कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 440, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४३२ | कंब रामायण |
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वह सरोवर इतना गंभीर और इतना स्वच्छ जल से पूर्ण था कि (उसके संबंध में) यह कहा जा सकता है कि सूर्य के प्रतिस्पर्धी नागों का लोक यही है (अर्थात्, उसके जल की स्वच्छता के कारण पाताल तक दिखाई पड़ता था)। कल्पवृक्ष-सदृश तथा महा-कवियों के शब्दों के अर्थ के समान ही वह सरोवर, पाताल तक अत्यन्त स्वच्छता से परिपूर्ण था।
विशाल दलों से युक्त पुष्पों में विश्राम करनेवाले और अव्यक्त मधुर शब्द करने-वाले हंस आदि पक्षियों की ध्वनियों से युक्त वह सरोवर, नाना प्रकार की वस्तुओं से सम्पन्न किसी बडे नगर की पण्यवीथी की समता करता था।
उस सरोवर में सर्वत्र फैले हुए रक्तकमलों के मध्य जो हंस विचर रहे थे, वे ऐसे लगत थे, मानो यह सोचकर कि हम सुवासित कुंतलोंवाली सीता का पता नहीं लगा सके, इसलिए हम (रामचन्द्र का) मुख देखे बिना ही अपना प्राण त्याग कर देंगे, वे (हंस) अग्नि के मध्य कूद पड़े हों।
वह सरोवर इतना स्वच्छ था कि उसके अंतर्गत (रहनेवाले) मुक्ता आदि स्पष्ट दिखाई पड़ते थे। साथ-ही वह यत्र-तत्र सेंवार आदि के फैले रहने से मलिन भी दिखाई पड़ता था। वह उस ज्ञान के सदृश था, जो अविद्या के स्पर्श से कलंकित हो गया हो।
उस सरोवर में जो मीन थे, वे मानों यह सोचकर छिपे हुए थे कि दुःखी मनवाले श्रीरामचन्द्र यदि हमें देख लेंगे तो, वे साकार सतीत्व-जैसी और शुकमधुर-भाषिणी देवी (सीता) के नयनों (की छाया) को हम में देखकर, कभी अश्रु न बहानेवाले अपने नयनों में कहीं आँसू न भर लावें।
बाँसों में उत्पन्न मोतियों, मदजल बरसानेवाले मेघ-सदृश हाथियों के दंतों से उत्पन्न मोतियों, तथा अन्य रत्नों को लिये हुए पर्वत-निर्भर, आभरणों से भूषित वस्तु के जैसे होकर उस सरोवर में आकर गिरते थे। अतः, वह (सरोवर) कर्णाभरणों से शोभायमान वदनवाली सुन्दरियों की छवि की समता करता था।
उष्ण मदजल-बहानेवाले हाथी उस सरोवर में निमग्न होते थे, जिससे उसका जल पंकिल हो जाता था। अतः, वह (सरोवर) उन आभरण-भूषित वारनारियों की समता करता था जिनका शरीर, रात्रिकाल में मन्मथ-समर से श्रांत हो गया हो।
गगन-चुंबी पर्वतों से प्रवाहित मेघ-धाराएँ और हाथियों के, भ्रमरों को आकृष्ट करनेवाले सुरभित मदजल-प्रवाह, उस सरोवर में भर जाते थे, जिससे उस जल को पीनेवाले प्राणी भी मस्त हो जाने थे। इस कारण से वह (सरोवर) मनोहर केशोंवाली सुन्दरियों के बिंब-सदृश अधर की समता करता था।
आर्यवाणी (संस्कृत) आदि अठारहों भाषाएँ किसी एक अल्पज्ञ व्यक्ति को प्राप्त हो गई हों, (और शब्दायमान हो गई हों) इसी प्रकार उस सरोवर में विविध पक्षी निरंतर ऐसी विविध प्रकार की ध्वनियाँ करते रहते थे, जिन (ध्वनियों) को पृथक्-पृथक् पहचानना असंभव था।
एक हंस, जो प्राणों के समान ही उसका आलिंगन करके रहनेवाली अपनी