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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 420, कुल 549 में से

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पृष्ठ 420

४१२ | कंब रामायण

देखकर हँसते, तथा संसार में, प्राप्त होनेवाले अपने अपयश को सोचकर स्तब्ध रह जाते।

वे (राम) हाथी के जैसे बड़े शब्द के साथ निःश्वास भरते। शीतल पवन-रूपी क्रूर यम को देखकर कहते—हाय ! वेदोक्त विधान से मेरे द्वारा परिणीत सीता मुझसे वियुक्त हो गई।

मैंने अनेक प्राणियों की रक्षा करने का व्रत लिया है। किन्तु, आभरणों से भूषित मेरी पत्नी बनी हुई एक कुलीन नारी की विपदा को मैं दूर नहीं कर सका। मेरा पराक्रम भी खूब है। इस प्रकार सोचकर राम लज्जित होते।

उसका मन व्याकुल होता, उसके ओंठ सूख जाते, वे मूर्च्छित होते। अनुज के द्वारा निर्मित शीतल पल्लव-शय्या पर लेट जाते। उनके शरीर-ताप से वे पल्लव झुलस जाते, तो (राम) अपने अनुज से कहते कि ये पत्ते हटा दो। फिर (लक्ष्मण के द्वारा लाये गये) नये तथा अरुण पल्लवों को देखते। किंतु, उनके शरीर-स्पर्श से वे नये पल्लव भी झुलस जाते, तो व्याकुल-प्राण हो वे थक जाते।

वे राम, जिनके कमल-समान नयनों के झँपने के एक क्षण काल में अनेक युग व्यतीत होते थे (अर्थात्, जो विष्णु के अवतार थे) इस समय वहाँ रहकर उस रात्रि का कुछ अन्त नहीं देख पाते थे। इसका कारण सीता का वियोग था या (सीता के प्रति) उनके प्रेम की अधिकता थी, यह हम (लेखक) नहीं जानते।

विजय के कारणभूत भाले को रखनेवाले अपने भाई को देखकर, वे (राम) कहते—तुमने देखा है न कि इसके पहले, सभी दिन एक ही जैसे व्यतीत होते थे। किन्तु, आज यह रात्रि क्यों इतनी दीर्घ हो रही है?

दीर्घ लगनेवाले रात्रिकाल में प्रकाशमान चन्द्र को देखकर वे कहते—हे चन्द्र! पहले तुम प्रतिदिन आते और (सीता के मुख की समता न कर सकने के कारण) क्षीण होकर लज्जित होते रहते थे। अब आभरण-भूषित सीता के उज्ज्वल वदन के दूर हो जाने पर तुम पूर्ण प्रकाश से चमक रहे हो।

राम फिर कहते—गगन में संचरण करनेवाला एक चक्र रथ से युक्त सूर्य भगवान्, प्रसूत चन्द्रिका के सदृश उज्ज्वल कीर्त्ति से सम्पन्न अपने कुल में अवारणीय अपयश के आ जाने से मानो लज्जित होकर ही भूलोक से अदृश्य हो गये हैं।

दुःखद रात्रि के दीर्घ लगने से शिथिल होनेवाले राम सोचते, कदाचित् क्रूर रावण ने सूर्य के सारथि अरुण के साथ सूर्य को भी बाँधकर बड़े कारागार में डाल रखा है (इसलिए दिन नहीं हो रहा है)।

राम सोचते—यदि डमरू-समान कटिवाली सीता नहीं दिखाई पड़े और घोर अंधकार से पूर्ण रात्रि-रूपी कल्पकाल भी यों ही व्यतीत हो जाये, तो समुद्र से घिरी हुई यह धरती मेरे हाथों विनष्ट हो जायगी।

राम कहते—कठोर तपस्या करनेवाले मुनिगण विपदा में पड़े रहें और उन (मुनियों) के प्राणों को पीड़ित करके संसार के प्राणियों को खाकर विचरनेवाले अधर्मी राक्षस बलवान् होकर जीवित रहे, तो अब धर्म से क्या प्रयोजन है?