कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 441, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्धाकाण्ड ४३३
हंसिनी से इस प्रकार बिछुड़ गया था, जैसे शरीर प्राणो से अलग हो गया हो, देवांगनाओ के (जो वहाँ स्नान करने के लिए आई थी) नूपुरों के मधु-सदृश शब्द को कान लगाकर सुन रहा था ।
असंख्य पर्वतों से निर्झर के द्वारा बहाकर लाये गये सुगंधित अगरु, चंदन इत्यादि उस सरोवर में निमग्न रहते थे, जिससे वह (सरोवर) उस पात्र के समान था, जिसमें नगर-वासियो ने चंदन इत्यादि के सुगंध-रसों को भरकर रखा हो ।
उस सरोवर के मकर, हरिणनयना बालाओं के अधर की समता करनेवाले रक्त कुमुद के सुरभित मधु का पान करके (रमणियों का अधर) पान करनेवाले पुरुषो के जैसे ही मत्त हो उठते थे । करंड पक्षी (जलकौए), मानों जन्म-मरण की प्रक्रिया को दिखाने के लिए, अपनी चोचों में मीन को पकड़े हुए बार-बार जल में डुबकियाँ लगाते और बाहर निकलते थे ।
हंस, मानों यह सोचकर कि हम पुष्ट हाथी-सदृश श्रीरामचन्द्र को, सुरभित कमल में निवास करनेवाली लक्ष्मी (अर्थात्, सीता) को लाकर नही दे सके, अतः उनकी और कोई, अल्प ही सही, सेवा करें—इस खयाल से मनोहर पद-गति दिखा रहे थे (जिससे रामचन्द्र को सीता की पदगति का स्मरण हो आये) । वहाँ के नीलोत्पल (सीता के) नेत्रों की सुन्दरता को दिखा रहे थे और रक्त कुमुद (सीता के) अधर का दृश्य उपस्थित कर रहे थे ।
वहाँ के कुछ हंस (सरोवर के) तट की पुष्पित शालाओं पर बैठे थे । वे शाखाएँ ऐसी लगती थी, मानो उस सरोवर में अपने आभरणों की कांति को चारों ओर बिखेरती हुई नित्य स्नान करनेवाली देवांगनाओ की चोटियाँ उनके कृत्रिम-हंसों को अपने करों मे लिये हुए (उस सरोवर के) तट पर खड़ी हों ।
वहाँ, पद्मराग मणियो की कांति इस प्रकार व्याप्त हो रही थी कि एक ओर लगी हुई नीलमणियो की कांति उससे दब जाती थी, जिससे वहाँ रात्रिकाल मे भी दिन-जैसा प्रकाश व्याप्त रहता था । चक्रवाको के जोडे भी (उसे दिन समझकर) तरुणियों के स्तनद्वय के समान एक दूसरे से मिले रहते थे ।
बड़ी-बड़ी मछलियाँ, वेग से फेंके गये खड्ग के समान झपटती थी । क्रमशः उठ-उठकर बहनेवाली तरंगों में लुढक-लुढककर चलनेवाले जल-नकुल, उन नटो के जैसे लगते थे, जो (अपने पैरो में पायल बाँधकर) सुखरित गति के साथ नाचते हैं । दादुर (उन नृत्यों को देखकर) 'वाह-वाह !' कहते-से लगते थे ।
रामचन्द्र, उस विशाल जलमय सरोवर के निकट पहुँचे । वहाँ के बालहंस, कमल-पुष्प इत्यादि को देखकर वे कोमल पल्लव-तुल्य सीता देवी का स्मरण करके द्रवित मन हो उठे । उनका विवेक भी मंद पड़ गया, जिससे वे रो पडे ।
रेखाओ से युक्त सुन्दर पैरवाले चक्रवाको ! बालहंसो ! कभी मुझसे अलग न होनेवाली सीता मुझसे बिछुड़ गई है । अब वह (मेरे साथ) नही है । मै विरह से पीडित हूँ । अब तुम्हारे लिए कोई बाधा नही रही (अर्थात्, तुम मुझे सता सकते हो) । फिर भी, यदि तुम दुःखी प्राणों पर दया करोगे, तो वह तुम्हारे यश का ही कारण होगा ।