कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 419, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआरण्यकाण्डे ४११
के कारण था ? या उस (सीता) के मुख-रूपी चन्द्र के दर्शन न करने के कारण था ? हम उसका कारण नहीं कह सकते ।
स्त्री-रूप दीप के समान स्थित, अति रूपवती सीता के वियोग के कारण उत्पन्न अत्यधिक दुःख में राम ने अपने मन में क्या विचार किया—यह हम नहीं जानते, (हम इतना ही कह सकते हैं कि) उस पुष्प-स्वरूप राम के नयन भी निद्रा में मुकुलित न होकर उनके पुष्ट कंधोंवाले भाई (लक्ष्मण) के नयनों के जैसे ही (खुले) रहे^१ (अर्थात्, राम ने निद्रा नहीं की)।
जहाँ शीतल तथा मधुर मद मारुत-रूपी सर्प संचरण करता था, उस पर्वत के समीप में गगनतल को प्रकाशित करता हुआ उज्ज्वल चन्द्रमा इस प्रकार उदित हुआ कि रामचन्द्र ने मानो भ्रमरों से गुंजरित पुष्पमाला धारण करनेवाली सीता के वदन-बिंब को ही देखा हो।
उस रात्रिकाल में गर्व-भरा मन्मथ-रूपी चोर जब छिपकर अपना प्रभाव दिखाता था, संसार-भर में प्रकाशित होकर बढ़नेवाली चाँदनी की बाढ़ (राम को) इस प्रकार जलाने लगी, जैसे अंधकार-रूपी विष से युक्त सर्प के छेदवाले विष-दंत के भीतर का विष हो।
विष के समान फैलनेवाली उज्ज्वल चाँदनी वीर (राम) को पीड़ित कर रही थी। सीता के हरण से उत्पन्न अपमान की भावना उनके विवेक को हर रही थी, वे अन्य सब विचारों को छोड़कर केवल उन सीता के, जो सर्पफण-सदृश जघन तटवाली थी, दुग्ध-जैसी मीठी बोलीवाली थी और दीर्घ नेत्रवाली थी, अकेलेपन के बारे में ही सोच रहे थे।
राम ओठ चबाते, निःश्वास भरते, उनके कंधे फूलते और शिथिल होते। महान् गज के द्वारा तोड़ी गई, शीतल पल्लवों तथा पुष्पों से शोभायमान शाखा-सदृश सीता के बारे में सोचते।
समुद्र में उठनेवाली वीचियों के समान उनके निःश्वास उठ-उठकर गिरते थे। वे सोचते कि सीता यह सोचकर कि रामचन्द्र अपना धनुष झुकाये हुए आते ही होंगे, मार्ग के दोनों ओर देखती हुई गई होगी।
जब विद्युत्-जैसे खड्ग-दंतोंवाला रावण—'ठहरो!' 'ठहरो!' कहता हुआ सीता के निकट (उसे उठा ले जाने के लिए) गया होगा, तब सीता ने मेरा स्मरण नहीं किया होगा—यह कहना उचित नहीं है। (उसके स्मरण करने पर भी जब मैं उसकी रक्षा के लिए नहीं आया, तब न जाने मेरे बारे में उसने क्या सोचा होगा।)
विष-दंतों से युक्त (राहु नामक) सर्प के मुँह में पड़े चन्द्र के समान कांतिहीन सीता, क्रूर राक्षस के क्रोध से भयभीत हुई होगी। हाय! यों सोचते।
अपमान और विरह-ताप—इन दोनों से व्याकुल होनेवाले उनके प्राण इन दोनों के मध्य रहकर इनके द्वारा बारी-बारी से सताये जा रहे थे, जिससे दुःखी हो रामचन्द्र सोचते—क्या अब भी मुझे धनुष की आवश्यकता है?
सनातन वेदों के पारंगत सब पंडितों के द्वारा देखे जानेवाले राम अपने धनुष को
^१ इसके पूर्व अयोध्याकांड में यह कहा गया है कि लक्ष्मण वनवास के समय, कभी नहीं सोते थे, किंतु रात-दिन जागरित रहकर राम की परिचर्या में निरत रहते थे।—अनु०