कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 398, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३६० | कंब रामायण |
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सीता ने उसका स्वागत करके एक वेत्रासन डालकर उसपर आसीन होने को कहा। तब अपने बड़े त्रिदंड को पार्श्व में रखकर वह कपटी सन्यासी उस सुन्दर पर्णशाला में बैठ गया। उस समय—
पर्वत और वृक्ष थरथरा उठे। कठोर पापकर्म करनेवाले उस राक्षस को देखकर पक्षी भी मौन हो रहे। मृग भयभीत हुए। सर्प अपने फन को समेटकर कहीं छिप गये।
आसन पर बैठने के पश्चात् उसने (सीता से) प्रश्न किया—यह कौन-सा स्थान है? यहाँ निवास करनेवाले तपस्वी कौन हैं? इसके उत्तर में विशाल नयनोंवाली वह देवी, यह सोचती हुई कि यह कोई निष्कपट सन्यासी है, जो इस स्थान के लिए अजनबी है, कहने लगी—
हे महात्मा ! दशरथ के प्रसिद्ध कुल में उत्पन्न उन प्रभु का नाम आपने सुना होगा, जो उत्तम कुल-जात अपनी माता की आज्ञा को शिरोधार्य करके अपने भाई के साथ बिना किसी दुःख के इस स्थान में आकर रहते हैं।
फिर, रावण ने प्रश्न किया मैने (यह समाचार) सुना है, किन्तु उन्हें (अर्थात्, राम को) मैंने देखा नहीं है। गंगा के समृद्ध जल से सिंचित (कोशल) देश को एकबार गया हूँ। नील कुवलय और बरछे के जैसे नयनोंवाली तुम किनकी सुपुत्री हो, जो अपने अमूल्य समय को इस अरण्य में व्यतीत कर रही हो?
तब कलंकहीन शीलवती उस (सीता) देवी ने उत्तर दिया—अनघ मार्ग पर चलनेवाले हे यतिवर ! मैं उन जनक की पुत्री हूँ, जिनका मन आप (जैसे मुनियों) के अतिरिक्त अन्य देवता का ध्यान भी नहीं करता। मेरा नाम जानकी है। मैं काकुत्स्थ की पत्नी हूँ।
फिर, उत्तम आभरण-भूषित सीता ने पूछा—आप अत्यंत वृद्ध हैं। कर्मभोग से मुक्ति पाने की इच्छा रखनेवाले आप कहाँ से इस समय, इस कठोर वन-मार्ग को पार करके आये हैं?
तब रावण कहने लगा (ऐसा एक व्यक्ति है), जो इन्द्र का भी इन्द्र है (अर्थात्, इन्द्र से भी बढ़कर प्रभावशाली); (चित्र में) अंकित करने के लिए असाध्य सौंदर्य से युक्त है। चतुर्मुख (ब्रह्मा) के वंश में उत्पन्न है, स्वर्ग-सहित सब लोकों पर शासन करनेवाला है और जिसकी जिह्वा वेदों के मंत्रों का आवास है।
जो ऐसी शक्तिवाला है कि उसने पूर्वकाल में शिवजी के निवासभूत महान् कैलासगिरि को जड़-सहित उखाड़ लिया था। जिसको भुजाएँ ऐसी हैं कि (उन भुजाओं ने) दिशाओं को वहन करनेवाले गजों पर आघात करके उनके दाँतों को चूर-चूर कर दिया था।
जिसके द्वार के रक्षक स्वयं देवता हैं। जिसकी महिमा का गान करने की शक्ति शब्दों में नहीं है। जिसके अधीन कल्पतरु आदि देवलोक की सब विभूतियाँ हैं। जिसका सुन्दर विश्राम-स्थान गम्भीर समुद्र से आवृत स्वर्णमय लंका नगरी है।
जिसके वैभव से आकृष्ट होकर सुन्दर मन्दहास से युक्त तिलोत्तमा आदि अप्सराएँ