कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 416, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें४०८ कंब रामायण
उठने लगी। एक ज्वलन्त अट्टहास भयंकर शब्द कर उठा (अर्थात्, रामचन्द्र वीरता के आवेश में ठठाकर हँस पडे)। फिर वे कहने लगे—
एक अज्ञ राक्षस एक निस्सहाय स्त्री को उठाकर ले गया और तुम्हारी ऐसी दशा हुई। तो भी अष्ट दिशाओं में स्थित ये सब लोक विचलित हुए बिना अबतक स्थिर खड़े हैं। देवता लोग अत्याचार को देखते हुए चुपचाप खड़े रहें। देखो, अभी मै इन सबको विध्वस्त कर डालता हूँ।
अभी तुम देखोगे कि सब नक्षत्र टूटकर गिरते हैं। अनुपम किरणवाला सूर्य चूर-चूर हो जाता है। विशाल आकाश में सर्वत्र आग लग जाती है। जल, पृथ्वी, अग्नि, आकाश और पवन एव सब चराचर वस्तुजाल समूल विनष्ट हो जाते हैं और देवता लोग मिट जाते हैं—(यह सब तुम अभी देखोगे)।
तुम यह भी देखोगे कि किस प्रकार स्थित रहनेवाले तथा महान् लगनेवाले ये चतुर्दश लोक एक क्षण में मिट जाते हैं। अष्ट दिशाओं की सीमा में स्थित तथा ब्रह्मांड के बाहर स्थित पदार्थ ही एक क्षण में जलकर भस्म हो जाते हैं—यह सारा दृश्य तुम अब देखनेवाले हो। इस प्रकार राम ने क्रोध के साथ कहा।
उष्ण किरणवाला सूर्य (राम के क्रोध से) बचने का प्रयत्न करता हुआ मेरु पर्वत के शिखरों में जा छिपा। अष्ट दिशाओं में स्थित महान् गज भय से भाग गये। अब क्या यह कहना आवश्यक है कि संसार के सब प्राणी भय से विह्वल हो गये? अत्यन्त धीर चित्तवाला लक्ष्मण भी (राम का क्रोध देखकर) भय से काँपने लगा, तो अन्य लोगों के भय की क्या कोई सीमा हो सकती थी?
जब इस प्रकार घट रहा था, तब गृध्रराज (जटायु) ने कहा—हे उत्तम गुणवाले! तुम जीवित रहो, किंचित् भी क्रोध मत करो। कठोर प्रतापयुक्त हे वीर, देव और मुनि यह विचार कर कि तुम्हारे कारण (राक्षसों पर) उनकी विजय होगी, आनन्दित हैं। वे अन्य किस बल से रावण को पराजित कर सकते हैं?
कमलभव ब्रह्मा से प्राप्त वर के प्रभाव से रावण ने मुझपर जो वीरता दिखाई, इसे प्रत्यक्ष तुम देख रहे हो। अब इसके बारे में (अर्थात्, रावण के पराक्रम के सम्बन्ध में) और क्या कहना है? कमल में उत्पन्न ब्रह्मा से लेकर सब देवता उस दशमुख की सेवकाई करते हैं, न कि धर्म की रक्षा। उसकी रक्षा करनेवाला कौन है?
समुद्र से घिरी धरती पर रहनेवाले सब लोग स्त्रियों के समान उस शत्रु (रावण) की सेवकाई करते रहते हैं। देवताओं की यह दशा है। यदि क्षीरसागर के मंथन के समय उन देवताओं ने अमृत नही पिया होता, तो उनके प्राण कभी के मिट गये होते।
दृढ़ शरासन को अपने सुन्दर करों में धारण करनेवाले हे वीरो! कंचुक में बँधे स्तनोंवाली लता-तुल्य उस देवी को एकाकी छोड़कर सींगवाले हरिण के पीछे जाकर तुम इस प्रकार के अपयश के भाजन हो गये। विचार कर देखने पर विदित होगा कि यह अपराध तुम्हारा ही है। संसार के लोगों का नहीं।
अतः, तुम क्रोध मत करो। अरुंधती-समान उस पतिव्रता की विपदा को दूर करो।