कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 399, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरण्यकाण्ड ३६१
स्वर्गलोक को छोड़कर (उसकी लंका में) आ गई हैं और (उसकी सेवा में रहकर) उसके पानदान उठाना, (उसके) पैर सहलाना, उसकी पादरक्षा लाना इत्यादिकार्य करती रहती हैं।
चन्द्रमा और सूर्य, उसके मन को देखकर (उसके अनुसार) संचरण करते हैं। दिव्यकांति से युक्त इन्द्र आदि देवता, इस लोक में स्थित उसके मेघस्पर्शी प्रासाद की रख-वाली करते हैं।
इस धरती पर स्थित उसकी उस लंकापुरी में, जो स्वर्णमय अमरावती, मनोहर नागलोक की राजधानी और इस विशाल भूलोक के सब नगरों से बढ़कर सुन्दर है, रहने-वाली सब वस्तुएँ दोषरहित हैं।
कमलभव (ब्रह्मा) के द्वारा दिये गये वर के प्रभाव से वह अनन्त आयुवाला है। वह अपने विशाल कर में, अर्धाङ्ग में अपनी स्त्री को धारण करनेवाले (शिवजी) के द्वारा प्रदत्त करवाल रखता है। उसने सब ग्रहों को कारागार में बन्दी बना रखा है। वह सब गुणों में महान् है।
वह क्रूरता से रहित सदाचरणवाला है। विस्तृत शास्त्र-ज्ञान से युक्त है। तटस्थ स्वभाववाला है (अर्थात्, पक्षपात से हीन बुद्धिवाला है)। उसका यौवन ऐसा है कि उसे देखकर मन्मथ भी (आश्चर्य में) स्तब्ध रह जायें। सब लोकों के निवासी जिन त्रिदेवों को अपने देवता मानते हैं, उन (त्रिमूर्तियों) की समस्त शक्ति से वह संपन्न है।
सब लोकों में रहनेवाली असंख्य सुन्दरियाँ उसकी कृपा को प्राप्त करने की लालसा रखती हैं। उसका ध्यान करती हुई वे सुन्दरियाँ कृश होती रहती हैं। तो भी वह उन सब की उपेक्षा करके अपने हृदय को सुख करनेवाली एक रमणी को खोज रहा है।
इस प्रकार के पुरुष द्वारा शासित उस वैभव-पूर्ण नगरी में कुछ दिन निवास करने की इच्छा से मैं वहाँ गया। दीर्घकाल तक वहीं रह गया। अब उस (पुरुष) से दूर होने की इच्छा न होते हुए भी किसी-न-किसी प्रकार वहाँ से चलकर इस स्थान में आया हूँ।—यों उस मायावी ने कहा।
तब सीता ने उस कपट-संन्यासी से पूछा—अपने शरीर को भी भार माननेवाले हे मुनि श्रेष्ठ ! वेदों तथा उन वेदों के ज्ञाताओं की कृपा की कामना न करके, लालच के साथ प्राणियों को खानेवाले उन क्रूरकर्मा राक्षसों के नगर में जाकर आप क्यों रहे?
अरण्य में स्थित महातपस्वियों के समीप जाकर आप नहीं रहे; जल-संपत्ति से परिपूर्ण देशों में निवास करनेवाले पवित्र स्वभाववालों के ग्रामों में जाकर भी आप नहीं रहे। किन्तु, धर्म का स्मरण तक नहीं करनेवाले राक्षसों के मध्य जाकर रहे। यह आपने क्या किया?—इस प्रकार सीता ने कहा।
उस मर्यादाहीन (अर्थात्, धर्म की मर्यादा से परे रहनेवाले) ने यौवनवती देवी के कथन को सुना और उनकी निष्कपटता को देखा, जो यह कहते हुए भी कि वे राक्षस कठोर नेत्रवाले और भयङ्कर खड्गवाले हैं—भयविह्वल हो रही थीं। फिर, यों उत्तर दिया—हे चन्द्रमुखि ! राक्षस देवताओं के समान क्रूर नहीं हैं। हम जैसे व्यक्तियों के लिए वे अच्छे ही हैं।