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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 549 में से

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पृष्ठ 400
३६२कंब रामायण

उसके यह कहने पर सुन्दर आभरण-भूषित सीता यह न जानने से कि माया में चतुर राक्षस कामरूपी है, उसपर कुछ संदेह न करती हुई बोली— पापियों से स्नेह करनेवाले लोग पवित्र नहीं होते। विचार करने पर यही कहना पड़ेगा कि वे भी (अर्थात्, पापियों से स्नेह रखनेवाले भी) उस पाप के भागी होते हैं।

तब रावण ने यह आशंका करके सीता कदाचित् उसपर संदेह कर रही है, उस संदेह को दूर करने के विचार से दूसरे ढंग से कहा कि तीनों लोकों के विवेकी पुरुषों के लिए उन बलशाली राक्षसों के स्वभाव के अनुकूल रहने के अतिरिक्त अन्य क्या आचरण संभव हो सकता है?

(दूसरों की) मनोदशा को पहचाननेवाले उस मायावी के यह कहने पर सद्‌गुणों में बड़ी हुई देवी ने कहा—धर्म के रक्षक उदार गुणवाले वे (रामचन्द्र) जबतक इस अरण्य में तपस्साधना करते रहेंगे, तबतक पाप-कर्म से जीनेवाले राक्षस अपने बंधु-सहित मर मिटेंगे। उसके पश्चात् संसार के कष्ट भी मिट जायेंगे।

हरिण-समान उस सीता के यह कहते ही वह (रावण) बोल उठा—हे मीन-जैसे चमकते नयनोंवाली! यदि मनुष्य, राक्षसों का समूल नाश करनेवाले हों तो (इसका अर्थ यह हुआ कि) एक छोटा खरगोश हाथियों के झुंड को मार देगा और एक हिरण का बच्चा वक्र नखोंवाले सिंह को मार देगा।

तब सीता ने कहा—घनीभूत विद्युत्-पुंज-जैसे केशोंवाले विराध तथा क्रोध के ताप से भरे मनवाले विजयी खर आदि राक्षसों के (राम हाथों) मरने का समाचार कदाचित् आपने नहीं सुना है। यह कहकर राम को उस समय जो क्लेश उठाना पड़ा था, उसका स्मरण करके वह देवी आँखों से अश्रु की वर्षा करने लगी।

फिर, आगे उन देवी ने कहा—आप कल ही देखेंगे कि प्रतापी सिंह-सदृश मेरे प्रभु से लंका के निवासी अपने कुल-सहित कैसे मिटते हैं और देवों की उन्नति कैसे होती है। क्या अधारणीय धर्म को पाप जीत सकता है? आप, दोषहीन मुनिवर क्या यह नहीं जानते?

वह रावण, जिसका मांसल शरीर (सीताजी की) मधुमिश्रित अमृत-जैसी अति मृदुल वाणी के उसके कानों में पड़ने से फूल उठा था, अब इस वचन को सुनकर कि मानव अधिक बलवान् है, अभिमान के उमड़ने से क्रोध से भर गया।

उस क्रोधी ने कहा—एक मनुष्य ने (अर्थात्, राम ने) धनुर्बल में क्षुद्र उन राक्षसों को मारा। यदि तुम इस बात की बड़ाई करती हो, तो कल ही तुम इसका परिणाम देखोगी कि (रावण की) बीस भुजाओं की हवा-मात्र लगने से वह मनुष्य (अर्थात्, रामचन्द्र) सेमर की रूई के जैसे उड़ जायगा।

निरर्थक वचन कहनेवाली हे मुग्धे! यदि मेरु पर्वत को उखाड़ना हो, ब्रह्मांड के खप्पर को तोड़ देना हो, समुद्र के जल को आलोड़ित करना हो, अथवा पृथ्वी को उठा लेना हो, इस प्रकार के अनेक कार्य करने हों, तो भी रावण के लिए ये सब सुलभ हैं। उसके लिए कौन-सा कार्य कठिन हो सकता है? तुमने क्या समझकर ये बातें कही हैं?

इस समय सीता के मन में संदेह उत्पन्न हुआ कि यह कर्म के द्वन्द्व से मुक्त मुनि