कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 396, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३८८ | कंब रामायण |
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कमल के उद्यान में विहार करनेवाला हंस जिस प्रकार धुआँधार दावाग्नि में कूदने जाता हो, उसी प्रकार का कार्य करने के लिए प्रस्तुत (सीता) देवी की बातों को सुनकर उनकी रक्षा के लिए धनुष धारण करनेवाले (लक्ष्मण) ने उनके छोटे चरण-कमलों के सम्मुख धरती पर गिरकर साष्टांग नमस्कार किया। फिर बोला—
आप प्राण-त्याग करना क्यों चाहती हैं? आपकी बातों से मैं भयभीत हो रहा हूँ। (आपकी आज्ञा का) मैं उल्लंघन नहीं कर सकता हूँ। आप दुःख-मुक्त होकर यहीं रहें। यह दास जा रहा है। कठोर विधि-विधान को कौन रोक सकता है?
यह दास जा रहा है, कुछ अहित होने को है। आप कह रही हैं कि मैं प्रभु की आज्ञा का उल्लंघन कर यहाँ से जाऊँ। (मेरे जाने पर) आप अकेली रह जायेंगी। इसलिए सावधान रहिए।—यों कहकर उसस मन के साथ विदा होकर लक्ष्मण वहाँ से चलने लगे।
उस समय लक्ष्मण यह विचार करते हुए चले कि यदि मैं यहीं रहूँ, तो ये अग्नि में गिरेंगी। यदि मैं पर्वत-सदृश प्रभु के निकट जाऊँ, तो इनकी रक्षा न होने से कुछ अहित होगा। मुझे अपने प्राणों पर भी आसक्ति है। अब मैं क्या करूँ?—इस प्रकार सोचकर लक्ष्मण बहुत व्याकुल हुए।
यदि हो सके, तो धर्म से अहित को रोका जा सकता है। अझ मैं, जो पूर्वकर्म के परिणाम के फलस्वरूप इस प्रकार का जन्म पाकर यहाँ आकर इस विपदा में ग्रस्त हुआ हूँ, इन सीता की मृत्यु का कारण बनूँ—इससे तो यही उत्तम है कि मैं इस स्थान से हट जाऊँ।
फिर, सीता से कहा—मैं जा रहा हूँ। यदि (अहित) घटित हुआ, तो खगराज (जटायु) अपनी शक्ति-भर आपकी रक्षा करेगा। (यह कहकर) देवताओं के पुण्य-प्रभाव से महिमामय वह पुरुष-श्रेष्ठ (लक्ष्मण) उसी मार्ग से चल पड़ा, जिससे राम गये थे।
लक्ष्मण के वहाँ से जाते ही खड्ग-दांतोंवाला रावण, जो अवसर की ताक में छिपा बैठा था, अपनी वंचना को सफल बनाने के उद्देश्य से बाँस का त्रिदंड लिये अंतरशत्रुओं (अर्थात्, काम, क्रोध और मोह) के बंधनों से मुक्त हुए तपस्वी का वेष धारण करके आया।
उपवास रखनेवाले के समान उसकी देह दुर्बल थी। बहुत दूर तक पैदल चलकर आनेवाले के समान उसमें थकावट दिखाई पड़ती थी। नृत्य के संगीत के जैसे ही अति शुद्ध तथा वीणागान के समान मधुर शैली में (साम) वेद का गान करता हुआ वह (रावण) आया।
वह इस प्रकार मन्द-मन्द चलता था, जैसे पुष्पों की शय्या पर चल रहा हो। वह अपना पद इस प्रकार रखता था, मानों अग्नि-कणों पर चल रहा हो। उसके हाथ और पैर अनियंत्रित रूप से काँप रहे थे और उसमें अतिवार्धक्य दिखाई पड़ रहा था।
वह कमल के बीजों की एक जप-माला हाथ में लिये हुए था। उसके पास कूर्माकार एक आसन भी था। उसका शरीर झुका हुआ था। उसके वक्ष पर यज्ञोपवीत