कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 428, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४२० | कंब रामायण |
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जल तथा उसमें संचरण करनेवाले मीनों से युक्त समुद्र से मनोहर चन्द्र के नाम से जो प्रलयाग्नि उत्पन्न हुई है, उसकी उष्ण किरणों के स्पर्श से उन्नत आकाश के शरीर-भर में फफोले-से पड़ गये हैं (अर्थात्, नक्षत्र आकाश के फफोले कहे गये हैं।)
चक्रवर्त्ती राम इस प्रकार के अनेक वचन कहकर व्याकुल हो रहे थे। उसी समय अरुण किरणोंवाला-सूर्य इस प्रकार उदित हुआ, जैसे उन (राम) की दुःखमय दशा को देखकर स्वयं दुःखी होकर सहानुभूति दिखा रहा हो। (१-१०१)
अध्याय ११
कबन्ध पटल
वे (राम-लक्ष्मण), प्रभात के समय उस कलापी-तुल्य रूपवती, पतिव्रता (सीता) देवी का, जिसकी क्षमा की तुलना में पृथ्वी का क्षमा-गुण भी निस्सार-सा लगता था, अन्वेषण करते हुए गये। पक्षी इस प्रकार शब्द कर रहे थे, मानों वे उनके दुःख को देखकर रो रहे हों।
वे दोनों धनुर्धर वीर, पचास योजन-पर्यंत अरण्य को पार करके गये और कबंध नामक उस राक्षस के वन में जा पहुँचे, जो एक ही स्थान पर पड़ा रहता था और अपनी दीर्घ बाँहों को दूर तक फैलाकर सब प्राणियों को हाथों से उठाकर अपने पेट में भर लेता था। इतने में सूर्य भी आकाश के मध्य आ पहुँचा।
(उस राक्षस के हाथों में पड़नेवाले) हाथी से चींटी तक, सब प्राणी मिट जाते थे। उसको देखने मात्र से अत्यंत भय से काँपने लगते थे। उसके चंगुल में आकर फिर उस बंधन से वे कभी छूट नहीं पाते थे।
कबंध के निकट सब प्राणी इस प्रकार काँपते रहते थे, जिस प्रकार, कुल-परंपरा से आगत नीतिमार्ग को छोड़नेवाले, शासन की दक्षता से रहित, शक्तिहीन राजा के राज्य में रहनेवाले प्राणी हों। वे बिखर जाते, एक साथ सम्मिलित होते, पीडित होकर भागते और स्तब्ध हो खड़े रहते।
बड़े-बड़े पर्वत भी कबंध के हाथों में लुढ़कते हुए चले आते। बड़े-बड़े वृक्ष भी जड़ से उखड़-उखड़कर निकल आते। अरण्य की नदियाँ उमड़कर ऊँचे स्थानों एवं सब दिशाओ में फैल जातीं। जल-भरे मेघ भी नीचे आ गिरते। यह सारा दृश्य उन वीरों ने देखा।
जिस प्रकार सारी सृष्टि के विनाश का कारणभूत प्रलय-काल जब आता है, तब प्रभंजन का थपेड़ा खाकर चतुर्दिक् से समुद्र उमड़ उठता है और गर्जन करता हुआ सारी पृथ्वी को ढक देता है, उसी प्रकार सबको चारों ओर से घेरकर आनेवाली (कबंध की) उन बाँहों में वे (राम-लक्ष्मण) भी फँस गये।