कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 434, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४२६ | कंब रामायणं |
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कर्त्तव्य कार्य क्या है ?—इसका भली भाँति विचार करना चाहिए। धर्म क्या है ?—इसका विचार रखना चाहिए। दुर्जनों को साथी न बनाकर सज्जनों को ही सहायक बनाना चाहिए। अतः, तुम दोनों उस शबरी के पास जाओ, जो सब प्राणियों के लिए माता के तुल्य है। उसके कथन के अनुसार चलकर ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचो।
वहाँ रहनेवाले सूर्य-पुत्र, स्वर्ण की कांतिवाले सुग्रीव से मित्रता कर लेना। उसकी सहायता से, दीर्घ बाँस-जैसे कंधोंवाली (सीता) का अन्वेषण करना उचित होगा। इस प्रकार कबन्ध ने कहा। शब्दायमान वीर-वलयधारी वीर (राम-लक्ष्मण) वैसे ही करने को सहमत हुए।
फिर, कबन्ध ने उन्हें प्रणाम किया और उनकी 'जय' बोलकर गगन-मार्ग से उड़कर चला गया। मनुवंश के उत्तम कुमार वे (राम-लक्ष्मण) भी दक्षिण दिशा में चलकर पर्वतों और अरण्यों को पार करते हुए गये। जब रात्रि का समय आया, तब मतंगमुनि के आश्रम में जा पहुँचे। (१-५८)
अध्याय १२
शबरी-मुक्ति पटल
सब अभीष्टों को प्रदान करनेवाले कल्पवृक्षों के सदृश दिव्य वृक्षों से परिपूर्ण सुगंधित वह (मतंगाश्रम का) उपवन उस स्वर्गलोक के समान था, जहाँ स्पृहणीय सुख ही रहते हैं, कोई दुःख नहीं रहता है, और जहाँ पुण्यकर्म करनेवाले लोग ही जाते हैं।
वे राम, जिनके मूलभूत कोई पदार्थ नहीं है, उस आश्रम में पहुँचे, जहाँ उन (राम) का ही ध्यान करती हुई तपस्या करनेवाली शबरी रहती थी। निकट पहुँचकर उन्होंने उससे प्रश्न किया—'सुख से रहती हो न ?'
उस समय, उस (शबरी) ने बड़ी भक्ति से उन (राम) की प्रस्तुति की। अपनी आँखों से अश्रु की धारा बहाते हुए कहा—'मेरा मायामय सांसारिक बंधन अब टूटा। चिरकाल से मैं जो तपस्या करती रही, उसका फल अब प्राप्त हुआ। मेरा जन्म (संकट) मिटा।' यह कहकर फिर उसने बड़े प्रेम से एकत्र कर रखे हुए फल-कंद आदि लाकर उन (राम-लक्ष्मण) को भोजन कराया। तब—
शबरी ने राम से कहा—'हे प्रभु ! शिव, कमलभव (ब्रह्मा), इंद्रादि देवता आनन्द के साथ यहाँ आये और मुझसे यह कहकर गये कि तुम्हारी पवित्र तपस्या की सिद्धि का काल आ गया है। और कुछ दिन यहीं रहो। जब रामचंद्र यहाँ आयेंगे, तब उनका सत्कार करके उसके पश्चात् हमारे लोको में आना।
हे मेरे प्रभु ! तुम यहाँ आनेवाले हो—यह समाचार पाकर मैं तुम्हारे दर्शन की