कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 431, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरण्यकाण्ड | ४२३
फिर, लक्ष्मण ने कहा—दुःख को जीतनेवाले ही तो धीर होते हैं। यदि अपने पिता, माता, ज्येष्ठ भ्राता आदि गुरुजनों से पहले ही ( उन गुरुजनो की रक्षा मे ) कोई अपने प्राण न त्याग करे, तो उसका जीवन अपयश का ही तो भाजन होगा ?
‘हरिणी-तुल्य पत्नी के साथ ज्येष्ठ भ्राता अरण्य में निवास करने गया, तो उसका अनुज, निद्राहीन रहकर उनकी रखवाली करता रहा’—इस प्रकार मेरी प्रशंसा जो लोग करते थे, उनके द्वारा, ‘उस ज्येष्ठ भ्राता तथा उस भ्राता की पत्नी से अलग होकर आ गया,’—इस प्रकार का अपयश पाना कितना बड़ा पाप होगा ?
मेरी माता ( सुमित्रा ) ने मुझसे कहा था—‘तुम अपने ज्येष्ठ भ्राता की सब आज्ञाओं का पालन करते रहना । किसी भी विपदा को सहने के लिए तैयार रहना । यदि महान् यशस्वी राम का कभी विनाश होने की संभावना हो, तो उनसे पहले तुम अपने प्राण त्यागना ।’ मै यदि अपनी माता के वचन पर स्थिर न रहूँगा, तो मेरा सत्य कैसे टिकेगा ?
हे सुन्दर स्वर्ण-आभरणों से भूषित कंधोवाले ! ‘मेरी जननी तथा मैं आपकी जननी तथा आपके मन के अनुकूल और सब सजनो के लिए प्रिय, व्यवहार करते रहते हैं’—ऐसी प्रशंसा के पात्र हम बनना चाहते है । इसके विपरीत अपने प्राणों को बचाये रखने की इच्छा करके हम अपने कर्त्तव्य का त्याग नहीं करेंगे ।
उस प्रलय-काल में भी जब सारी सृष्टि मिट जाती है, जब शाश्वत वेदो के द्वारा प्रशंसित देवता भी मिट जाते हैं, तब भी आपका अन्त नही होता । ऐसे आप, हाथी आदि प्राणियो को खाकर इस वन में रहनेवाले भूत के द्वारा मारे जाकर मिट जायें, क्या यह भी संभव है ?
सुननेवाले इस बात को न मानेंगे । देखनेवाले इसे नही चाहेंगे । ‘पुष्पमाला-भूषित कुंतलोवाली सीता को दुःख में न रखा, किन्तु ( राक्षसो के साथ ) युद्ध करके ( उस सीता को ) मुक्त किया’—इस प्रकार का महान् यश न पाकर, ‘युद्ध मे ( राक्षसो को ) नही जीत सका और ऐसे ही मर गया’—ऐसी निंदा पाना क्या उचित है ? ऐसी निंदा से बढ़कर और क्या अपयश हो सकता है ?
विष के समान क्रूर इस भूत की गणना ही क्या है ? यह बात नही है कि इस करवाल के आघात से इसके प्राण नही निकलेंगे । देखिए, मै किस प्रकार, हमें घेरनेवाले इसके हाथो को और इसके बिल-जैसे मुँह को काट देता हूँ । आप चिन्ता छोड़िए ।’—यों लक्ष्मण ने कहा ।
इस प्रकार के वचन कहकर लक्ष्मण स्वयं प्रभु से आगे बढ़ने लगे । तब राम लक्ष्मण से आगे जाने लगे । इस समय लक्ष्मण ने राम को रोका । यह देखकर हाय ! स्वयं देवता भी रो पडे, फिर अन्यो के सबंध में क्या कहा जाय ।
इस प्रकार, वे दोनो वीर-कंकणधारी वीरमुख के दो नेत्रो के समान चलकर कबंध के निकट पहुँचे । तब कबंध ने उनसे प्रश्न किया, ‘कर्म के परिणामस्वरूप यहाँ आये हुए तुम दोनो कौन हो ?’ यह सुनकर वे दोनो बडे क्रोध के साथ उसके सामने अपलक खडे रहे ।