कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 430, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें४२२ | कंब रामायण
वह (कबंध) अपने करों से सब प्राणियों को उठाकर अपने विशाल नाव-जैसे उदर में भर लेता था, जिससे उसका मुँह यम-पुरी के विजयशील द्वार के समान था।
वह समुद्र के समान बड़ा कोलाहल कर रहा था। उसका शरीर हलाहल विष के समान काला और उष्ण था। उसका आकार, विष्णु के चक्र के द्वारा शिर के कट जाने पर पड़े हुए कालनेमि (नामक राक्षस) के कबंध (धड़) के समान था।
वह ऐसा लगता था, जैसे मेरु पर्वत प्रभंजन के झोंके खाने से शिखरों के टूट जाने पर, शिखरहीन हो पड़ा हो। इस प्रकार के कबंध को सूक्ष्म ज्ञानवाले उन दोनों वीरों ने देखा।
उन्होंने उसके उस फटे मुँह को देखा, जिसमें चक्रवाल पर्वतों की सीमा से घिरी हुई सारी पृथ्वी समस्त समुद्रों-सहित गुम सकती थी और उन्होंने सोचा कि यह राक्षसों-जैसे किसी प्राचीरावृत्त नगर का द्वार है, जिसके भीतर देवता लोग भी प्रवेश नहीं कर सकते।
उस समय, अनुज (लक्ष्मण) ने, (कबंध को) भली भाँति देखकर कहा—हे धनुर्विद्या में निपुण! यह कोई बड़ा भूत है। यह सब प्राणियों को अपने हाथों से घेरकर अपने मुँह में डालता है। हमको भी उन प्राणियों के साथ मिलाकर खा जायगा। अब हम क्या करें! तब राम ने उत्तर दिया—
हे धरती को उठानेवाले आदिवराह जैसे बलवाले! हाँ, यह कोई भूत ही है; क्योंकि वह देखो, इसका शरीर इस प्रकार फैला है कि यह विशाल धरती भी इसके लिए पर्याप्त नहीं मालूम होती। इसके दायें और बायें दीर्घ बाँहें फैली हैं।
हे भाई! कलापी-तुल्य सीता वियुक्त हुई। पितृ-तुल्य जटायु मर गये। अपयश से पीडित चित्त के साथ मैं जीवित रहना नहीं चाहता हूँ। अतः, मैं इस (भूत) का भोजन बन जाऊँगा। तुम यहाँ से बचकर चले जाओ।
मुझे जन्म देनेवालों को दुःखी बनाते हुए, अपने भाई को दुःखी करते हुए, गुरुजनों के दुःखी होते हुए, सब अपयश का आश्रम बनकर, मैं उत्पन्न हुआ हूँ। अब मैं अपने प्राण छोड़े बिना इस अपयश को मिटा नहीं सकता।
क्या मैं मिथिला के राजा के पास पर्वत-जैसे दृढ़ तूणीर तथा धनुष को लेकर यह कहता हुआ जा सकूँगा कि गृहस्थाश्रम के योग्य आपके द्वारा प्रदत्त, मधुरभाषिणी पुष्प-लता-समान सीता राक्षसों के घर में रहती है।
'विकसित पुष्पों से भूषित सीता की रक्षा करने के सामर्थ्य से हीन होकर, मैं, अपने अनुज की रक्षा पाकर ही जीवित हूँ'—ऐसी बात सुनने की अपेक्षा यह वचन अच्छा होगा कि 'मैं परलोक में रहता हूँ।' अतः, अब इस जीवन को त्याग देना ही उचित है।
हमारी (लेखक की) दासता को स्वीकार करनेवाले राम ने जब ये बातें कहीं, तब अनुज ने कहा—मैं आपके पीछे-पीछे इस कानन में आया। मेरे आने पर भी ऐसी विपदा आपको प्राप्त हुई है। किन्तु, यदि आपके पूर्व ही मैं अपने प्राण न त्यागकर अपने प्यारे प्राण लेकर लौट जाऊँ, तो मेरी सेवा क्या बहुत भली होगी?