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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 432, कुल 549 में से

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कंब रामायण

कबंध यह देखकर कि उसके प्रश्न से वे (राम-लक्ष्मण) डरे नही, किन्तु उसकी अवहेलना करते हुए खड़े हैं, अत्यधिक क्रोध से भर गया। उसके रोम-रोम से चिनगारी निकलने लगी। वह उन्हे निगलने की इच्छा से बढ़ा। तब उसके गगनोन्नत कंधो को उन्होने अपने करवाल से काट दिया।

उसकी दोनो बाँहो के कट जाने से उसकी देह से रक्त की धारा नीचे की ओर बहने लगी। तब वह एक ऐसे पर्वत की समता करने लगा, जिसके दोनो ओर पत्थरी से भरे सानु होते हैं।

प्रभु के कर का स्पर्श होने से उस (कबध) का वह शापमय रूप भी मिट गया। उसका पाप मिट गया। कटे हाथोवाले घोर आकार को छोड़कर वह गगन में इस प्रकार जाकर प्रकाशमान हुआ, जैसे कोई पक्षी अपने पिंजरे से आकाश में उड़ चला हो।

गगन में खड़े होकर उसने सोचा कि यह राम ही ब्रह्मा प्रभृति सब देवों के ध्यान से प्रत्यक्ष होनेवाले हैं, और उनके गुणो का गान करने लगा। जब पुण्य-फल अनुकूल होता है, तब कौन-सा पदार्थ दुर्लभ हो सकता है ?

कबंध ने राम से कहा—हे प्रभु ! मुझ, पापी के शाप को तुमने दूर किया। क्या तुम्ही सारी सृष्टि के निर्माता हो ? तुम्हीं अविनेश्वर धर्म के साक्षीभूत हो ? तुम्हीं देवो की पूर्वकृत तपस्या के फल के साकार रूप हो ? क्या तुम्हीं वह परमतत्त्व हो, जो तीन मूर्त्तियो में विभक्त हुआ है ?

हे कारण-रहित आदिपरब्रह्म ! तुम्हारे अवतार के तत्त्व को कोई भी नही पहचान सकता। क्या तुम वह वटवृक्ष हो, जो प्रलय-काल में उत्पन्न होता है। या, क्या उस वृक्ष का पत्ता हो ? या उस वट-पत्र में शयन करनेवाले बालक हो। या सृष्टि के आदिकारणभूत परमपुरुष हो ? कहो, तुम कौन हो ?

संसार मे जो देखनेवाले जीव हैं और जो देखे जानेवाले पदार्थ हैं, तुम उन सबकी दृष्टि हो। तुम सब पदार्थों में सलग्न रहते हो, किन्तु तुम्हे सुख-दुःख से कुछ सम्बन्ध नही रहता। अपने दिव्य प्रभाव से तुम सब लोकों को अपने उदर में समा लेते हो और फिर उन्हे प्रकट कर देते हो। क्या तुम पुरुष हो ? स्त्री हो ? अथवा उन दोनों से परे हो (अर्थात्, उभय से पृथक् हो) ? अथवा और कोई हो ?

सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा तुम्ही हो। उस ब्रह्मा का कारणभूत परमपुरुष (विष्णु) तुम्ही हो। उस परमपुरुष का भी कोई कारणभूत तत्त्व हो, तो वह भी तुम्ही हो। प्रसिद्ध वेद तुमको परम ज्योति कहते हैं। तो क्या अन्य देवता लोग उससे लज्जित नही होते (अर्थात्, अन्य देवो को परम ज्योति कहना उचित नही है) ?

अष्ट दिशारूपी प्राकार से युक्त, चौदह मजिलो के इस ब्रह्मांड-रूपी महान् मंदिर को सर्वत्र प्रकाशित करनेवाले तीनो ज्योतिर्मंडलों (अर्थात्, चंद्र-मंडल, सूर्य-मंडल और नक्षत्र-मंडल) के ऊपर स्थित परमपद में कभी प्रफुल्ल न होनेवाले कमल-कोरक के भीतर रहनेवाला बीज ही तुम्हारा आवास है।

हे परमेष्ठिन् (अर्थात्, परमपद के स्थान में निवास करनेवाले)! अनंत अष्ट