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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 397

अरयण्यकांड ३८६

शोभायमान था। इस वेष में वह, पवित्र अन्तःकरणवाली उस अरुंधती (के समान पति-व्रत्यवाली सीता) के आवास-भूत कुटीर के समीप आ पहुँचा।

देवताओं को भी मुग्ध करनेवाला (सन्यासी का) वेष धारण करके वह (रावण) उस कलकरहित पर्णशाला के द्वार पर पहुँचा और गलित कंठ से बोला—इस कुटीर में कौन है ?

कलापी-तुल्य वह देवी, यह सोचकर कि कपट-रहित मनवाले कोई तपस्वी आये हैं, इक्षुरस-समान मधुर स्वर में यह कहती हुई कि 'पधारिए ! पधारिए !' इस प्रकार उसके सम्मुख आ खड़ी हुई, जैसे कोई प्रवाल-लता हो।

उस (रावण) ने, लावण्य के भी लावण्य, यश के आगार और शील की मर्यादा उस देवी को अपनी आँखों से देखा और मदस्रावी मत्तगज के समान स्वेद से भरकर, लालसा-रूपी वीचियों से पूर्ण कामना-समुद्र में डूब गया।

अशिथिल कोकिल स्वर से युक्त, देव-स्त्रियों से भी उत्तम रूपवाली वह (सीता) देवी ज्योही उसके सम्मुख प्रकट हुई, उस (रावण) के विरह-तप्त मनकी क्या दशा हुई—इसके बारे में क्या वर्णन करे ? उसकी शक्तिशाली भुजाएं फूल उठी और फिर कृश हो गई।

उसकी नयन-पंक्ति, वन-मयूर जैसी (सीता) के सौंदर्य के दर्शन से, पुष्पों के समृद्ध मधु का छककर पान करके गानेवाले भ्रमरों के समान आनंद से मत्त हो उठी—ऐसा कहने में क्या बड़ाई होगी ? उसके मन के जैसे ही उसकी आँखें भी आनंदित हो गईं।

वह (रावण) यह सोचता हुआ कि अरुण-कमल के समान को तजकर मेरे ये बीस नयन यहाँ आई हुई इस सुन्दरी के रत्न-कांति से युक्त लावण्य को देखने के लिए क्या पर्याप्त हैं ? हाय ! मेरे एक हजार अपलक आँखें नहीं हैं।—व्याकुल हो खड़ा रहा।

उसने सोचा—कलाइयों पर कंकण-पंक्तियों से शोभित होनेवाली इस नारी-रत्न के साथ क्रीडा करते हुए आनंद के अपार समुद्र में निमग्न होने के लिए क्या कठोर तपस्या के प्रभाव से प्राप्त, साढ़े तीन करोड़ वर्ष की मेरी आयु भी पर्याप्त होगी।

(फिर, उसने सोचा) अब मैं इस सुन्दरी को तीनों लोकों की सम्राज्ञी बना दूँगा। सब सुर और, असुर अपनी पत्नियों के साथ इसकी सेवा में निरत रहकर जीवन व्यतीत करेंगे। और, मैं भी इसकी सेवा करता हुआ रहूँगा।

(उसने यह भी विचार किया) दुःख के समय में ही जब इसका मुख इतना लावण्यपूर्ण है, तब किंचित् दंत-प्रकाश से युक्त मदहास फैलने पर इसका मुख कितना मनोहर लगेगा ? मैं अपनी उस बहन (शूर्पणखा) को, जिसने इस पुष्प-भरित कुंतलोंवाली का अन्वेषण कर मुझे इसकी पहचान दी है, अपना राज्य दे दूँगा।

वह (रावण) उस स्थान पर आकर इसी प्रकार के विविध विचार करता हुआ मन में अनुचित इच्छा भरकर खड़ा रहा। उसे देखकर अस्खलित शीलवाली सीता ने अपने अश्रु पोछ लिये और कहा कि इस आसन पर आप आसीन हो जायें। (और एक आसन डाल दिया।)