कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 415, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरण्यकाण्डं ४०७
फुफकार भरनेवाले घोर सर्प (राहु और केतु) गगन में उष्ण किरणों को प्रसारित करनेवाले (सूर्य) को निगलकर फिर उगल देते हैं। विशाल धरती के अंधकार को दूर करके उसे प्रकाशित करनेवाला चंद्रमा घटता-बढ़ता रहता है।
हे सुन्दर कंधोंवाले! विपदाओं का आना और जाना प्रारब्ध कर्म का परिणाम है। ज्ञानवान् देवगुरु (बृहस्पति) के शाप-वचन से देवेंद्र¹ को जो विपदाएँ उठानी पड़ीं, क्या उन्हें कोई गिन सकता है?
हे धनुर्विद्या में चतुर वीर! जब अवार्य पराक्रमशाली शंबर नामक असुर के अत्याचारों से वज्रधारी इंद्र पराजित हुआ था; तब तुम्हारे पिता ने अपने पुष्ट कंधों के प्रभाव से उस असुर को मारा था।
(गीध, चील आदि) पक्षियों और ज्ञान-रहित भूतों के लिए मातृ-तुल्य, मांसगंध से युक्त माला धारण करनेवाला (अर्थात्, राक्षसों को युद्ध में मारकर उनके मांस का भोजन भूतों तथा पक्षियों को देनेवाला) उपेक्षित धर्म एवं देवताओं की विपदा ने तुम्हें मधुर बोलीवाली सीता से विलग किया है, अतः माया-युद्ध करनेवाले राक्षस नामक काँटेदार झाड़ियों को उखाड़कर तुम जियो।
आम के टिकोरे के जैसे सुन्दर नयनोंवाली तथा दीर्घ केशपाशवाली (सीता) को रावण भूखंड-सहित उठाकर ले जा रहा था। तब मैंने अपनी शक्ति-भर उसे रोका, किंतु उसने तपस्या के प्रभाव से प्राप्त करवाळ से मुझे आहत कर दिया, जिससे मैं यों गिरा हूँ। आज ही यह घटना घटी है।—इस प्रकार जटायु ने कहा।
जटायु के कहे ये वचन कानों में प्रवेश करें, इसके पूर्व ही रामचन्द्र के अरुण नयन अग्नि उगलने लगे। उनके निःश्वास से चिनगारियाँ बिखरीं। भौंहें ऊपर जा चढ़ीं। (उनके ऐसे क्रोध से) ज्योतिष्पिंड (सूर्य, चन्द्र आदि) भयभीत होकर भाग गये। ब्रह्मांड में अनेक स्थानों पर दरारें पड़ गईं। पर्वत दह गये।
धरती घूम उठी। ऊँचे पर्वत घूम उठे। विशाल समुद्र जल, पवन और सूर्य-चन्द्र घूम उठे। ऊपर के लोक में स्थित ब्रह्मा घूम उठा। तब यह सत्य स्पष्ट हुआ कि वह वीर (राम) ही सब प्रकार के पदार्थ हैं (अर्थात्, सृष्टि के सब पदार्थ उस राम के ही अनेक रूप हैं)।
यह सोचते हुए कि रामचन्द्र अपना क्रोध न जाने, किस पर उतारेंगे, सकल लोक भय से काँप उठे। उस समय लाल अग्नि ज्वालाएँ चिनगारियों तथा धुएँ के साथ सर्वत्र
१. पुराणों में यह कथा प्रसिद्ध है कि एक बार देवेंद्र ने अपनी संपत्ति से गर्विष्ठ होकर अपने गुरु बृहस्पति का निरादर किया, जिसपर क्रुद्ध होकर बृहस्पति कहीं अदृश्य हो गये। गुरु के न रहने से इन्द्र त्वष्टा के पुत्र विश्व-रूप को गुरु बनाकर स्वर्ग का शासन करने लगा। विश्व-रूप ने असुरों के प्रति प्रेम दिखाकर उन्हें यज्ञों में हविर्भाग दिया, तो उसपर क्रुद्ध होकर इंद्र ने उन्हें मार डाला। तब त्वष्टा ने यज्ञ से वृत्र को उत्पन्न करके इंद्र के विरुद्ध भेजा। उसके साथ युद्ध में इंद्र ने अनेक कष्ट उठाये। पश्चात् दधीचि महर्षि की अस्थि का शस्त्र बनाकर उसे मारा। किन्तु, ब्रह्महत्या के कारण इंद्र को अनेक वर्ष तक राज्यभ्रष्ट होकर कष्ट भोगने पड़े। इस पद्य में उसी कथा की ओर संकेत है। —अनु०