कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 426, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें४१८ कंब रामायण
आदि अगो को काट दिया। तब उस राक्षसी ने बड़ी व्यथा से जो चीख मचाई, वह ध्वनि राम के कानों मे आ गिरी, तो उमसे राम किंचित् स्वस्थ-से हुए।
फिर, राम ने सोचा—प्रस्तरमय अरण्य में अनेक वीर-ककणो से मुखरित युद्ध करनेवाले राक्षसों की विरोध-सूचक ध्वनि यह नहीं है। यह तो विपदा में पड़ी हुई एक स्त्री की ही ध्वनि है और वह कोई राक्षसी ही है।
उस समय, नीलवर्ण राम ने आग्नेय अस्त्र को अपने अरुण कर में लेकर उसे प्रयुक्त करने का उपक्रम किया। तब वहाँ का अंधकार हटकर भूलोक के दूसरे कोने में जाकर इकट्ठा हो गया और उस स्थान में रात्रिकाल दिन के समान भासमान हो उठा।
रामचन्द्र बड़े-बड़े पर्वतों को चूर करते हुए, ऊँचे वृक्षो को तोड़ते हुए, भूमि को अपने पदचाप से पीडित करते हुए और अपने दोनों पाश्र्वों में चड़चड़ाहट की ध्वनि उत्पन्न करते हुए चंडमारुत से भी तिगुने वेग के साथ (उस राक्षसी को निहत करने के लिए) बढ चले।
प्रलयकाल में जिस प्रकार काला समुद्र धरती पर उमड आये, उस प्रकार का दृश्य उपस्थित करते हुए आनेवाले, अपने सहायक ज्येष्ठ भ्राता को लक्ष्मण ने देखा और कहा—'हे उदार! चिंता न करें, चिंता न करें।'
'यह दास आ गया। आप मन में व्याकुल न हो।'—यो कहते हुए लक्ष्मण रामचन्द्र के कोमल पल्लव-जैसे चरणों पर नत हुआ। रामचन्द्र ने मानों अपनी खोई आँखें पुनः प्राप्त कीं।
उन रामचन्द्र की दशा, जिनकी आँखों से झरने के समान अश्रु बह रहे थे, उस गाय की-सी हो गई, जो अपना बछड़ा खो जाने से, उसे खोजने का मार्ग भी न देखती हुई व्याकुल रहती हो और स्वय ही उस बछड़े के आ जाने पर अपने थन से दूध बहाती हुई खड़ी हो।
उस समय, राम ने लक्ष्मण का पुनः-पुनः आलिंगन किया और अपनी अश्रुधारा से उसके स्वर्ण-जैसे शरीर को धो डाला। फिर कहा—हे लोहे के स्तंभ-जैसे कधोवाले। यह सोचकर कि तुम कहो खो गये हो, अबतक मै अत्यत दुःखी हो रहा था।
'क्या घटित हुआ? मुझे बताओ।'—राम के यों पूछने पर लक्ष्मण ने सारा वृत्तांत कह सुनाया। तब उन प्रभु ने, जिनसे बड़ी अन्य कोई सत्ता नहीं है, आनंद और व्यथा दोनों को एक साथ ही प्राप्त किया।
फिर, राम ने लक्ष्मण से कहा—जो विशाल समुद्र के मध्य फँसा हो, क्या प्रत्येक लहर के आते समय उसका भयभीत होना उचित है? उसी प्रकार दुर्दैव के प्रभाव से जन्म-रूपी बंधन में पड़े हुए हमें, दुःखद विपदा के प्राप्त होने पर शिथिल नही होना चाहिए।
तीन देव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश), तीन लोको के निवासी—सब मेरे शत्रु बनकर आवें, तो भी मुझे कौन जीत सकेगा? भाई! तुम मेरे साथ हो—यह एक बात ही मुझे बल देता है। इससे बढकर मुझे और कोई रक्षा नहीं चाहिए। (अर्थात्, अन्य कोई सेना आवश्यक नहीं है।)