इसके लिए पर्याप्त नहीं मालूम होती। इसके दायें और बायें दीर्घ बाँहें फैली हैं।
हे भाई! कलापी-तुल्य सीता वियुक्त हुई। पितृ-तुल्य जटायु मर गये। अपयश से पीडित चित्त के साथ मैं जीवित रहना नहीं चाहता हूँ। अतः, मैं इस (भूत) का भोजन बन जाऊँगा। तुम यहाँ से बचकर चले जाओ।
मुझे जन्म देनेवालों को दुःखी बनाते हुए, अपने भाई को दुःखी करते हुए, गुरुजनों के दुःखी होते हुए, सब अपयश का आश्रम बनकर, मैं उत्पन्न हुआ हूँ। अब मैं अपने प्राण छोड़े बिना इस अपयश को मिटा नहीं सकता।
क्या मैं मिथिला के राजा के पास पर्वत-जैसे दृढ़ तूणीर तथा धनुष को लेकर यह कहता हुआ जा सकूँगा कि गृहस्थाश्रम के योग्य आपके द्वारा प्रदत्त, मधुरभाषिणी पुष्प-लता-समान सीता राक्षसों के घर में रहती है।
'विकसित पुष्पों से भूषित सीता की रक्षा करने के सामर्थ्य से हीन होकर, मैं, अपने अनुज की रक्षा पाकर ही जीवित हूँ'—ऐसी बात सुनने की अपेक्षा यह वचन अच्छा होगा कि 'मैं परलोक में रहता हूँ।' अतः, अब इस जीवन को त्याग देना ही उचित है।
हमारी (लेखक की) दासता को स्वीकार करनेवाले राम ने जब ये बातें कहीं, तब अनुज ने कहा—मैं आपके पीछे-पीछे इस कानन में आया। मेरे आने पर भी ऐसी विपदा आपको प्राप्त हुई है। किन्तु, यदि आपके पूर्व ही मैं अपने प्राण न त्यागकर अपने प्यारे प्राण लेकर लौट जाऊँ, तो मेरी सेवा क्या बहुत भली होगी?
अरण्यकाण्ड | ४२३
फिर, लक्ष्मण ने कहा—दुःख को जीतनेवाले ही तो धीर होते हैं। यदि अपने पिता, माता, ज्येष्ठ भ्राता आदि गुरुजनों से पहले ही ( उन गुरुजनो की रक्षा मे ) कोई अपने प्राण न त्याग करे, तो उसका जीवन अपयश का ही तो भाजन होगा ?
‘हरिणी-तुल्य पत्नी के साथ ज्येष्ठ भ्राता अरण्य में निवास करने गया, तो उसका अनुज, निद्राहीन रहकर उनकी रखवाली करता रहा’—इस प्रकार मेरी प्रशंसा जो लोग करते थे, उनके द्वारा, ‘उस ज्येष्ठ भ्राता तथा उस भ्राता की पत्नी से अलग होकर आ गया,’—इस प्रकार का अपयश पाना कितना बड़ा पाप होगा ?
मेरी माता ( सुमित्रा ) ने मुझसे कहा था—‘तुम अपने ज्येष्ठ भ्राता की सब आज्ञाओं का पालन करते रहना । किसी भी विपदा को सहने के लिए तैयार रहना । यदि महान् यशस्वी राम का कभी विनाश होने की संभावना हो, तो उनसे पहले तुम अपने प्राण त्यागना ।’ मै यदि अपनी माता के वचन पर स्थिर न रहूँगा, तो मेरा सत्य कैसे टिकेगा ?
हे सुन्दर स्वर्ण-आभरणों से भूषित कंधोवाले ! ‘मेरी जननी तथा मैं आपकी जननी तथा आपके मन के अनुकूल और सब सजनो के लिए प्रिय, व्यवहार करते रहते हैं’—ऐसी प्रशंसा के पात्र हम बनना चाहते है । इसके विपरीत अपने प्राणों को बचाये रखने की इच्छा करके हम अपने कर्त्तव्य का त्याग नहीं करेंगे ।
उस प्रलय-काल में भी जब सारी सृष्टि मिट जाती है, जब शाश्वत वेदो के द्वारा प्रशंसित देवता भी मिट जाते हैं, तब भी आपका अन्त नही होता । ऐसे आप, हाथी आदि प्राणियो को खाकर इस वन में रहनेवाले भूत के द्वारा मारे जाकर मिट जायें, क्या यह भी संभव है ?
सुननेवाले इस बात को न मानेंगे । देखनेवाले इसे नही चाहेंगे । ‘पुष्पमाला-भूषित कुंतलोवाली सीता को दुःख में न रखा, किन्तु ( राक्षसो के साथ ) युद्ध करके ( उस सीता को ) मुक्त किया’—इस प्रकार का महान् यश न पाकर, ‘युद्ध मे ( राक्षसो को ) नही जीत सका और ऐसे ही मर गया’—ऐसी निंदा पाना क्या उचित है ? ऐसी निंदा से बढ़कर और क्या अपयश हो सकता है ?
विष के समान क्रूर इस भूत की गणना ही क्या है ? यह बात नही है कि इस करवाल के आघात से इसके प्राण नही निकलेंगे । देखिए, मै किस प्रकार, हमें घेरनेवाले इसके हाथो को और इसके बिल-जैसे मुँह को काट देता हूँ । आप चिन्ता छोड़िए ।’—यों लक्ष्मण ने कहा ।
इस प्रकार के वचन कहकर लक्ष्मण स्वयं प्रभु से आगे बढ़ने लगे । तब राम लक्ष्मण से आगे जाने लगे । इस समय लक्ष्मण ने राम को रोका । यह देखकर हाय ! स्वयं देवता भी रो पडे, फिर अन्यो के सबंध में क्या कहा जाय ।
इस प्रकार, वे दोनो वीर-कंकणधारी वीरमुख के दो नेत्रो के समान चलकर कबंध के निकट पहुँचे । तब कबंध ने उनसे प्रश्न किया, ‘कर्म के परिणामस्वरूप यहाँ आये हुए तुम दोनो कौन हो ?’ यह सुनकर वे दोनो बडे क्रोध के साथ उसके सामने अपलक खडे रहे ।
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कंब रामायण
कबंध यह देखकर कि उसके प्रश्न से वे (राम-लक्ष्मण) डरे नही, किन्तु उसकी अवहेलना करते हुए खड़े हैं, अत्यधिक क्रोध से भर गया। उसके रोम-रोम से चिनगारी निकलने लगी। वह उन्हे निगलने की इच्छा से बढ़ा। तब उसके गगनोन्नत कंधो को उन्होने अपने करवाल से काट दिया।
उसकी दोनो बाँहो के कट जाने से उसकी देह से रक्त की धारा नीचे की ओर बहने लगी। तब वह एक ऐसे पर्वत की समता करने लगा, जिसके दोनो ओर पत्थरी से भरे सानु होते हैं।
प्रभु के कर का स्पर्श होने से उस (कबध) का वह शापमय रूप भी मिट गया। उसका पाप मिट गया। कटे हाथोवाले घोर आकार को छोड़कर वह गगन में इस प्रकार जाकर प्रकाशमान हुआ, जैसे कोई पक्षी अपने पिंजरे से आकाश में उड़ चला हो।
गगन में खड़े होकर उसने सोचा कि यह राम ही ब्रह्मा प्रभृति सब देवों के ध्यान से प्रत्यक्ष होनेवाले हैं, और उनके गुणो का गान करने लगा। जब पुण्य-फल अनुकूल होता है, तब कौन-सा पदार्थ दुर्लभ हो सकता है ?
कबंध ने राम से कहा—हे प्रभु ! मुझ, पापी के शाप को तुमने दूर किया। क्या तुम्ही सारी सृष्टि के निर्माता हो ? तुम्हीं अविनेश्वर धर्म के साक्षीभूत हो ? तुम्हीं देवो की पूर्वकृत तपस्या के फल के साकार रूप हो ? क्या तुम्हीं वह परमतत्त्व हो, जो तीन मूर्त्तियो में विभक्त हुआ है ?
हे कारण-रहित आदिपरब्रह्म ! तुम्हारे अवतार के तत्त्व को कोई भी नही पहचान सकता। क्या तुम वह वटवृक्ष हो, जो प्रलय-काल में उत्पन्न होता है। या, क्या उस वृक्ष का पत्ता हो ? या उस वट-पत्र में शयन करनेवाले बालक हो। या सृष्टि के आदिकारणभूत परमपुरुष हो ? कहो, तुम कौन हो ?
संसार मे जो देखनेवाले जीव हैं और जो देखे जानेवाले पदार्थ हैं, तुम उन सबकी दृष्टि हो। तुम सब पदार्थों में सलग्न रहते हो, किन्तु तुम्हे सुख-दुःख से कुछ सम्बन्ध नही रहता। अपने दिव्य प्रभाव से तुम सब लोकों को अपने उदर में समा लेते हो और फिर उन्हे प्रकट कर देते हो। क्या तुम पुरुष हो ? स्त्री हो ? अथवा उन दोनों से परे हो (अर्थात्, उभय से पृथक् हो) ? अथवा और कोई हो ?
सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा तुम्ही हो। उस ब्रह्मा का कारणभूत परमपुरुष (विष्णु) तुम्ही हो। उस परमपुरुष का भी कोई कारणभूत तत्त्व हो, तो वह भी तुम्ही हो। प्रसिद्ध वेद तुमको परम ज्योति कहते हैं। तो क्या अन्य देवता लोग उससे लज्जित नही होते (अर्थात्, अन्य देवो को परम ज्योति कहना उचित नही है) ?
अष्ट दिशारूपी प्राकार से युक्त, चौदह मजिलो के इस ब्रह्मांड-रूपी महान् मंदिर को सर्वत्र प्रकाशित करनेवाले तीनो ज्योतिर्मंडलों (अर्थात्, चंद्र-मंडल, सूर्य-मंडल और नक्षत्र-मंडल) के ऊपर स्थित परमपद में कभी प्रफुल्ल न होनेवाले कमल-कोरक के भीतर रहनेवाला बीज ही तुम्हारा आवास है।
हे परमेष्ठिन् (अर्थात्, परमपद के स्थान में निवास करनेवाले)! अनंत अष्ट
श्रीअरण्यकाण्ड ४२५
दिशाओ में स्थित भूदेवो ( ब्राह्मणो ) के द्वारा किये जानेवाले उत्तम यज्ञो मे हविर्भाग का भोजन करनेवाले तुम्ही हो । वह भोजन देनेवाला ( अर्थात्, यज्ञकर्त्ता ) भी तुम्ही हो । तुम्हारे इन दो रूपो में रहने के तत्त्व को कौन जान सकता है ?
हे परात्पर ! जिस प्रकार स्थिर जलाशय में बुद्बुद उत्पन्न होकर मिटते रहते हैं, उसी प्रकार अनेक अंड तुमसे एक समान निकलते हैं और ( प्रलय-काल में ) तुममें विलीन हो जाते हैं। इस तत्त्व को कौन ठीक-ठीक समझ सकता है ?
क्या तुम्हारी लीलाओ को देखकर ही वेद प्रकाशित किये गये हैं ? या वेदो मे प्रतिपादित ढंग से तुम्ही अपने कार्य करते रहते हो ? तुमने मुझे ऐसा फल दिया है, जिसे पापकर्म करनेवाले लोग कभी प्राप्त नहीं कर सकते । न जाने, पूर्वजन्म में मैने क्या पुण्य किये थे ( जिससे यह भाग्य मुझे अब प्राप्त हुआ है ) ?
प्रेत के समान मेरे पापो के आश्रयभूत राक्षस-जन्म के दोषो को मिटाकर तुमने मुझे निर्दोष दिव्य जन्म प्रदान किया । मुझे दुःख-समुद्र के पार लगाया और तुम्हारे प्रति अज्ञान-जन्य मेरे विरोध को मिटा दिया । हे मेरे प्रभु ! श्वान-सदृश रहनेवाला मैने, न जाने कौन-सा बड़ा सुकृत किया था ?
इस प्रकार के मधुर वचन कहकर कबंध यह सोचकर कि यदि मै सारे भविष्य को स्पष्ट रूप से कह दूँ, तो वह देवताओ की इच्छा के अनुकूल नहीं होगा, माँ को देखकर प्रसन्न होनेवाले गाय के बछड़े के जैसे चुपचाप खड़ा रहा । तब धर्मनिष्ठ लोग जिनका साक्षात्कार प्राप्त करते हैं, उन प्रभु ( राम ) ने उसकी ओर देखा ।
फिर, राम ने अपने अनुज से पूछा—हे भाई ! यह अत्युज्ज्वल दुर्लभ देह धारण कर खड़ा रहनेवाला क्या वही है, जो अभी हमारे हाथों मरा था ? या नही तो, यह कोई दूसरा प्रभावशाली व्यक्ति है ? तुम इसे भली भाँति देखो । तब लक्ष्मण ने उस ( कबंध ) से प्रश्न किया कि तुम कौन हो ?
तब कवंध ने कहा—मनोहर आभरणो तथा पुष्पमालाओ से भूषित हे वीर ! मै दनु नामक एक गंधर्व हूँ । शाप के कारण मुझे यह राक्षस-जन्म मिला था । तुम दोनो के कर-कमल का स्पर्श पाकर मै अपने पूर्वरूप को प्राप्त कर सका । तुम मेरे पितामह-तुल्य¹ हो । मेरे वचन सुनो—
तुम दोनों शर-प्रयोग के लिए उपयुक्त धनुष को धारण करनेवाले हो । यद्यपि तुम्हारी सहायता करनेवाला कोई नही है, तथापि सीता का अन्वेषण करने के लिए तथा अन्य आवश्यक कार्य करने के लिए किसी सहायक का होना उत्तम होगा । जिस प्रकार बिना नाव के समुद्र को पार करना कठिन है, उसी प्रकार बिना सहायक के शत्रु-पक्ष का विनाश करना भी कठिन है ।
दोषरहित शिव के प्रताप के बारे में क्या कहें ? वह देव, पद्म में उत्पन्न ब्रह्मा के द्वारा बनाई हुई सारी सृष्टि का विनाश करनेवाला है, किन्तु वे भी अवार्य बलशाली भूतों को अपने साथी बनाकर रखते हैं । यह तुम जानते ही हो ।
१. कवंध के दुःख को दूर करने के कारण वह राम-लक्ष्मण को अपने पितामह-तुल्य समझता है । —अनु०
| ४२६ | कंब रामायणं |
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कर्त्तव्य कार्य क्या है ?—इसका भली भाँति विचार करना चाहिए। धर्म क्या है ?—इसका विचार रखना चाहिए। दुर्जनों को साथी न बनाकर सज्जनों को ही सहायक बनाना चाहिए। अतः, तुम दोनों उस शबरी के पास जाओ, जो सब प्राणियों के लिए माता के तुल्य है। उसके कथन के अनुसार चलकर ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचो।
वहाँ रहनेवाले सूर्य-पुत्र, स्वर्ण की कांतिवाले सुग्रीव से मित्रता कर लेना। उसकी सहायता से, दीर्घ बाँस-जैसे कंधोंवाली (सीता) का अन्वेषण करना उचित होगा। इस प्रकार कबन्ध ने कहा। शब्दायमान वीर-वलयधारी वीर (राम-लक्ष्मण) वैसे ही करने को सहमत हुए।
फिर, कबन्ध ने उन्हें प्रणाम किया और उनकी 'जय' बोलकर गगन-मार्ग से उड़कर चला गया। मनुवंश के उत्तम कुमार वे (राम-लक्ष्मण) भी दक्षिण दिशा में चलकर पर्वतों और अरण्यों को पार करते हुए गये। जब रात्रि का समय आया, तब मतंगमुनि के आश्रम में जा पहुँचे। (१-५८)
अध्याय १२
शबरी-मुक्ति पटल
सब अभीष्टों को प्रदान करनेवाले कल्पवृक्षों के सदृश दिव्य वृक्षों से परिपूर्ण सुगंधित वह (मतंगाश्रम का) उपवन उस स्वर्गलोक के समान था, जहाँ स्पृहणीय सुख ही रहते हैं, कोई दुःख नहीं रहता है, और जहाँ पुण्यकर्म करनेवाले लोग ही जाते हैं।
वे राम, जिनके मूलभूत कोई पदार्थ नहीं है, उस आश्रम में पहुँचे, जहाँ उन (राम) का ही ध्यान करती हुई तपस्या करनेवाली शबरी रहती थी। निकट पहुँचकर उन्होंने उससे प्रश्न किया—'सुख से रहती हो न ?'
उस समय, उस (शबरी) ने बड़ी भक्ति से उन (राम) की प्रस्तुति की। अपनी आँखों से अश्रु की धारा बहाते हुए कहा—'मेरा मायामय सांसारिक बंधन अब टूटा। चिरकाल से मैं जो तपस्या करती रही, उसका फल अब प्राप्त हुआ। मेरा जन्म (संकट) मिटा।' यह कहकर फिर उसने बड़े प्रेम से एकत्र कर रखे हुए फल-कंद आदि लाकर उन (राम-लक्ष्मण) को भोजन कराया। तब—
शबरी ने राम से कहा—'हे प्रभु ! शिव, कमलभव (ब्रह्मा), इंद्रादि देवता आनन्द के साथ यहाँ आये और मुझसे यह कहकर गये कि तुम्हारी पवित्र तपस्या की सिद्धि का काल आ गया है। और कुछ दिन यहीं रहो। जब रामचंद्र यहाँ आयेंगे, तब उनका सत्कार करके उसके पश्चात् हमारे लोको में आना।
हे मेरे प्रभु ! तुम यहाँ आनेवाले हो—यह समाचार पाकर मैं तुम्हारे दर्शन की
श्रीरंगार्यकाण्डं ४२७
अभिलाषा से यहीं रहती हूँ। आज ही मेरा सुकृत सफल हुआ है। इस प्रकार, शबरी ने कहा। तब उस महातपस्विनी को प्रेम से देखकर राम ने कहा—'हे माता ! हमारे मार्ग-गमन के श्रम को तुमने दूर किया। तुम्हारा श्रेय हो।'
राम तथा उनके अनुज उस दिन वहीं रहे। सब पापनाशक तपस्या करनेवाली (शबरी) ने उन्हें सच्चे प्रेम के साथ देखकर शीघ्रगामी अश्वों से युक्त रथ पर चलनेवाले और उष्णकिरण सूर्य का पुत्र सुग्रीव जिस स्थान पर रहता था, वहाँ जाने का मार्ग पूरे विवरण के साथ बताया।
शास्त्र-श्रवण से जिनके कर्ण पवित्र हुए हैं, ऐसे महात्मा लोग जिस अमृतमय आस्वाद (ब्रह्मानंद) को अपने सूक्ष्म तत्त्व-ज्ञान के द्वारा प्राप्त करते हैं, उस (ब्रह्मानंद) के साकार रूप प्रभु (राम) ने शबरी के उन वचनों को सुना, जो महान् आचार्यों के द्वारा मोक्ष-प्राप्ति के लिए दिये जानेवाले उपदेशों के समान थे।
फिर, वह शबरी बड़ी कठिनाई से संपन्न की गई तपस्या के प्रभाव से अपनी देह का त्याग कर अनुपम मोक्ष-लोक में आनंद से जा पहुँची। उस दृश्य को उन वीरो ने आश्चर्य से देखा। और फिर, उस (शबरी) के कहे मार्ग पर अपने वीर-वलयों को झंकृत करते हुए चल पड़े।
वे (राम-लक्ष्मण), शीतल वनों, पर्वतों तथा विभिन्न दिशाओं को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ चले और उस पंपा सरोवर के निकट जा पहुँचे, जो ऐसा था, मानों धरती के मानवों के प्रतिदिन आकर उसमें स्नान करने के कारण, उनके प्रभूत पाप-रूपी अग्नि से पुण्य ही पिघलकर उस सरोवर के रूप में रहता हो। (१-६)
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कंब रामायण
किष्किन्धाकाण्ड
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मंगलाचरण
तीन वर्ण के तीनो गुण (सत्य, रज, तम) वाली मूल प्रकृति, उससे उत्पन्न सब तत्त्व, उस प्रकृति को गोचर करनेवाले नानारूपात्मक लोक तथा इन लोकों में स्थित सब पदार्थ, जिस परब्रह्म का शरीर बने हैं, वही (हमारे) सद्ज्ञान का मधुर विषय बना है, (जिसका चरित्र हम गा रहे हैं)।
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अध्याय १
पंपा पटल
वह (पंपा-सरोवर) मधुपूर्ण पुष्पों से भरा था। उसमें रक्तनेत्र एवं उष्ण शुण्ड से युक्त मत्तगज गोते लगाते थे; वह स्वच्छ था। वह ऐसा था, मानों जल से भरा समुद्र बिजली से युक्त मेघो के सहित आकाश को भी साथ लेकर धरती के मध्य आकर विराजमान हो गया हो।
काटकर चिकना किये गये स्फटिक-खंड के समान अति स्वच्छ (उस सरोवर का) शीतल जल, नवविध रत्नों से जडित सीढ़ियोवाले घाटों पर जब-जब तरंगें उठाकर टकराता था, तब-तब वह जल रत्नो की कांति से रंजित होकर, (अनेक शास्त्रो का) विवेचन करके भी सत्यज्ञान से विहीन रहनेवाले लोगों के चित्त की समता करता था।
मुक्ताओं से पूर्ण उस सरोवर के मध्य, प्रवाल-सदृश टाँगोंवाले राजहंस और हंसिनियाँ, एक साथ दृष्टि-गोचर होते थे, जिससे वह सरोवर उस विशाल आकाश के समान दिखता था, जिसमे अनेक राका-चन्द्र उज्ज्वल नक्षत्रो-सहित निखर रहे हों।
वह सरोवर ऐसा लगता था, जैसे अममान गाधिसुत (विश्वामित्र) ने समुद्र से आवृत्त लंक, प्राणिवर्ग तथा वेद-पारग (ब्राह्मण) आदि की प्रतिसृष्टि करते समय, शीतल लवण-समुद्र के बदले मधुर जल से पूर्ण इस (सरोवर) का सर्जन किया हो।
| ४३२ | कंब रामायण |
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वह सरोवर इतना गंभीर और इतना स्वच्छ जल से पूर्ण था कि (उसके संबंध में) यह कहा जा सकता है कि सूर्य के प्रतिस्पर्धी नागों का लोक यही है (अर्थात्, उसके जल की स्वच्छता के कारण पाताल तक दिखाई पड़ता था)। कल्पवृक्ष-सदृश तथा महा-कवियों के शब्दों के अर्थ के समान ही वह सरोवर, पाताल तक अत्यन्त स्वच्छता से परिपूर्ण था।
विशाल दलों से युक्त पुष्पों में विश्राम करनेवाले और अव्यक्त मधुर शब्द करने-वाले हंस आदि पक्षियों की ध्वनियों से युक्त वह सरोवर, नाना प्रकार की वस्तुओं से सम्पन्न किसी बडे नगर की पण्यवीथी की समता करता था।
उस सरोवर में सर्वत्र फैले हुए रक्तकमलों के मध्य जो हंस विचर रहे थे, वे ऐसे लगत थे, मानो यह सोचकर कि हम सुवासित कुंतलोंवाली सीता का पता नहीं लगा सके, इसलिए हम (रामचन्द्र का) मुख देखे बिना ही अपना प्राण त्याग कर देंगे, वे (हंस) अग्नि के मध्य कूद पड़े हों।
वह सरोवर इतना स्वच्छ था कि उसके अंतर्गत (रहनेवाले) मुक्ता आदि स्पष्ट दिखाई पड़ते थे। साथ-ही वह यत्र-तत्र सेंवार आदि के फैले रहने से मलिन भी दिखाई पड़ता था। वह उस ज्ञान के सदृश था, जो अविद्या के स्पर्श से कलंकित हो गया हो।
उस सरोवर में जो मीन थे, वे मानों यह सोचकर छिपे हुए थे कि दुःखी मनवाले श्रीरामचन्द्र यदि हमें देख लेंगे तो, वे साकार सतीत्व-जैसी और शुकमधुर-भाषिणी देवी (सीता) के नयनों (की छाया) को हम में देखकर, कभी अश्रु न बहानेवाले अपने नयनों में कहीं आँसू न भर लावें।
बाँसों में उत्पन्न मोतियों, मदजल बरसानेवाले मेघ-सदृश हाथियों के दंतों से उत्पन्न मोतियों, तथा अन्य रत्नों को लिये हुए पर्वत-निर्भर, आभरणों से भूषित वस्तु के जैसे होकर उस सरोवर में आकर गिरते थे। अतः, वह (सरोवर) कर्णाभरणों से शोभायमान वदनवाली सुन्दरियों की छवि की समता करता था।
उष्ण मदजल-बहानेवाले हाथी उस सरोवर में निमग्न होते थे, जिससे उसका जल पंकिल हो जाता था। अतः, वह (सरोवर) उन आभरण-भूषित वारनारियों की समता करता था जिनका शरीर, रात्रिकाल में मन्मथ-समर से श्रांत हो गया हो।
गगन-चुंबी पर्वतों से प्रवाहित मेघ-धाराएँ और हाथियों के, भ्रमरों को आकृष्ट करनेवाले सुरभित मदजल-प्रवाह, उस सरोवर में भर जाते थे, जिससे उस जल को पीनेवाले प्राणी भी मस्त हो जाने थे। इस कारण से वह (सरोवर) मनोहर केशोंवाली सुन्दरियों के बिंब-सदृश अधर की समता करता था।
आर्यवाणी (संस्कृत) आदि अठारहों भाषाएँ किसी एक अल्पज्ञ व्यक्ति को प्राप्त हो गई हों, (और शब्दायमान हो गई हों) इसी प्रकार उस सरोवर में विविध पक्षी निरंतर ऐसी विविध प्रकार की ध्वनियाँ करते रहते थे, जिन (ध्वनियों) को पृथक्-पृथक् पहचानना असंभव था।
एक हंस, जो प्राणों के समान ही उसका आलिंगन करके रहनेवाली अपनी
किष्किन्धाकाण्ड ४३३
हंसिनी से इस प्रकार बिछुड़ गया था, जैसे शरीर प्राणो से अलग हो गया हो, देवांगनाओ के (जो वहाँ स्नान करने के लिए आई थी) नूपुरों के मधु-सदृश शब्द को कान लगाकर सुन रहा था ।
असंख्य पर्वतों से निर्झर के द्वारा बहाकर लाये गये सुगंधित अगरु, चंदन इत्यादि उस सरोवर में निमग्न रहते थे, जिससे वह (सरोवर) उस पात्र के समान था, जिसमें नगर-वासियो ने चंदन इत्यादि के सुगंध-रसों को भरकर रखा हो ।
उस सरोवर के मकर, हरिणनयना बालाओं के अधर की समता करनेवाले रक्त कुमुद के सुरभित मधु का पान करके (रमणियों का अधर) पान करनेवाले पुरुषो के जैसे ही मत्त हो उठते थे । करंड पक्षी (जलकौए), मानों जन्म-मरण की प्रक्रिया को दिखाने के लिए, अपनी चोचों में मीन को पकड़े हुए बार-बार जल में डुबकियाँ लगाते और बाहर निकलते थे ।
हंस, मानों यह सोचकर कि हम पुष्ट हाथी-सदृश श्रीरामचन्द्र को, सुरभित कमल में निवास करनेवाली लक्ष्मी (अर्थात्, सीता) को लाकर नही दे सके, अतः उनकी और कोई, अल्प ही सही, सेवा करें—इस खयाल से मनोहर पद-गति दिखा रहे थे (जिससे रामचन्द्र को सीता की पदगति का स्मरण हो आये) । वहाँ के नीलोत्पल (सीता के) नेत्रों की सुन्दरता को दिखा रहे थे और रक्त कुमुद (सीता के) अधर का दृश्य उपस्थित कर रहे थे ।
वहाँ के कुछ हंस (सरोवर के) तट की पुष्पित शालाओं पर बैठे थे । वे शाखाएँ ऐसी लगती थी, मानो उस सरोवर में अपने आभरणों की कांति को चारों ओर बिखेरती हुई नित्य स्नान करनेवाली देवांगनाओ की चोटियाँ उनके कृत्रिम-हंसों को अपने करों मे लिये हुए (उस सरोवर के) तट पर खड़ी हों ।
वहाँ, पद्मराग मणियो की कांति इस प्रकार व्याप्त हो रही थी कि एक ओर लगी हुई नीलमणियो की कांति उससे दब जाती थी, जिससे वहाँ रात्रिकाल मे भी दिन-जैसा प्रकाश व्याप्त रहता था । चक्रवाको के जोडे भी (उसे दिन समझकर) तरुणियों के स्तनद्वय के समान एक दूसरे से मिले रहते थे ।
बड़ी-बड़ी मछलियाँ, वेग से फेंके गये खड्ग के समान झपटती थी । क्रमशः उठ-उठकर बहनेवाली तरंगों में लुढक-लुढककर चलनेवाले जल-नकुल, उन नटो के जैसे लगते थे, जो (अपने पैरो में पायल बाँधकर) सुखरित गति के साथ नाचते हैं । दादुर (उन नृत्यों को देखकर) 'वाह-वाह !' कहते-से लगते थे ।
रामचन्द्र, उस विशाल जलमय सरोवर के निकट पहुँचे । वहाँ के बालहंस, कमल-पुष्प इत्यादि को देखकर वे कोमल पल्लव-तुल्य सीता देवी का स्मरण करके द्रवित मन हो उठे । उनका विवेक भी मंद पड़ गया, जिससे वे रो पडे ।
रेखाओ से युक्त सुन्दर पैरवाले चक्रवाको ! बालहंसो ! कभी मुझसे अलग न होनेवाली सीता मुझसे बिछुड़ गई है । अब वह (मेरे साथ) नही है । मै विरह से पीडित हूँ । अब तुम्हारे लिए कोई बाधा नही रही (अर्थात्, तुम मुझे सता सकते हो) । फिर भी, यदि तुम दुःखी प्राणों पर दया करोगे, तो वह तुम्हारे यश का ही कारण होगा ।
| ४३४ | कंब रामायण |
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कभी वियोग का अनुभव न किये हुए मुझ-जैसे को यदि कुछ सांत्वना दोगे, तो इससे क्या तुम्हारी कोई हानि होगी ?
हे सरोवर ! सुन्दर कमलो और सद्योविकसित सुवासित नीलोत्पलो को दिखाकर तूने घाव के जैसे जलनेवाले मेरे मन पर मलहम-सा लगा दिया। तुम (सीता के) नयनों तथा उसके वदन को दिखा रहे हो। क्या उसके रूप को एक बार भी नही दिखाओगे ? (जो अपने लिए संभव हो, उस वस्तु को) न देकर लोभ करनेवाले व्यक्ति अच्छे नही होते।
विकसित नील उत्पलों, रक्त कुमुदों, सुगंधित कोमल कमलों, 'वलै' (एक जल-लता) के पत्तों, तरंगो, मीनो, कछुओ तथा ऐसे ही अन्य पदार्थों को देखकर, रामचन्द्र उस सरोवर से कह उठे—हे सरोवर ! मै अमृत-समान उस (सीता) देवी के अवयवों को तुम्हारे अंतर में देख रहा हूँ। क्या विशाल आकाश में जब बलवान् राक्षस (सीता को) खाने लगा, तब उसके ये अवयव यहाँ गिर पड़े थे ?
दौड़ते और खेलते रहनेवाले हे मयूर ! तू उस (सीता) की छवि से पराजित होकर मन मसोसकर शत्रु के जैसे फिरता रहता था। क्या अब आनंदित हो रहा है ? उस (सीता) को खोजनेवाले मेरे (विकल) प्राणों को देखकर तू मन में उमंग से नाच रहा है ? तू सहस्र नेत्रवाला है। तुझे कुछ भी अज्ञात (अदृश्य) नही है (अर्थात्, तूने सीता के अपहरण को जान लिया होगा, इसीलिए तू आनन्द से नाच रहा है)।
हंस-मिथुनो ! यद्यपि तुम मेरे निकट नही आओगे, तथापि (सीता के संबंध में) कुछ कहो। क्या कुछ भी नही कहोगे ? मैने तुम्हारा कुछ अपकार नही किया है, तो क्या तुम मेरा अपकार करोगे ? कटि-रहित उस (सीता) ने ही तो तुम्हारी गति की सुन्दरता को परास्त किया था ? उससे (सीता से) तुम्हारा बैर है। किन्तु, मै तो तुम्हें देखकर आनदित हो रहा हूँ। तुम मुझपर क्यो कोप करते हो ?
सुनहले और सुरभित अंतर्दलों के मध्य मकरंद में रहनेवाले एवं मधुर गान करने-वाले भ्रमरो से शोभायमान हे कमल ! (सीता) देवी मेरे पार्श्व में नही हैं। वह (मुझसे) अन्यत्र रहनेवाली भी नहीं हैं। यदि तुम भी यह कह दो कि वह तुम्हारे पास नही है, तो तुम सत्य को छिपा रहे हों। यों सत्य को छिपानेवालों से मित्रता कैसे हो सकती है ?
सीता के मुख की समानता करते हुए भी कुछ भी न बोलकर सरोवर मे छिपे रहनेवाले रक्त कुमुद के पास पडी हुई हे रक्तजटे !¹ तुम मेरे सम्मुख आओ और अमृतवर्षी, अति सुन्दर बिंब-सदृश (सीता के) अधर को मुझे दिखाओ। उस अधर के अमृत-रस को तथा शीतल वचनों को मुझे दो।
हे जल-लता के पत्र ! तुम तो पुष्पलता-सदृश मुग्धा सीता के कान ही हो, और कुछ नही। अतः, मुझ दुःखी की सहायता करने में तुम्हें क्या आपत्ति है ? फिर भी, तुम जो स्वर्ण-कुंडल, वक्र ताटक और मुक्तामय झुमके को छोड़कर यहाँ आये हो (सीता के संबंध मे) कुछ न कहकर, क्यों वैर निकाल रहे हो ?
महावर-लगी उँगलियों से जिसके चरण ऐसे लगते थे, मानो पद्म से प्रवाल फूट
१. रक्तजटा, पानी में फैलनेवाली एक प्रकार की लता है, जो बहुत लाल होती है।—अनु०
किष्किन्धाकाण्ड
४३५
निकला हो, जो मेरे हृदय-रूपी कमल मे रहती है, जो काले बादल-जैसे और पुष्यो से भूषित केशोंवाली है, उस (सीता) के नयनों की समता करनेवाले हे मनोहर नीलोत्पल ! तू ऐसा हँसता है कि उससे विष-सा फैल जाता है । तू क्यों इस प्रकार मुझे सता रहा है ?
मन की वेदना से आह भरते हुए श्रीरामचन्द्र ने उस सरोवर के पुन्नाग-वृक्षों से पूर्ण तट पर खड़े होकर फिर कहा—हे निर्दय, कठोर सरोवर ! मै मिटा जा रहा हूँ, फिर भी तुम कुछ भी नही कहते ।—इस प्रकार वे अत्यंत पीडित हुए ।
प्रभूत करुणा के जन्मस्थान उन प्रभु ने देखा—काले भ्रमरों से घिरे हुए, मदजल बहानेवाले काले हाथी, मीठे पत्ते खानेवाली बड़ी हथिनियों के मुँह में (अपनी सूँड़ से) जल उठा-उठाकर भर रहे हैं। उस दृश्य को देखते हुए वे खड़े रहे ।
उस समय प्रेम नामक अपूर्व आभरण से सुशोभित अनुज (लक्ष्मण) ने प्रभु से कहा—दिन व्यतीत हो गया । अतः, हे आर्य ! इस सरोवर के दिव्य जल में स्नान करके, आप अपनी कीर्त्ति के समान ही सर्वत्र व्याप्त हुए भगवान् के चरणों की वंदना करें ।
राजा (श्रीराम) उस स्थान से बड़ी कठिनाई से हटे और तरंगों से भरे उस सरोवर के सुरभिपूर्ण जल में ऐसे स्नान करने लगे कि पर्वत-जैसे मत्तगज भी उन (राम) की शोभा को देखकर लज्जित हो गये ।
ज्योंही प्रभु उस जल में निमग्न हुए, त्योंही उनकी वियोगाग्नि की ज्वाला से वह जल ऐसा तप्त हो गया, जैसे लुहार ने खूब तपाये हुए लोहे को शीतल जल में डुबो दिया हो ।
हंस का रूप धारण कर (ब्रह्मा के प्रति) दुर्गम वेदों का उपदेश देनेवाले उन (विष्णु के अवतार, रामचन्द्र) ने स्नान करके अनादि वेदों में उक्त विधि से चक्रधारी (विष्णु) के प्रति अर्घ्य-प्रदान किया, फिर मुनियों से आवासित एक वन में जाकर ठहरे । उष्णकिरण (सूर्य) भी डूब गया ।
संध्या-रूपी स्त्री आ पहुँची । किन्तु, कंचुक से बद्ध स्तनवती (सीता) नही आई । उस देवी के वियोग में रहकर अनुपम नायक (राम) उसका स्मरण करके विकल हो रहे थे । तब शीतल जल से पूर्ण समुद्र से चन्द्रमा आकाश-मध्य यों उठ आया, मानो तप्तकिरण (सूर्य) ही हो ।
उस समय विविध कमल-पुष्प बंद हुए, पक्षी उद्यानों मे अपने-अपने नीड़ों में बंद हुए । मृग के कार्य-कलाप बंद हुए । वृक्षों के पत्ते बंद हुए । शुको का बोलना बंद हुआ । कलापियों के नृत्य बंद हुए । कोकिल के गान बंद हुए । हाथियों के गर्जन भी बंद हुए ।
धरती के प्राणी निद्रित हुए । पर्वत के प्राणी निद्रित हुए । स्वच्छ जल से भरे सरोवर निद्रित हुए । भूत भी पलक मूँदने लगे । किंतु, क्षीर-सागर में निद्रा करनेवाले दोनों हाथी¹ अपनी आँखें बंद न कर सके ।
विमल स्वरूप (राम) को दारुण वेदना से मुक्त करते हुए उष्णकिरण पुनः
१. राम और लक्ष्मण—दोनों, विष्णु के अंश माने जाते हैं। अतः, उन दोनों को क्षीरसागर में निद्रा करनेवाले हाथी कहा गया है।—अनु०