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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 429

श्रीराघवयादवार्डे ४२१

मानो चक्रवाल पर्वत ही सिमटकर आ रहा हो, इस प्रकार आनेवाली उन प्राचीर-जैसी बाँहो में फँसकर वे दोनों वीर, यह सोचकर प्रसन्न हुए कि मधु-जैसी मीठी बोलीवाली सीता की रक्षा के उद्देश्य से रावण की सेना ही आकर उन्हे घेर रही है (और उस सेना को मिटा देने का सुअवसर हमे प्राप्त हुआ है)।

राम ने अपने अनुज को देखकर कहा—हे तात ! ऐसा लगता है कि सीता का हरण करनेवाला रावण यही पर निवास करता है। अब हमारा दुःख मिटनेवाला है।

तब लक्ष्मण ने (राम को) प्रणाम करके उत्तर दिया—यह राक्षस-सेना होती, तो क्या नगाड़े बजने की ध्वनि और शंखनाद नहीं सुनाई देते ? यह राक्षस-सेना नहीं है और कुछ है। फिर, लक्ष्मण भी सोचने लगे (कि यह क्या है ?)।

फिर, लक्ष्मण ने (राम से) कहा—प्रलयकाल में भी अमर रहनेवाले हे प्रभु ! यह कदाचित् वह सर्प ही है, जिससे देवो ने मंदर-पर्वत को लपेटकर क्षीर-सागर को मथा था, अथवा यह कोई दूसरा सर्प है। यह (सर्प) अपने मुँह से अपनी पूँछ को जोड़कर घेरा बनाकर हमें बाँध रहा है।

आगे-आगे चलनेवाले (राम) ने लक्ष्मण के इन वचनों को सुनकर सोचा कि उसका कथन ठीक ही है। फिर (उस घेरे मे) दो योजन दूर जाने पर वे दोनो उस पर्वताकार राक्षस के सम्मुख आ खड़े हुए।

वह राक्षस अपनी आँखो के साथ ऐसा दृश्य उपस्थित करता था, जैसे उष्ण किरणवाले दो सूर्यों से युक्त मेरुपर्वत हो। उसके पेट मे ही उसका मुँह था, जिसमे दाँत ऐसे थे कि उनके मध्य दो-दो 'खात' (दस मील का एक खात होता था) की दूरी थी और (वह मुँह) मकर-मीनों से पूर्ण समुद्र के समान था।

उसकी बाँहें इस प्रकार पड़ी थी, जैसे देवो के द्वारा मदर-रूपी दिव्य मथानी को (क्षीरसमुद्र में) डालकर उसपर लपेटा गया वासुकि सर्प दोनों ओर से खींचा जाकर फैला हुआ पड़ा हो।

उसकी नासिका से इस प्रकार अग्नि और धूमलता निकल रही थी, जैसे लुहार की भाथी हो। उसके सामने उसकी जिह्वा इस प्रकार निकली हुई थी, जैसे विशाल समुद्र को एक ही दशा में रखनेवाली वडवाग्नि की ज्वाला हो।

उसके मुँह के दोनो खड्ग-दंत इस प्रकार लगते थे, मानो पूर्णचन्द्र, (राहु नामक) सर्प को अपनी ओर आते हुए देखकर भय से एक सुरक्षित स्थान को खोजता हुआ आया हो और निर्झरों से पूर्ण महान् पर्वत की कंदरा के भीतर, दो खंड होकर, घुस रहा हो।

उसका शरीर शीतल जल, प्रभृति प्रसिद्ध पञ्चभूतो से नही बना था, किंतु शास्त्रों मे बताये गये पञ्चमहापाप ही एकत्र होकर उस आकार मे आ गये थे।

उसके कर्ण-कुहर ऐसे थे, जैसे उष्ण तथा शीतल किरणवाले ज्योतिष्पिंडों (अर्थात्, सूर्य-चन्द्रो) को निगलनेवाले सर्पों (राहु-केतु) के, कुछ कार्य न रहने पर, विश्राम करने के लिए योग्य बिल हो। उसका उदर उस नरक का भी उपहास करनेवाला था, जिसमें असत्य भाषण आदि पाप कर्म करनेवाले नीच गुणवाले पापी रहते हैं।