कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 417, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीअरण्यकांड ४०६
देवताओ के मनोरथ को पूर्ण करो। अपने सब कर्त्तव्यो को वेदोक्त विधान से संपन्न करो और संसार के पापो को दूर करो। इस प्रकार, भगवान् के चरण-कमलो को प्राप्त होनेवाले जटायु ने कहा।
मेघ-जैसे श्यामल (राम) ने उस पुण्यवान् (जटायु) की बात को दशरथ की ही आज्ञा मानकर स्वीकार किया और यह विचार कर कि दूसरो पर क्रोध करने से अब क्या प्रयोजन है, राक्षसो के कुल का नाश करना ही प्रस्तुत कर्त्तव्य है, अपने मन के क्रोध को शान्त कर लिया।
फिर, उस अमल (राम) ने जटायु से कहा—तुमने मुझे शान्त रहने की जो आज्ञा दी है, उसके अतिरिक्त मेरे लिए अन्य कोई कर्त्तव्य नही है। अब बताओ कि वह राक्षस (रावण) किस दिशा में गया? किन्तु, इतने में वह गृध्रराज शिथिल हो गया। उसकी प्रज्ञा मिट गई। कुछ उत्तर नही दे पाया और धीरे-धीरे उसके प्राण निकल गये।
वह जटायु (अपनी अंतिम घड़ी मे) उस भगवान् (राम) के चरणो के दर्शन कर सका, जो भगवान् शीतल कमल से उत्पन्न ब्रह्मा के लिए क्या, स्वयं वेदो के लिए भी अज्ञेय हैं। अतः, वह उस (वैकुंठ) लोक में जा पहुँचा, जो पञ्चभूतो को भी मिटा देनेवाले महाप्रलय में भी नही मिटता।
जब जटायु मुक्ति पा गया, तब राम और उनके अनुज शोक-मग्न हुए। वन के वृक्ष, मृग, पक्षी और पत्थर भी पिघल उठे। ब्रह्मा आदि देवता, नाग तथा भूलोकवासी अपने शिर पर हाथ जोड़कर नमस्कार करते हुए खड़े रहे।
उस समय, राम ने अपने अनुज से कहा—भाई धर्महीन राक्षस से मेरा पौरुष परास्त हुआ। क्या अब संन्यास लेकर तपस्या करूँ? या प्राण छोड़ दूँ? बताओ। मुझे पुत्र के रूप मे पाकर पिता मर गये। ऐसा जन्म पाकर मै अबतक मरा नही। मै क्या करूँ?
राम के इस प्रकार कहने पर लक्ष्मण ने उन्हे प्रणाम करके उत्तर दिया—हे विजयशील! विधि के परिणाम से ऐसी विपदाएँ होती हैं। अब उनको सोचकर दुःखी होने से क्या प्रयोजन है? उन क्रूर राक्षसो का समूल विनाश करना पहला कर्त्तव्य है। उसके पश्चात् (जटायु की मृत्यु आदि विपदाओ का स्मरण कर) दुःख कर सकते हैं (अर्थात्, यह दुःख करने का समय नही, वरन् शत्रु-नाश करने का है)।
हे मेरे प्रभु! विरक्त होकर आप सुन्दर कुंतलोवाली देवी को खोकर भी शांति के साथ रह सकते हैं, तो रहे। किन्तु, हमारे पितृ-तुल्य (जटायु) को मारनेवाले राक्षस को मारे बिना आप किस प्रकार तपस्या-निरत रह सकते हैं?
अनुज के वचनो से किंचित् स्वस्थ होकर सर्वज्ञ राम ने यह सोचकर कि इस प्रकार दुःख-मग्न होना अज्ञता है, अपनी व्याकुलता तथा अश्रुओ को भी दूर करके कहा—हे भाई! मरे हुए पितृ-तुल्य जटायु की अंतिम क्रिया यथाविधि संपन्न करें।
उन्होने काले अगरु-काष्ठो के साथ चंदन-काष्ठो को सजाकर उनपर दर्भों को बिछाया। फिर पुष्प बिखेरे। मिट्टी की वेदी बनाकर उसपर स्वच्छ जल को रखा। फिर, राम जटायु की देह को अपने विशाल हाथो से उठाकर लाये।