कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 427, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरण्यकाण्ड ४१६
मुझसे जो वियुक्त होते हो, होवें । जितनी भी आपदाएँ आती हो, आये । किंतु दीर्घ वीर-कंकण धारण करनेवाले हे वीर ! वे सारी आपदाएँ तुम्हीं से दूर होनेवाली हैं । मेरे निकट रहकर वे ( विपदाएँ ) मुझे सता नहीं सकती ।
भयंकर युद्ध करने में निपुण वीर । तुमने कहा कि युद्धकुशल राक्षसी को परास्त कर लौटे हो । क्षुद्र स्वभाववाली उस राक्षसी के वचनों से उत्तेजित होकर उसे तुमने मार तो नही डाला ? बताओ ।
तब लक्ष्मण ने कहा—'मैने उस राक्षसी की नाक, कान और बंधन मे स्थित स्तनों को काट दिया । उस समय वह चीख उठी ।' यह कहकर ( लक्ष्मण ) हाथ जोड़कर खड़े रहे ।
आनंद से प्रफुल्ल होकर राम ने कहा—अँधेरे मे तुम्हें मारने के लिए आई हुई राक्षसी को भी तुमने नही मारा । किन्तु, उसका अंग-भंग मात्र किया । तुम चतुर हो । मनु प्रभृति राजाओं के इस वंश के अनुकूल ही तुमने आचरण किया है और अपने भाई को गले लगा लिया ।
वीर ( राम ) और लक्ष्मण—जैसे अपार दुःख से मुक्त हुए । वारुण अस्त्र को प्रयुक्त करके गगन मे वर्षा उत्पन्न की और उसका जल पीकर प्रभात काल की प्रतीक्षा करते हुए एक पर्वत पर विश्राम करते रहे ।
पत्थरो से भरी धरती पर, अरण्य के पल्लवों और पुष्पो को लेकर लक्ष्मण के-द्वारा बनाई गई शय्या पर, बड़ी वेदना भोगते हुए रामचन्द्र ने शयन किया । लक्ष्मण उनके कोमल चरणों को सहलाते रहे ।
राम ने कलापी-तुल्य सीता से वियुक्त हो जाने के पश्चात् अपमान की पीडा से कुछ आहार नही किया था । शोक की अधिकता से निद्रा भी नही की थी । उनके ऐसे दुःख का वर्णन हम कैसे कर सकते हैं ? उनके निःश्वासो के मध्य उनके प्राण झूलते रहे ।
राम, विरह की पीडा से बोल उठे—मेरी आँखों को अरण्य में सर्वत्र सीता का रूप ही दिखाई पड़ता है । यह क्या इसलिए कि मै उसके रूप को नही भूल सका हूँ, या नही तो क्या यह भी राक्षसों की माया है ?
काले केशोंवाली, अरुण रेखावाले नेत्रो से युक्त तथा पतिव्रता नारियो के आभरण-सदृश उस ( सीता ) को मैं अपने पार्श्व में देखता हूँ । किन्तु, उसका आलिंगन करने के लिए उद्यत होने पर उसका स्पर्श नही पाता हूँ । क्या उसकी कटि के समान ही उसका आकार भी थोड़ा-थोड़ा करके क्षीण होता हुआ अदृश्य हो गया है ।
( पहले मुझे ऐसे लगा जैसे ) मैने उसके सद्योविकसित कमल ( समान मुख ) के मधुपूर्ण बिंब तथा प्रवाल के समान अधर के अमृत का पान किया । किन्तु, वह मेरे पार्श्व में नही थी । क्या पलक न लगने पर भी स्वप्न दिखाई पड़ते हैं ?
यदि यह रात्रि मुझे ऐसा दुःख दे, जो पृथ्वी, गगन आदि पञ्चभूतो एव मन के विचार से भी बड़ा हो, तो क्या यह ( रात्रि ) शीतल, सुगध तथा नीलवर्ण से युक्त कुतलों-वाली सीता की आँखों से भी बड़ी होगी ?