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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 414, कुल 549 में से

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पृष्ठ 414
४०६कंब रामायण

अब मेरे समान यशस्वी ( इस संसार मे ) और कौन है ? हे दृढ पंखोवाले ! असंख्य दाँतोवाले ! पुरातन पाप से युक्त मेरी पत्नी के देखते हुए, शस्त्रधारी शत्रु ने तुमको मार दिया और चला गया । मै धनुष हाथ मे रखकर व्यर्थ ही जीवित हूँ । अहो, मेरी वीरता भी कैसी है !

अपना उपमान न रखनेवाले रामचन्द्र इस प्रकार के अनेक वचन कहकर अश्रु बहाते रहे और मूर्च्छित हो गये। अनुज ( लक्ष्मण ) की भी वैसी ही दशा हो गई । तब गृध्र-राज कुछ-कुछ प्रज्ञा पाकर बड़ी कठिनाई से साँस लेने लगा और आँखें खोलकर उन दोनों को देखा ।

( सीता की क्या दशा हुई ) यह वृत्तांत कुछ न जाननेवाले. व्याकुल प्राणो के साथ उष्ण श्वास भरनेवाले जटायु ने उन विजयी वीरों को देखा । उससे उसका मन ऐसा आनंदित हुआ, जैसे उसके कटे हुए पक्ष, प्रिय प्राण और सत लोक भी उसे प्राप्त हो गये हो। उसने ऐसा सोचा कि मैंने शत्रु को ही जीतकर उससे प्रतिशोध लिया है।

फिर जटायु ने कहा— हे पुण्यात्माओ ! मैं अब अपने इस निष्प्रयोजन तथा अपयश के भाजन शरीर को त्याग रहा हूँ । सौभाग्य से ही इस समय तुम दोनो को देख सका हूँ । मेरे निकट आओ । फिर, रावण के किरीटधारी शिरो पर चोट मार-मारकर छिन्न हुई अपनी चोंच से उनके शिरों को बारी-बारी से कई बार सूँघा ।

मेरे मन ने पहले ही कहा था कि उस ( रावण ) का यहाँ आगमन माया से हुआ है । ( अर्थात्, वह माया से तुमको धोखा देकर ही वहाँ आया ) । फिर भी, अक्षुण्ण पराक्रम से युक्त तुम दोनों, मधुर बोलीवाली उस अरुंधती को (अर्थात्, अरुंधती-तुल्य पतिव्रता सीता को) अकेली ही छोड़कर कैसे चले गये ?

उसके यह कहते ही कनिष्ठ ( लक्ष्मण ) ने मायामृग के आने से लेकर सारी घटनाओ को कह सुनाया ।

रामचन्द्र की आज्ञा से वीर लक्ष्मण ने जब सब कह सुनाया, तब गृध्रराज ने सब सुनकर और यह विचार करके कि राम-लक्ष्मण को उनके दुःख में कुछ सांत्वना देना आवश्यक है, इस प्रकार के वचन कहे—

इस निंदनीय जीवन के सुख-दुःख विधि के वशीभूत हैं। कोई उनमें कुछ परिवर्त्तन नही कर सकता । इस तत्त्व को हमें मानना पड़ेगा। यदि इसे नही मानेंगे, तो क्या अपनी बुद्धि के बल से विधि के विधान को मिटा सकेंगे ?

जब विधिवश विपदा उत्पन्न होती है, तब मन की धीरता का त्याग कर व्याकुल होना अज्ञता है । जिस नियति ने सारी सृष्टि के कर्त्ता के सिर को काटा था; उसके लिए असाध्य कार्य कुछ नहीं है ।

जब सुख या दुःख उत्पन्न हो, तब यह कहना कि इसको हम रोक सकते हैं, असत्य वचन होगा ( अर्थात्, कर्मफल से प्राप्त सुख को कोई रोक नहीं सकता ) । त्रिपुरों को जलाने के लिए जिस ( शिव ) ने शर का प्रयोग किया था, उसने कपाल में भिक्षा माँगकर खाते हुए तपस्या की थी । क्या यह उनके लिए योग्य था ?