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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 425

अरण्यकाण्ड ४१७

अदृश्य हो गये । हे तात ! मुझे इस प्रकार छोड़कर तुमने भूल की । यह तुम्हारा कार्य कठोर है । गुरुजन तुम्हारे इस कार्य को नही सराहेगे ।

आई हुई विपदाओं को दूर करने मे समर्थ हे वीर ! तुमने मुझे अवार्य दुःख दिया । शत्रुओं से भी प्रशंसित होनेवाले हे वीर ! क्या मुझसे घृणा करते हुए मुझे इस अरण्य में पीडित होने के लिए छोड़कर चले गये हो ? इतनी देर तक मुझसे वियुक्त होकर कही रह जाना, क्या तुम्हारे लिए उचित है ?

मै अपने पिता से वियुक्त हुआ। अपनी माता से वियुक्त हुआ। लक्ष्मी-समान, स्वर्णाभरण-भूषित सीता से वियुक्त हुआ। फिर, मै जो जीवित रहा, वह तुम, एक के वियुक्त न होने से ही तो था ?

(हरिण के पीछे मेरे जाने पर) मुझे ढूँढ़ते हुए तुम हाथी के समान चले आये थे । अब तुम अदृश्य होकर, स्वर्णमय कर्णाभरणों से भूषित सीता को ढूँढनेवाले मुझ दीन को, अपने भी ढूँढ़ने के लिए दुःखी बनाकर छोड़ गये हो ।

कौन बतानेवाला है कि तुम कहाँ हो ? (तुम्हारे न मिलने पर) मै आज प्राण-त्याग किये बिना नही रहूँगा। यदि मै मरूँगा, तो मेरे स्वजनों में से भी कोई जीवित नही रहेगा । अतः, हे कठोरहृदय ! तुम, एक साथ सब स्वजनों को मारनेवाले हो गये हो । यह क्या तुम्हारे लिए उचित है ?

मान्धाता आदि हमारे पूर्वजी के आचार के अनुसार राजा बनना छोड़कर मैने अरण्य-वास करने का साहस किया । उस समय सच्चा बन्धु बनकर जब दूसरा कोई नही आया, तब तुम्ही मुझ एकाकी के साथी बनकर आये । अब तुम भी मुझे छोड़कर चले गये हो ?

इस प्रकार कहते हुए मेरे अनुपम प्रभु रामचन्द्र उठते, गिरते, स्तब्ध होते, प्रज्ञाहीन होते, फिर कहते—हाय ! इस घने अँधेरे में न बिजली है, न गर्जन । फिर भी, यह क्या विपदा आ पड़ी है ? (अर्थात्, भावी विपदा की पूर्व सूचना कुछ नहीं हुई और यह अकस्मात् क्या हुआ ?) रामचन्द्र की वह दुःखपूर्ण दशा एक-जैसी नही थी ।

युद्ध के उन्माद से पूर्ण मत्तगज की समता करनेवाले वे (राम), अनेक स्थानों में जाकर (लक्ष्मण को) ढूँढते । शीघ्र गति से जाते । (लक्ष्मण का) नाम लेकर पुकारते । व्याकुलप्राण और मूर्च्छित होते ।

क्षमाशील (सीता) देवी के साथ मेरे प्राणों की भी रक्षा करते हुए अपलक रहनेवाला लक्ष्मण, क्या लौट आने मे इतना विलंब करता ? धरती का भार बनकर दुर्भाग्य के साथ संचरण करनेवाले मुझ पापी का जीवित रहना अनुचित है ।

फिर यह कहकर कि, 'यदि मेरे द्वारा किया गया कोई सुकृत हो और उस (लक्ष्मण) का ज्येष्ठ होकर उत्पन्न होने की कुछ योग्यता मुझमें हो, तो मै वैसे ही पुनर्जन्म पाऊँ'—रामचन्द्र अपना तीक्ष्ण करवाल कर में लेकर अपने प्राणों का अन्त करने को उद्यत हुए, इतने में—

उधर लक्ष्मण राक्षसी की माया से मुक्त हुआ और उस (राक्षसी) की नासिका