कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 418, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें४१० | कंब रामायण
समृद्ध शास्त्रों के तत्त्वों और मंत्रों को जाननेवाले राम ने (जटायु की देह पर) जल, चंदन और पुष्प डाले। अपने दोनों हाथों से उसे चिता पर रखा। फिर, चिता के' सिरहाने से अग्नि प्रज्वलित की एवं अन्य सब संस्कार पूर्ण किये।
राक्षसों के प्रति क्रोध करने से राम का दुःख किंचित् शान्त हुआ। उनके पुष्ट तथा शुक के-से रंगवाले श्यामल शरीर पर उनके नेत्रों से इस प्रकार अश्रु झड़ पड़े, जिस प्रकार प्रफुल्ल कमल से मधु-बिन्दु गिरते हैं। यों मेघ-समान उन (राम) ने नदी में स्नान किया और अंजलि में स्वच्छ जल लेकर जटायु को तिलांजलि अर्पित की।
राम के द्वारा अर्पित उस जलांजलि से ब्रह्मा से लेकर उच्च तथा नीच सब प्राणि-जात, अत्यत तृप्त हुए। गृध्रराज को उद्दिष्ट करके प्रभु ने अपनी अंजलि से जो स्वच्छ जल अर्पित किया, वह स्वयं भगवान् के लिए भी पीने योग्य बन गया। अब उस जल-तर्पण के बारे में और क्या कहा जाय ?
विजयशील चक्रवर्ती कुमार (राम) ने सब संस्कार वेदोक्त प्रकार से संपन्न किये। उस समय सूर्य पश्चिमी समुद्र में जा पहुँचा, मानो वह अपने कुल से सम्बन्ध रखने-वाले जटायु की मृत्यु से उत्पन्न शोक से जल में स्नान करने और सद्गति देनेवाले संस्कार करने को जा रहा हो। (१-१५०)
अध्याय १०
अयोमुखी पटल
जब संध्या हो रही थी तब वे (राम-लक्ष्मण) उस स्थान से चलकर उस वन में स्थित एक पर्वत पर जाकर ठहरे, जिस पर्वत के शिखर पर हाथी और मेघ विश्राम करते थे। इतने में अत्यन्त दुःख का कारणभूत अंधकार इस प्रकार फैला, जैसे इंद्र के वश में न होने-वाले राक्षस सर्वत्र फैल गये हों।
उस रात्रिकाल में, जब वन्य वृक्षों तथा पर्वतों से मधु और जल की धाराएँ इस प्रकार बह रही थी, मानो (राम-लक्ष्मण के दुःख से) शोकाकुल होकर वे आँसू बहा रहे हों, राम और लक्ष्मण के मन में अभिमान, क्रोध, दुःख तथा ज्ञान—ये सब परस्पर संघर्ष करने लगे।
उस रात्रिकाल में, जो तत्त्वज्ञान से रहित बुद्धि को पापमार्ग में चलानेवाले असत्य जन्म के जैसे ही उत्तरोत्तर बढ़ रहा था, उन (राम और लक्ष्मण) का निःश्वास घी के पड़ने पर भड़की हुई आग के समान बढ़ रहा था। तब उनके शोक का कहीं कुछ अन्त नहीं था।
मधुयुक्त पुष्पमाला से भूषित राम के नयन-रूपी अरुण-कमल रात्रि के समय में भी मुकुलित नहीं हुए। वह क्या मनोहर मदहास से शोभित सीता नामक लक्ष्मी के वियोग