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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 421

अरण्यकाण्ड ४१३

भ्रमरो की दिव्य डोरी से युक्त धनुष मे पुष्प-शरो को रखकर प्रयुक्त करनेवाले वीर मन्मथ ने राम पर वाण प्रयुक्त करने के लिए लक्ष्य-संधान किया। तव रामचन्द्र कर्तव्य-मूढ होकर स्तब्ध रह गये।

जब कोई दुःखी व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है, तब उसे उसके पुराने दुःख का स्मरण अधिक सताने लगता है। उसी प्रकार मन्मथ, जो इनके पहले एक बार तपस्वी शिव के क्रोध से जल गया था, अब उसका स्मरण करके दुःखी हुआ। (भाव यह है कि अपने बाणों से भीत होकर संतप्त होनेवाले राम को देखने से मन्मथ को शिवजी के द्वारा उसको उत्पन्न पुराना दुःख स्मरण हो आया, जिससे अव वह दुःखी हुआ।)

इस प्रकार, नीलवर्ण रामचन्द्र के मन में (वियोग-दुःख) शूल-सा साल रहा था। इस समय वह रात्रिकाल ऐसे ही समाप्त हुआ, जैसे आदिकारणभूत भगवान् (नारायण) के नाभि-कमल से उत्पन्न ब्रह्मा का एक कल्प समाप्त हुआ हो।

जल-धारा से शब्दायमान क्षीरसागर में सुखमय योग-निद्रा करना छोड़कर, भ्रमरो तथा मधु से शब्दायमान पुष्पमाला से भूषित सीता के शील-रूपी समुद्र मे निमग्न होनेवाले राम को देखकर सहानुभूति से पक्षी शब्द करते थे, कानन शब्द करते थे और पर्वत-निर्झर शब्द करते थे। राम के मन मे (सीता का) अलंकृत रूप प्रकट था। किन्तु, नयनो के सम्मुख प्रकट नही था। अतः, उन (राम) के प्राणों के स्वस्थ रहने का क्या उपाय हो सकता था ?

मयूर और मयूरी साथ-साथ संचरण करते थे। हरिण और हरिणी साथ-साथ विहार करते थे। करी और करिणी साथ-साथ घूमते-फिरते क्रीडा करते थे। इन सबको देखकर, रामचन्द्र, जो पिक, इक्षु, मधु, मुरली-वीणा, गाढ़ी चाशनी, अमृत आदि को भी फीका करनेवाली मीठी वाणी से युक्त सीता से वियुक्त थे, क्या दुःखी न होगे ?

किरणों से युक्त सूर्य, किरीट-जैसे शिखरवाले उदयगिरि पर अत्युज्ज्वल रूप मे ऐसे प्रकाशमान हुआ, मानो प्रभात होने पर भी सीता के दर्शन न पाने से दुःखी रहनेवाले वीर रामचन्द्र को उस समय कमल-पुष्पों को प्रफुल्ल कर यह दिखाना चाहता हो कि पहले दिन की संध्या को जिन कमलो को मैने वन्द किया था, उनमें सीता नही है।

रामचन्द्र वहाँ के वन को देखते। उस वन में स्थित चक्रवाक को देखते। वृक्ष की पुष्पित शाखाओं को देखते। बाल कलापी-तुल्य सीता के केशपाश का स्मरण करते। पर्वत सदृश स्तन-द्वय को याद करते। उनपर की पत्रलेखा को याद करते और फिर अपनी भुजाओ को देखते। यों अपना समय व्यतीत करते।

उस समय, अनुज (लक्ष्मण) ने उनके चरणों को नमस्कार करके कहा—हे प्रभु। देवी का अन्वेषण किये बिना यहाँ इस प्रकार विलंब करना क्या उचित है ? तब कीर्त्तिमान् प्रभु ने उत्तर दिया—उस रावण के स्थान को ढूँटकर पहचानेंगे। फिर, उज्ज्वल धनुष से युक्त वे दोनों पर्वत-श्रेणी से युक्त तथा धूप से तप्त उस कानन मे चल पड़े।

दिग्गजों के समान वे दोनों हरियाली से युक्त अनेक अरण्यों को पीछे छोड़कर अठ्ठारह योजन दूरी पार कर चले।