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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 443

किष्किन्धाकाण्ड

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निकला हो, जो मेरे हृदय-रूपी कमल मे रहती है, जो काले बादल-जैसे और पुष्यो से भूषित केशोंवाली है, उस (सीता) के नयनों की समता करनेवाले हे मनोहर नीलोत्पल ! तू ऐसा हँसता है कि उससे विष-सा फैल जाता है । तू क्यों इस प्रकार मुझे सता रहा है ?

मन की वेदना से आह भरते हुए श्रीरामचन्द्र ने उस सरोवर के पुन्नाग-वृक्षों से पूर्ण तट पर खड़े होकर फिर कहा—हे निर्दय, कठोर सरोवर ! मै मिटा जा रहा हूँ, फिर भी तुम कुछ भी नही कहते ।—इस प्रकार वे अत्यंत पीडित हुए ।

प्रभूत करुणा के जन्मस्थान उन प्रभु ने देखा—काले भ्रमरों से घिरे हुए, मदजल बहानेवाले काले हाथी, मीठे पत्ते खानेवाली बड़ी हथिनियों के मुँह में (अपनी सूँड़ से) जल उठा-उठाकर भर रहे हैं। उस दृश्य को देखते हुए वे खड़े रहे ।

उस समय प्रेम नामक अपूर्व आभरण से सुशोभित अनुज (लक्ष्मण) ने प्रभु से कहा—दिन व्यतीत हो गया । अतः, हे आर्य ! इस सरोवर के दिव्य जल में स्नान करके, आप अपनी कीर्त्ति के समान ही सर्वत्र व्याप्त हुए भगवान् के चरणों की वंदना करें ।

राजा (श्रीराम) उस स्थान से बड़ी कठिनाई से हटे और तरंगों से भरे उस सरोवर के सुरभिपूर्ण जल में ऐसे स्नान करने लगे कि पर्वत-जैसे मत्तगज भी उन (राम) की शोभा को देखकर लज्जित हो गये ।

ज्योंही प्रभु उस जल में निमग्न हुए, त्योंही उनकी वियोगाग्नि की ज्वाला से वह जल ऐसा तप्त हो गया, जैसे लुहार ने खूब तपाये हुए लोहे को शीतल जल में डुबो दिया हो ।

हंस का रूप धारण कर (ब्रह्मा के प्रति) दुर्गम वेदों का उपदेश देनेवाले उन (विष्णु के अवतार, रामचन्द्र) ने स्नान करके अनादि वेदों में उक्त विधि से चक्रधारी (विष्णु) के प्रति अर्घ्य-प्रदान किया, फिर मुनियों से आवासित एक वन में जाकर ठहरे । उष्णकिरण (सूर्य) भी डूब गया ।

संध्या-रूपी स्त्री आ पहुँची । किन्तु, कंचुक से बद्ध स्तनवती (सीता) नही आई । उस देवी के वियोग में रहकर अनुपम नायक (राम) उसका स्मरण करके विकल हो रहे थे । तब शीतल जल से पूर्ण समुद्र से चन्द्रमा आकाश-मध्य यों उठ आया, मानो तप्तकिरण (सूर्य) ही हो ।

उस समय विविध कमल-पुष्प बंद हुए, पक्षी उद्यानों मे अपने-अपने नीड़ों में बंद हुए । मृग के कार्य-कलाप बंद हुए । वृक्षों के पत्ते बंद हुए । शुको का बोलना बंद हुआ । कलापियों के नृत्य बंद हुए । कोकिल के गान बंद हुए । हाथियों के गर्जन भी बंद हुए ।

धरती के प्राणी निद्रित हुए । पर्वत के प्राणी निद्रित हुए । स्वच्छ जल से भरे सरोवर निद्रित हुए । भूत भी पलक मूँदने लगे । किंतु, क्षीर-सागर में निद्रा करनेवाले दोनों हाथी¹ अपनी आँखें बंद न कर सके ।

विमल स्वरूप (राम) को दारुण वेदना से मुक्त करते हुए उष्णकिरण पुनः


१. राम और लक्ष्मण—दोनों, विष्णु के अंश माने जाते हैं। अतः, उन दोनों को क्षीरसागर में निद्रा करनेवाले हाथी कहा गया है।—अनु०