भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 433, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 433

श्रीअरण्यकाण्ड ४२५

दिशाओ में स्थित भूदेवो ( ब्राह्मणो ) के द्वारा किये जानेवाले उत्तम यज्ञो मे हविर्भाग का भोजन करनेवाले तुम्ही हो । वह भोजन देनेवाला ( अर्थात्, यज्ञकर्त्ता ) भी तुम्ही हो । तुम्हारे इन दो रूपो में रहने के तत्त्व को कौन जान सकता है ?

हे परात्पर ! जिस प्रकार स्थिर जलाशय में बुद्बुद उत्पन्न होकर मिटते रहते हैं, उसी प्रकार अनेक अंड तुमसे एक समान निकलते हैं और ( प्रलय-काल में ) तुममें विलीन हो जाते हैं। इस तत्त्व को कौन ठीक-ठीक समझ सकता है ?

क्या तुम्हारी लीलाओ को देखकर ही वेद प्रकाशित किये गये हैं ? या वेदो मे प्रतिपादित ढंग से तुम्ही अपने कार्य करते रहते हो ? तुमने मुझे ऐसा फल दिया है, जिसे पापकर्म करनेवाले लोग कभी प्राप्त नहीं कर सकते । न जाने, पूर्वजन्म में मैने क्या पुण्य किये थे ( जिससे यह भाग्य मुझे अब प्राप्त हुआ है ) ?

प्रेत के समान मेरे पापो के आश्रयभूत राक्षस-जन्म के दोषो को मिटाकर तुमने मुझे निर्दोष दिव्य जन्म प्रदान किया । मुझे दुःख-समुद्र के पार लगाया और तुम्हारे प्रति अज्ञान-जन्य मेरे विरोध को मिटा दिया । हे मेरे प्रभु ! श्वान-सदृश रहनेवाला मैने, न जाने कौन-सा बड़ा सुकृत किया था ?

इस प्रकार के मधुर वचन कहकर कबंध यह सोचकर कि यदि मै सारे भविष्य को स्पष्ट रूप से कह दूँ, तो वह देवताओ की इच्छा के अनुकूल नहीं होगा, माँ को देखकर प्रसन्न होनेवाले गाय के बछड़े के जैसे चुपचाप खड़ा रहा । तब धर्मनिष्ठ लोग जिनका साक्षात्कार प्राप्त करते हैं, उन प्रभु ( राम ) ने उसकी ओर देखा ।

फिर, राम ने अपने अनुज से पूछा—हे भाई ! यह अत्युज्ज्वल दुर्लभ देह धारण कर खड़ा रहनेवाला क्या वही है, जो अभी हमारे हाथों मरा था ? या नही तो, यह कोई दूसरा प्रभावशाली व्यक्ति है ? तुम इसे भली भाँति देखो । तब लक्ष्मण ने उस ( कबंध ) से प्रश्न किया कि तुम कौन हो ?

तब कवंध ने कहा—मनोहर आभरणो तथा पुष्पमालाओ से भूषित हे वीर ! मै दनु नामक एक गंधर्व हूँ । शाप के कारण मुझे यह राक्षस-जन्म मिला था । तुम दोनो के कर-कमल का स्पर्श पाकर मै अपने पूर्वरूप को प्राप्त कर सका । तुम मेरे पितामह-तुल्य¹ हो । मेरे वचन सुनो—

तुम दोनों शर-प्रयोग के लिए उपयुक्त धनुष को धारण करनेवाले हो । यद्यपि तुम्हारी सहायता करनेवाला कोई नही है, तथापि सीता का अन्वेषण करने के लिए तथा अन्य आवश्यक कार्य करने के लिए किसी सहायक का होना उत्तम होगा । जिस प्रकार बिना नाव के समुद्र को पार करना कठिन है, उसी प्रकार बिना सहायक के शत्रु-पक्ष का विनाश करना भी कठिन है ।

दोषरहित शिव के प्रताप के बारे में क्या कहें ? वह देव, पद्म में उत्पन्न ब्रह्मा के द्वारा बनाई हुई सारी सृष्टि का विनाश करनेवाला है, किन्तु वे भी अवार्य बलशाली भूतों को अपने साथी बनाकर रखते हैं । यह तुम जानते ही हो ।


१. कवंध के दुःख को दूर करने के कारण वह राम-लक्ष्मण को अपने पितामह-तुल्य समझता है । —अनु०