कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 442, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४३४ | कंब रामायण |
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कभी वियोग का अनुभव न किये हुए मुझ-जैसे को यदि कुछ सांत्वना दोगे, तो इससे क्या तुम्हारी कोई हानि होगी ?
हे सरोवर ! सुन्दर कमलो और सद्योविकसित सुवासित नीलोत्पलो को दिखाकर तूने घाव के जैसे जलनेवाले मेरे मन पर मलहम-सा लगा दिया। तुम (सीता के) नयनों तथा उसके वदन को दिखा रहे हो। क्या उसके रूप को एक बार भी नही दिखाओगे ? (जो अपने लिए संभव हो, उस वस्तु को) न देकर लोभ करनेवाले व्यक्ति अच्छे नही होते।
विकसित नील उत्पलों, रक्त कुमुदों, सुगंधित कोमल कमलों, 'वलै' (एक जल-लता) के पत्तों, तरंगो, मीनो, कछुओ तथा ऐसे ही अन्य पदार्थों को देखकर, रामचन्द्र उस सरोवर से कह उठे—हे सरोवर ! मै अमृत-समान उस (सीता) देवी के अवयवों को तुम्हारे अंतर में देख रहा हूँ। क्या विशाल आकाश में जब बलवान् राक्षस (सीता को) खाने लगा, तब उसके ये अवयव यहाँ गिर पड़े थे ?
दौड़ते और खेलते रहनेवाले हे मयूर ! तू उस (सीता) की छवि से पराजित होकर मन मसोसकर शत्रु के जैसे फिरता रहता था। क्या अब आनंदित हो रहा है ? उस (सीता) को खोजनेवाले मेरे (विकल) प्राणों को देखकर तू मन में उमंग से नाच रहा है ? तू सहस्र नेत्रवाला है। तुझे कुछ भी अज्ञात (अदृश्य) नही है (अर्थात्, तूने सीता के अपहरण को जान लिया होगा, इसीलिए तू आनन्द से नाच रहा है)।
हंस-मिथुनो ! यद्यपि तुम मेरे निकट नही आओगे, तथापि (सीता के संबंध में) कुछ कहो। क्या कुछ भी नही कहोगे ? मैने तुम्हारा कुछ अपकार नही किया है, तो क्या तुम मेरा अपकार करोगे ? कटि-रहित उस (सीता) ने ही तो तुम्हारी गति की सुन्दरता को परास्त किया था ? उससे (सीता से) तुम्हारा बैर है। किन्तु, मै तो तुम्हें देखकर आनदित हो रहा हूँ। तुम मुझपर क्यो कोप करते हो ?
सुनहले और सुरभित अंतर्दलों के मध्य मकरंद में रहनेवाले एवं मधुर गान करने-वाले भ्रमरो से शोभायमान हे कमल ! (सीता) देवी मेरे पार्श्व में नही हैं। वह (मुझसे) अन्यत्र रहनेवाली भी नहीं हैं। यदि तुम भी यह कह दो कि वह तुम्हारे पास नही है, तो तुम सत्य को छिपा रहे हों। यों सत्य को छिपानेवालों से मित्रता कैसे हो सकती है ?
सीता के मुख की समानता करते हुए भी कुछ भी न बोलकर सरोवर मे छिपे रहनेवाले रक्त कुमुद के पास पडी हुई हे रक्तजटे !¹ तुम मेरे सम्मुख आओ और अमृतवर्षी, अति सुन्दर बिंब-सदृश (सीता के) अधर को मुझे दिखाओ। उस अधर के अमृत-रस को तथा शीतल वचनों को मुझे दो।
हे जल-लता के पत्र ! तुम तो पुष्पलता-सदृश मुग्धा सीता के कान ही हो, और कुछ नही। अतः, मुझ दुःखी की सहायता करने में तुम्हें क्या आपत्ति है ? फिर भी, तुम जो स्वर्ण-कुंडल, वक्र ताटक और मुक्तामय झुमके को छोड़कर यहाँ आये हो (सीता के संबंध मे) कुछ न कहकर, क्यों वैर निकाल रहे हो ?
महावर-लगी उँगलियों से जिसके चरण ऐसे लगते थे, मानो पद्म से प्रवाल फूट
१. रक्तजटा, पानी में फैलनेवाली एक प्रकार की लता है, जो बहुत लाल होती है।—अनु०